आमतौर पर इसे इंसान का लालच माना जाता है। यह भी कहा जाता है कि कुछ लोगों के पेट की क्षुधा कभी शांत नहीं होती। अगर आप में नाप-तौल कर खाने की कोई जिद नहीं है या आपके सामने कम खाने की कोई मजबूरी नहीं है, तो अक्सर हमारा मन पे…
09 OCTOBER 20173 min readBy the Author
आमतौर पर इसे इंसान का लालच माना जाता है। यह भी कहा जाता है कि कुछ लोगों के पेट की क्षुधा कभी शांत नहीं होती। अगर आप में नाप-तौल कर खाने की कोई जिद नहीं है या आपके सामने कम खाने की कोई मजबूरी नहीं है, तो अक्सर हमारा मन पेट भर जाने के बाद थोड़ा सा और खाने का करता है। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जाता है कि पेट तो भर गया, लेकिन मन नहीं भरा। हर कोई कभी न कभी इस अनुभव से जरूर गुजरता है, और कुछ लोग तो इस अनुभव से अक्सर गुजरते हैं। बावजूद इसके कि उनकी गिनती आदतन ठूंस-ठूंसकर खाने वालों में नहीं होती। ऐसा क्यों होता है, यह सवाल लंबे समय से वैज्ञानिकों को परेशान करता रहा है। खाना हम पेट भरने के लिए यानी शरीर की जरूरत पूरी करने के लिए खाते हैं। लेकिन जब पेट भर जाता है, भूख शांत हो जाती है और हम शरीर की जरूरत भर का खा लेते हैं, तब भी मन कुछ और खाने को क्यों मचलता है? अक्सर हम इसे अच्छे स्वाद के प्रति व्यक्ति के लालच से जोड़कर देखते हैं, लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया कि बात इतनी सरल नहीं है। और सबसे बड़ी बात है कि यह आदत सिर्फ हम इंसानों की ही नहीं, बल्कि दुनिया के लगभग सभी जीव-जंतुओं की होती है।
यूनिवर्सिटी ऑफ वरमांट के शरीर रसायनशास्त्र विशेषज्ञ मार्क बोटन और स्कॉट शीपर्स ने इसको समझने के लिए चूहों पर एक दिलचस्प प्रयोग किया। उन्होंने 32 मादा चूहे लिए और उनके पिंजरे में यह व्यवस्था कर दी कि जब पिंजरे में लगा लीवर दबाएंगे, तो उन्हें स्वादिष्ट खाना मिलेगा। 12 दिन के इस प्रयोग में उन्होंने पाया कि जब चूहों को भूख लगी होती है, तो वे अपनी जरूरत के हिसाब से सामान्य रूप से लीवर को दबाते हैं। लेकिन जब ऐसे चूहों को पिंजरे में पहुंचा दिया जाता है, जिनके पेट भरे हों, तो वे लीवर को कुछ ज्यादा ही दबाते हैं। यह प्रयोग बताता है कि खाली पेट का भोजन से एक संबंध होता है, जबकि भरे पेट का भोजन से दूसरा संबंध होता है। जब भूख लगी हो, तो कोई भी खाना चाहता है और पेट भरा हो, तो वह खाने के लिए और भी ज्यादा बेचैन हो उठता है। दूसरे शब्दों में हम यह भी कह सकते हैं कि भरे पेट की भूख, भूखे पेट की भूख के मुकाबले ज्यादा बलवती होती है। इसका एक मतलब यह भी है कि भरे पेट के बावजूद और खाने की प्रवृत्ति को हम भले ही इंसान का लालच मानते हों, लेकिन यह फितरत सभी जीवों में पाई जाती है। यानी इसका कारण सभ्यतागत नहीं, बल्कि जैविक है।
पहले यह माना जाता था कि खाना कई लोगों के लिए नशे की लत की तरह हो जाता है और वे खाते ही जाते हैं। हर बार ठूंस-ठूंसकर खाने वालों के लिए अभी भी यही धारणा है, लेकिन अब भरे पेट की भूख को अलग और ज्यादा व्यापक नजरिये से देखा जाने लगा है। अगर हम इन दो प्रवृत्तियों को दो अलग-अलग स्थितियां मान लें, तो भी दोनों का रिश्ता किसी के व्यक्तिगत लालच से कम और उसके शरीर के रसायनशास्त्र से ज्यादा है। हालांकि शरीर में ऐसी कौन सी प्रक्रियाएं हैं, जो इसका कारण बनती हैं, इसे हम अभी तक पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं। मीठी चीजें खाते समय भूख बढ़ने की प्रवृत्ति पर शोध करते समय वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे थे कि ऐसे में हमारा शरीर शर्करा का संग्रह शुरू कर देता है और शरीर में ऐसे रसायन बनते हैैं, जो शरीर को और ज्यादा खाने का संदेश भेज देते हैं। शायद ऐसा ही इस मामले में भी होता हो। आपातकाल के लिए भोजन का संग्रह करना हमारे शरीर की एक मूल प्रवृत्ति मानी जाती है। शायद यही भोजन उपलब्ध होने पर हमारी भूख को बढ़ाती है।
(साभार : दैनिक हिंदुस्तान )