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शुक्र पारगमन

खगोल के इतिहास में प्रत्येक 122 वर्षों बाद शुक्र पारगमन की घटना घटित होती है। इस समय सूर्य और पृथ्वी के बीच शुक्र ग्रह आता है और पृथ्वी से यह नजारा देखा जा सकता है। क्या है शुक्र पारगमन की विशेषता और उसका इतिहास, बता रहे…

शुक्र पारगमन
खगोल के इतिहास में प्रत्येक 122 वर्षों बाद शुक्र पारगमन की घटना घटित होती है। इस समय सूर्य और पृथ्वी के बीच शुक्र ग्रह आता है और पृथ्वी से यह नजारा देखा जा सकता है। क्या है शुक्र पारगमन की विशेषता और उसका इतिहास, बता रहे हैं निमिष कपूर। सूरज ढलने के बाद तारों से टिमटिमाते आसमान में पश्चिम की ओर हीरे की तरह चमकता शुक्र ग्रह हमारा ध्यान खींचता है। शुक्र ग्रह को प्राचीन सभ्यताओं में प्रेम का देव और असुरों के प्रमुख शुक्राचार्य के नाम से भी जाना जाता रहा है। चमकीला शुक्र हमारे सौर मंडल का सबसे गर्म ग्रह है और इसका अपना कोई चंद्रमा नहीं है। शुक्र के वातावरण में सघन बादलों की एक मोटी परत मौजूद है। वास्तव में ये बादल सांद्रित सल्फ्यूरिक एसिड से बने हैं। शुक्र के घने व सूखे वातावरण की रचना अधिकांश रूप से कार्बन डाइ ऑक्साइड से हुई है। इन कारणों से शुक्र ग्रह पर जीवन की संभावनाएं लगभग शून्य हैं, लेकिन हमारे वैज्ञानिक उम्मीद की किरण अवश्य देख रहे हैं। इस 6 जून 2012 को आप गवाह बनने जा रहे हैं एक दुर्लभ खगोलीय घटना के, जिसमें शुक्र ग्रह सूर्य के सामने से होकर गुजरेगा। शुक्र ग्रह काले तिल की तरह सूर्य के गोले को पार करता हुआ नजर आएगा। यह घटना दुर्लभ इसलिए है क्योंकि 6 जून 2012 के बाद अगला शुक्र पारगमन दिसंबर 2117 और 2125 को घटेगा।
हम सूर्य ग्रहण से परिचित हैं, जिसमें चांद, सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है और पृथ्वी से सूर्य चांद से ढका हुआ दिखाई देता है। इसी प्रकार जब शुक्र या बुध जैसे आंतरिक ग्रह पृथ्वी और सूर्य के बीच आते हैं तो यह घटना पारगमन कहलाती है।
बुध एवं शुक्र का आभासीय आकार चंद्रमा के आभासीय आकार के मुकाबले अधिक छोटा होने पर ये ग्रह पारगमन के दौरान एक काले बिंदु के रूप में सूर्य की चकती या गोले के सामने से गुजरते नजर आते हैं। बुध या शुक्र का प्रवेश बिंदु, जो सूर्य के गोले में प्रवेश के समय नजर आता है, हमेशा पूर्वी किनारे से होता है। इसी प्रकार जब ये ग्रह सूर्य के गोले से बाहर निकलता है, तब इनका निर्गमन बिंदु हमेशा पश्चिमी सिरे पर होता है। कुछ ही मौके ऐसे होते हैं जब शुक्र पृथ्वी और सूर्य के बीच आने पर, सूर्य के किनारे से गुजरता या पारगमन करता दिखाई देता है। अधिकांश अवसरों पर या तो शुक्र सूर्य के कुछ उत्तर या फिर कुछ दक्षिण की ओर से गुजरता है। पारगमन के दौरान शुक्र की अंतयरुति नवचंद्र या अमावस्या की तरह ही होती है। शुक्र पारगमन 121.5 वर्ष बाद दिखता है और उसके 8 वर्ष बाद फिर दिखता है। इसके बाद शुक्र पारगमन 105.5 वर्ष बाद दिखता है और उसके 8 वर्ष बाद पुन: दिखाई पड़ता है। इसी क्रम में यह घटना चलती रहती है। यही अंतराल इस घटना को दुर्लभ व अविस्मरणीय बनाता है। शुक्र पारगमन को टेलीस्कोप की खोज के बाद अब तक केवल सात बार देखा गया है, जिसमें वर्ष 1631, 1639, 1761, 1769, 1874, 1882 और 2004 के पारगमन शामिल हैं। शुक्र पारगमन की अगली आवृत्ति 11 दिसंबर 2117 और 8 दिसंबर 2125 को घटेगी। ग्रहीय पारगमन खगोल विज्ञानियों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होते हैं। शुक्र पारगमन का प्रयोग सूर्य और पृथ्वी के बीच की वास्तविक दूरी मापने के लिए किया जाता था। पारगमन का इतिहास
वर्ष 1606 में जोहानस केप्लर (सन् 1571-1630) ने अपने गणितीय आकलन से यह पता लगाया कि ग्रह सूर्य के इर्द-गिर्द दीर्घ वृत्तीय कक्षाओं में भ्रमण करते हैं। गणनाओं के आधार पर केप्लर ने अपनी रुडोल्फ तालिका में सर्वप्रथम यह भविष्यवाणी की थी कि शुक्र का पारगमन 6 दिसम्बर 1631 में होगा, साथ ही बुध पारगमन की भी भविष्यवाणी की थी, जो 7 नवम्बर 1631 को घटित हुई थी। खगोलविज्ञानी पियरे गसेंडी (1592-1655), ने केप्लर की खगोलीय सारणी का अध्ययन कर, 7 नवम्बर 1631 के बुध पारगमन का प्रेक्षण किया। भारत में सर्वप्रथम टेलीस्कोप का प्रयोग एक अंग्रेज जेरेमियाह शेकर्ली ने किया था। वे केप्लर की गणनाओं का अनुसरण कर रहे थे। शेकर्ली ने सूरत में 1651 में बुध के पारगमन का अवलोकन किया, लेकिन वह बुध के सूर्य के गोले के समक्ष प्रवेश एवं निर्गमन के समय को नोट नहीं कर पाए। एक अंग्रेज पादरी एवं खगोलविज्ञानी जेरेमियाह होरोक्स ने अपने विभिन्न अध्ययनों में वर्ष 1639 तक यह ज्ञात कर लिया था कि शुक्र पारगमन की घटना आठ-आठ वर्ष के जोड़ों में करीब 120 वर्ष के अंतराल पर होती है। सर्वप्रथम शुक्र पारगमन के अवलोकन के गवाह बनने का श्रेय भी होरोक्स और उनके मित्र विलियम क्रैबट्री को जाता है, जिन्होंने 24 नवंबर 1639 के शुक्र पारगमन को देखा। खगोलीय इकाई का वास्तविक मान
19वीं शताब्दी में भी शुक्र पारगमनों (1874 और 1882) के प्रेक्षण के लिए अभियान आयोजित किए गए। तब तक प्रेक्षण विधियों में काफी सुधार किए जा चुके थे। पलेर्मो एस्ट्रोनॉमिकल ऑब्जर्वेटरी के पेट्रो ताच्चिनी के नेतृत्व में एक इतालवी टीम ने पूर्वी भारत के मधुपुर में सन् 1874 के शुक्र पारगमन के स्पेक्ट्रमिकी प्रेक्षण किए। कोलकाता के सेंट जेवियर कॉलेज के फादर यूजीन लाफों (1837-1908) मधुपुर में इतालवी टीम के इस अभियान में शामिल हुए। भारत के पठाणि सामंत और अंकितम वेंकट नरसिंगा राव ने भी शुक्र पारगमन का प्रेक्षण किया। अंतत: सौर पैरेलैक्स की निश्चित गणना संभव हुई और खगोलीय इकाई का मान 149.59 मिलियन किलोमीटर ज्ञात हुआ। कहां, कैसा और कब
शुक्र पारगमन की दुर्लभ घटना 6 जून 2012 को पश्चिमी पेसिफिक, पूर्वी एशिया और पूर्वी ऑस्ट्रेलिया से देखी जा सकेगी। उत्तरी एवं मध्य अमेरिका व उत्तरी दक्षिण अमेरिका में शुक्र पारगमन की शुरुआत 5 जून को देखी जा सकती है, लेकिन सूर्य पारगमन समाप्त होने से पूर्व ही अस्त हो जाएगा। यूरोप, पश्चिमी एवं मध्य एशिया, पूर्वी अफ्रीका और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में इस घटना को समाप्ति तक देखा जा सकेगा, क्योंकि इन स्थानों में सूर्योदय से पूर्व ही पारगमन आरम्भ हो चुका होगा।
इस नजारे में चार संपर्क बिंदुओं का अवलोकन भी महत्वपूर्ण व रोचक है। जब शुक्र ग्रह का गोला सूर्य के गोले की बाहरी परिधि को स्पर्श करता है, तो इसे प्रथम संपर्क बिन्दु कहते हैं, जहां से पारगमन का आरम्भ होता है। प्रथम संपर्क बिंदु के तुरंत बाद ग्रह को सूर्य की परिधि के किनारे पर एक छोटे निशान के रूप में देखा जा सकता है। जब ग्रह का गोला सूर्य की आंतरिक परिधि में प्रवेश करता है तो यह दूसरे संपर्क बिंदु पर होता है। कई घंटों की दूरी तय करने के बाद शुक्र ग्रह धीरे-धीरे सूर्य के गोले को पार करता है। जब ग्रह सूर्य के गोले की आतंरिक परिधि के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचता है, तो यह स्थिति तीसरा संपर्क बिंदु कहलाती है। अंतिम व चतुर्थ संपर्क बिंदु की दशा में ग्रह की परिधि सूर्य के गोले की परिधि को पूरी तरह बाहर से स्पर्श करती है। इसी संपर्क से साथ पारगमन की घटना समाप्त हो जाती है। पहले व दूसरे संपर्क की घटना प्रवेश कहलाती है एवं तीसरे व चौथे संपर्क को निर्गमन कहते हैं। सुरक्षित अवलोकन
आज देश की कई राष्ट्रीय संस्थाओं जैसे विज्ञान प्रसार, राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद द्वारा देश भर में फैले विज्ञान क्लबों एवं विज्ञान संचार के क्षेत्र में कार्यरत संस्थाओं को सोलर फिल्टर उपलब्ध कराए गए हैं। इसके अतिरिक्त देश के विभिन्न भागों में राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय संस्थाओं, खगोल प्रयोगशालाओं, ताराघरों द्वारा भी सोलर फिल्टर व टेलिस्कोप से पारगमन अवलोकन कार्यक्रमों का आयोजन 6 जून को बड़ी संख्या में किया जा रहा है। कैसे देखें
शुक्र पारगमन को देखने का बेहतर तरीका है कि उसका प्रक्षेपण किया जाए। इसके अवलोकन के लिए आप एक गत्ते के आयताकार डिब्बे से पिन-होल कैमरा स्वयं तैयार कर सकते हैं। इसके लिए डिब्बे की लंबाई में स्थित विपरीत सिरों में से एक सिरे को पूरी तरह खोल लें और दूसरे सिरे पर एक सूक्ष्म छिद्र कर लें। तैयार पिन-होल कैमरे का सूक्ष्म छिद्र वाला सिरा सूरज की ओर करें, खुले सिरे को दीवार या कागज की ओर रखें। सूर्य का प्रक्षेपण खुले सिरे से किसी साफ दीवार या सफेद कागज पर बनेगा और आप सुरक्षित तरीके से शुक्र पारगमन का अवलोकन कर पाएंगे। क्या करें?
शुक्र पारगमन के दौरान सूर्य का प्रक्षिप्त प्रतिबिंब ही देखें, जिसमें शुक्र सूर्य के गोले में एक काले बिंदु की तरह नजर आएगा।
पिन होल कैमरे या दूरबीन/ टेलीस्कोप द्वारा एक छायादार
दीवार पर सूर्य के प्रतिबिम्ब को प्रक्षेपित करें।
केवल वैज्ञानिक रूप से तैयार व जांचे गए सोलर फिल्टर का उपयोग करें। पारगमन के दौरान शुक्र ग्रह सूर्य के गोले के उत्तरी भाग में पूर्व से पश्चिम की ओर जाता दिखाई देगा। क्या न करें?
बगैर सोलर फिल्टर के सीधे नेत्रों से सूर्य या शुक्र पारगमन की घटना को देखने का प्रयास न करें। दूरबीन/टेलीस्कोप या बाइनाक्युलर से सीधे कभी सूर्य या शुक्र
पारगमन न देखें।
धुएंदार कांच, रंगीन फिल्म, धूप के चश्मे, श्वेत-श्याम फिल्म, फोटोग्राफिक फिल्टर तथा पोलराइजिंग फिल्टरों का इस्तेमाल न करें। ये असुरक्षित हैं, जिनसे आंखों की रोशनी तक जा सकती है। सोलर फिल्टर द्वारा सूर्य की ओर लगातार न देखें, कुछ विराम लें, और कुछ पलों बाद देखें। शुक्र और पृथ्वी में कुछ समानताएं सूर्य से पृथ्वी और शुक्र दोनों की एक ही सी दूरी की स्थित होने के कारण, उनमें कुछ सांघटनिक समानताएं दिखाई देती हैं। पृथ्वी का औसत व्यास 12,756 किलोमीटर है, जबकि शुक्र ग्रह का 12,100 किलोमीटर है। शुक्र का द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान की तुलना में केवल 19 प्रतिशत ही कम है। शुक्र का औसत घनत्व पृथ्वी के औसत घनत्व 5.52 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर की तुलना में 5.25 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर है। पृथ्वी का बाहरी भूपटलीय पदार्थ सिलिकेट निर्मित होने के कारण कम घनत्व वाला है, जिसका मान 3.09 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर है। वेनेरा लैंडर अंतरिक्ष यान ने भी शुक्र के पृष्ठीय पदार्थ के सिलिकेट निर्मित होने की ही जानकारी दी है। पृथ्वी का गुरुत्व 9.8 है, जबकि शुक्र ग्रह का 8.83 है। यह तथ्य भी पृथ्वी और शुक्र में सामान्यत: दिखता है।(हिन्दुस्तान में प्रकाशित)
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