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अंग निर्माण की संभावनाएं

शरीर में बनेंगे नए अंग यदि यह समझ में आ जाए कि गिरगिट कैसे अपनी पूंछ उगा लेता है तो मनुष्यों में भी अंग पुनर्निर्माण की कोई तकनीक विकसित की जा सकती है.एक दिन मरीज खुद अपनी आवश्यकता के हिसाब से नए अंग उगा सकेंगे। ब्रिटिश…

अंग निर्माण की संभावनाएं
शरीर में बनेंगे नए अंग यदि यह समझ में आ जाए कि गिरगिट कैसे अपनी पूंछ उगा लेता है तो मनुष्यों में भी अंग पुनर्निर्माण की कोई तकनीक विकसित की जा सकती है.एक दिन मरीज खुद अपनी आवश्यकता के हिसाब से नए अंग उगा सकेंगे। ब्रिटिश वैज्ञानिकों को ऐसी कोशिकाएं उत्पन्न करने में सफलता मिली है जो शरीर में प्रविष्ट होने के बाद एक पूरी तरह से कार्य सक्षम अंग में विकसित हो सकती हैं। चूहों पर किए गए इस प्रयोग से भविष्य में दिल, गुर्दे और जिगर की बीमारियों के समुचित इलाज की उम्मीद जग गई है। यह अनुसंधान अभी प्रारंभिक अवस्था में है, लेकिन वैज्ञानिकों को पूरा भरोसा है कि इससे भविष्य में प्रत्यारोपित अंगों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। इस अनुसंधान का नेतृत्व एडिनबरा विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक क्लेर ब्लैकबर्न ने किया है। प्रो. ब्लैकबर्न की टीम ने चूहे के अंदर एक कृत्रिम थाइमस उगाया है। थाइमस एक छोटा सा अंग है जो दिल के करीब पाया जाता है। शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली में इस अंग की विशेष भूमिका होती है। प्रो. ब्लैकबर्न का कहना है कि प्रयोगशाला में कोशिकाओं से अंग विकसित करना अंग पुनर्निर्माण चिकित्सा के लिए एक बड़ी चुनौती है। कोशिकाओं में कुछ फेरबदल करके हमने कोशिका की एक ऐसी किस्म विकसित की है जो शरीर में प्रत्यारोपित किए जाने के बाद एक पूरी तरह से सक्षम अंग में तब्दील हो सकती है। रिसर्चरों को प्रयोगशाला में स्टेम कोशिकाओं से दिल, जिगर और मस्तिष्क के कुछ हिस्से उगाने में कामयाबी जरूर मिली है, लेकिन अभी तक कोई भी शरीर के बाहर विकसित की गई कोशिकाओं से एक संपूर्ण अंग उगाने में सफल नहीं हो पाया था। मनुष्यों में इस तरह की अंग पुनर्निर्माण चिकित्सा को सुरक्षित और प्रभावी बनाने में अभी दस साल लग सकते है, लेकिन वैज्ञानिकों ने ब्लैकबर्न की उपलब्धि को एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। यह शरीर के अंदर थाइमस टी-कोशिकाएं उत्पन्न करता है। ये कोशिकाएं बीमारी से शरीर की रक्षा करती है। जब उन्हें कोई समस्या नजर आती है तो वे एक समन्वित प्रतिरोधी कार्रवाई करती हैं। इसके जरिये कैंसर जैसी हानिकारक कोशिकाओं और बैक्टीरिया तथा वायरस जैसे रोगाणुओं को अलग करने की कोशिश की जाती है। रिसर्चरों ने पता लगाया है कि कृत्रिम थाइमस भी टी-कोशिकाएं उत्पन्न कर सकता है। इससे उन शिशुओं को फायदा हो सकता है जिनमें कार्य सक्षम थाइमस नहीं पाया जाता। वैज्ञानिकों ने थाइमस उगाने के लिए चूहे के भ्रूण से फाइब्रोब्लास्ट नामक कोशिकाएं निकालीं। उन्होंने इन कोशिकाएं में कुछ ऐसा फेरबदल किया कि वे थाइमस कोशिकाओं की तरह बर्ताव करने लगीं। इन कोशिकाओं को जब चूहों में प्रविष्ट किया गया तो उन्होंने थाइमस निर्मित कर दिया। यह कृत्रिम थाइमस हर तरह से कुदरती थाइमस की तरह था। ब्रिटेन की मेडिकल रिसर्च कौंसिल के एक प्रमुख डॉक्टर रॉब बकल का कहना है कि एक संपूर्ण अंग को प्रत्यारोपित करने के बजाय क्षतिग्रस्त ऊतकों के नए हिस्से उगाना एक बेहतर विकल्प है। एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में अंग प्रत्यारोपित करना चुनौतीपूर्ण होता है। इस तरह के प्रत्यारोपण की अपनी सीमाएं हैं और उपयुक्त अंगदाताओं की कमी हमेशा बनी रहती है। डॉ. बकल का यह भी मानना है कि ब्लैकबर्न की तकनीक को मनुष्यों में सुरक्षित इस्तेमाल करने से से पहले अभी और रिसर्च की आवश्यकता पड़ेगी। शरीर के अंगों को दोबारा उगाने के लिए वैज्ञानिक दूसरे जीव-जंतुओं पर भी रिसर्च कर रहे हैं। गिरगिट में अपनी पूंछ दोबारा उगाने की अद्भुत क्षमता पाई जाती है। वैज्ञानिकों को यदि यह समझ में आ जाए कि गिरगिट कैसे अपनी पूंछ उगा लेता है तो मनुष्यों में भी अंग पुनर्निर्माण की कोई तकनीक विकसित की जा सकती है। एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी से संबद्ध अमेरिकी वैज्ञानिकए प्रो. केनरो कुसुमी का कहना है कि मनुष्यों और गिरगिटों में बहुत से जीन समान होते हैं हमने पता लगाया है कि गिरगिट अपनी कटी हुई हुई पूंछ वाले हिस्से में 326 जीनों को सक्रिय कर देता है। सेलमेंडर, टेडपोल और मछलियों में भी अपनी पूंछ दोबारा उगाने की क्षमता होती है, लेकिन गिरगिटों में ऊतकों का विकास एक अलग ढंग से होता है।


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