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नासा ने चुना मंगल पर पहुंचने का टेढ़ा रास्ता

मुकुल व्यास मंगल पर मनुष्य को भेजना नासा के दीर्घकालिक मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम की सर्वोच्च प्राथमिकता है। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने नासा को 2030 के आसपास मंगल के 'पड़ोस' में अंतरिक्ष यात्री उतारने का निर्देश भी द…

नासा ने चुना मंगल पर पहुंचने का टेढ़ा रास्ता
मुकुल व्यास मंगल पर मनुष्य को भेजना नासा के दीर्घकालिक मानवयुक्त अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम की सर्वोच्च प्राथमिकता है। राष्ट्रपति बराक ओबामा ने नासा को 2030 के आसपास मंगल के 'पड़ोस' में अंतरिक्ष यात्री उतारने का निर्देश भी दिया है। इस 'पड़ोस' में मंगल की कक्षा शामिल है। नासा की जेट प्रोपल्सन लेबोरेटरी के वैज्ञानिक होपी प्राइस ने कहा कि अंतरिक्ष यात्रियों को लाल ग्रह की धूल भरी सतह पर उतारने से पहले उन्हें मंगल की कक्षा में फोबोस या डीमोस जैसे नन्हे चंद्रमा पर भेजना ज्यादा उचित होगा। उनका कहना है कि मानवयुक्त मंगल अभियान को दो हिस्सों में बांटने से न सिर्फ लागत कम हो जाएगी बल्कि इससे जोखिम भी कम हो जाएगा। इस तरह यह कार्यक्रम प्रबंधकीय दृष्टि से सुगम हो जाएगा और हर वर्ष के आधार पर इसकी समीक्षा की जा सकेगी।दरअसल पिछले कुछ समय से कई लोग ऐसा कहने लगे हैं कि मंगल पर पहुंचना बहुत मुश्किल है और हमारे जीवनकाल में यह संभव नहीं होगा। कुछ लोगों ने मंगल यात्रा पर 1000 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च होने का अनुमान लगाया है। इन निराशावादी विचारों का असर दूर करने के उद्देश्य से प्राइस और उनके दो सहयोगियों- जॉन बेकर तथा फिरोज नादेरी ने नासा के समक्ष मंगल मिशन की नई रूपरेखा रखी है जिसमें पहले 2033 तक फोबोस और इसके पश्चात 2039 तक मंगल पर मानव उतारने की बात कही गई है।फोबोस मंगल का करीब 16 किलोमीटर चौड़ा चंद्रमा है और उसकी कक्षा मंगल की सतह से करीब 6000 किलोमीटर दूर है। राइस और उनके सहयोगियों द्वारा दिए गए सुझाव को क्रियान्वित करने के लिए नासा के स्पेस लॉन्च सिस्टम (एसएलएस) महारॉकेट के चार प्रक्षेपणों की जरूरत पड़ेगी। यह विशाल रॉकेट इस समय विकास अवस्था में है। इसकी पहली उड़ान 2018 के लिए निर्धारित है।फोबोस के लिए एसएलएस की पहली उड़ान 2029 के लिए प्रस्तावित है जिसमें एक अंतरिक्ष यान और दो पेलोड होंगे। यह अंतरिक्ष यान सौर-विद्युत प्रणोदक के जरिए दोनों पेलोड को चार वर्ष से कम समय में मंगल की कक्षा में पहुंचाएगा। प्राइस का कहना है कि उनकी टीम द्वारा बताए गए तरीके के लिए प्रणोदक टेक्नॉलजी में किसी बड़े परिवर्तन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। एसएलएस की दूसरी उड़ान में एक अंतरिक्ष यान और फोबोस पर स्थापित किए जाने वाले अड्डे को सम्मिलित किया जाएगा। अंतरिक्ष यान अड्डे के ढांचे को फोबोस की सतह पर ले जाएगा। इस अड्डे में चार अंतरिक्ष यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था होगी। अड्डे को बिजली देने के लिए अंतरिक्ष यान सतह पर ही रहेगा। आवश्यकता पड़ने पर यह फोबोस के दूसरे ठिकानों पर भी जाएगा।एसएलएस की तीसरी उड़ान 2032 में होगी। इसके बाद चौथी उड़ान से चार अंतरिक्ष यात्रियों को फोबोस के लिए रवाना किया जाएगा। मंगल की कक्षा में प्रतीक्षारत फोबोस हस्तांतरण यान अंतरिक्ष यात्रियों को 2033 में फोबोस की सतह पर उतारेगा जहां वे करीब 300 दिन रहेंगे। इसके पश्चात अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी पर लौट आएंगे। फोबोस का अड्डा बना रहेगा जिसका प्रयोग भावी अंतरिक्ष यात्री कर सकेंगे। माना जा रहा है कि फोबोस अभियान से मंगल पर पहुंचने और वहां से सुरक्षित धरती पर लौटने के तरीके की पुष्टि हो जाएगी जिससे आगे के अभियान को सुचारू रूप देना अपेक्षाकृत आसान हो जाएगा।2039 में मंगल पर मानव को उतारने के लिए इसी तरह के बहुचरणीय कार्यक्रम को अपनाया जा सकता है, लेकिन लाल ग्रह के लिए एसएलएस की चार उड़ानों की बजाय छह उड़ानों की आवश्यकता पड़ेगी। प्राइस और उनके सहयोगियों द्वारा बनाई गई योजना के मुताबिक मंगल की कक्षा में एक 23 टन वजनी लैंडर यान भेजा जाएगा जहां वह अंतरिक्ष यात्रियों के आगमन की प्रतीक्षा करेगा। दिलचस्प बात यह है कि इस लैंडर में मंगल पर स्थापित होने वाला आवास और पृथ्वी पर वापसी के लिए प्रयुक्त होने वाला यान भी शामिल होगा।
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