Skip to content
Research

कोशिकाओं के ट्रांसपोर्ट सिस्टम पर रिसर्च के लिए नोबेल पुरस्कार

चिकित्सा जगत में एक नए युग की शुरुआत शशांक द्विवेदी कोशिकाओं के ट्रांसपोर्ट सिस्टम पर शोध दबंग दुनियाँ पिछले दिनों मानव शरीर की सबसे छोटी इकाई कोशिकाओं (सेल्स) के ट्रांसपोर्ट सिस्टम के प्रबंधन को विस्तार पूर्वक बताने और…

कोशिकाओं के ट्रांसपोर्ट सिस्टम पर रिसर्च के लिए नोबेल पुरस्कार
चिकित्सा जगत में एक नए युग की शुरुआत
शशांक द्विवेदी कोशिकाओं के ट्रांसपोर्ट सिस्टम पर शोध
दबंग दुनियाँ
पिछले दिनों मानव शरीर की सबसे छोटी इकाई कोशिकाओं (सेल्स) के ट्रांसपोर्ट सिस्टम के प्रबंधन को विस्तार पूर्वक बताने और इस विषय में गए उल्लेखनीय शोध के लिए जेम्स रौथमैन और रैंडी सैकमैन की अमेरिकी जोड़ी और जर्मनी में जन्मे साइंटिस्ट थॉमस सुडौफ को चिकित्सा के क्षेत्र में साल 2013 के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया । अमेरिकी विश्वविद्यालयों में कार्यरत ये तीनों वैज्ञानिक 12.5 लाख डॉलर (करीब 7.5 करोड़ रुपये) का पुरस्कार साझा करेंगे। इन तीनों वैज्ञानिकों ने सेल्स के प्रमुख ट्रांसपोर्ट सिस्टम वेसिकल ट्रैफिक के मैकेनिजम को समझाया है। इन्होने बताया कि हर कोशिका मॉल्यीक्यूल्स प्रोड्यूस करती है। कोशिकाओं द्वारा तैयार मॉल्यीक्यूल्स छोटे-छोटे पैकेजों में शरीर में ट्रांसपोर्ट होते हैं, जिन्हें वेसिकल्स कहते हैं। ये पैकेज सही जगह पर सही वक्त पर किस तरह डिलीवर होते हैं, इसी मैकेनिजम का पता इन तीनों वैज्ञानिकों ने लगाया है। उदाहरण के तौर पर कोशिकाओं द्वारा इंसुलीन तैयार करने के बाद जब इसे ब्लड में रिलीज किया जाता है तो एक नर्व सेल से दूसरे नर्व सेल को केमिकल सिग्नल्स भेजे जाते हैं। इसी प्रक्रिया को समझने में इन वैज्ञानिकों ने मदद की है। इन वैज्ञानिकों की इस खोज से कई न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के अलावा डायबीटीज जैसी बीमारियों के खिलाफ चल रहे अनुसंधान कार्य में भी मदद मिलेगी। जर्मन वैज्ञानिक थॉमस सुडौफ की दिलचस्पी थी कि दिमाग में जो कोशिकाएं होती हैं, वे आपस में बातें कैसे करती हैं। और सब मिलकर इन बातों का एक साझा मतलब कैसे निकालते हैं। अमेरिकन वैज्ञानिक जेम्स रौथमैन ने पता लगाया की शरीर की बेसिक इकाई कोशिका अपना ट्रांसपोर्ट सिस्टम कैसे चलाती हैं। और इस ट्रांसपोर्ट सिस्टम के मुख्य तत्व कौन से हैं। जबकि अमेरिकन वैज्ञानिक रैंडी सैकमैन ने पता लगाया कि कोशिकाएं अपने ट्रांसपोर्ट सिस्टम को संगठित ढंग से चलाने के लिए क्या तौर तरीके अपनाती हैं। सुडौफ, रैंडी और रॉथमैन ने मिलकर काम किया. इसके शोध के लिए यीस्ट के मॉडल को अपनाया गया । यीस्ट एक किस्म की फफूंद होती है, जिसका इस्तेमाल एक केमिकल प्रोसेस फरमेनटेशन में होता है । फफूंद किसी भी नए विकास का सूक्ष्य अध्ययन माना जा सकता है। शराब को तैयार करने के लिए मूल तत्व वस्तुओं को सड़ाकर उसमें फफूंद पैदा करने के बाद ही शराब निर्मित की जा सकती है। तीनों वैज्ञानिकों ने फफूंद के सेल्स का लगातार सूक्ष्म और गहनता से अध्ययन किया और उससे जो निष्कर्ष मिलें हैं उसके बाद यह माना जा सकता है कि हम लाखों वर्ष पुराने लुप्त ज्ञान को प्राप्त करने की स्थिति में आ गए हैं। कोशिका सजीवों के शरीर की रचनात्मक और क्रियात्मक इकाई है और प्राय स्वत जनन की सामर्थ्य रखती है। यह विभिन्न पदार्थों का वह छोटे-से-छोटा संगठित रुप है जिसमें वे सभी क्रियाएँ होती हैं जिन्हें सामूहिक रूप से हम जीवन कहतें हैं। जिस तरह किसी भवन के निर्माण के लिए ईटों का प्रयोग किया जाता है। उसी तरह से सजीव जगत के सभी जीव-जन्तु कोशिकाओं से बने होते हैं भवन में इंटों की सरंचना काफी सरल होती है लेकिन किसी भी जीव में कोशिकाओं की सरंचना अधिक जटिल होती है। मनुष्य तथा दूसरे बड़े जीव जन्तुओं का शरीर कई खरबों कोशिकाओं से मिलकर बना होता हैद्य कोशिका जीवन का आधार है दुसरे शब्दों में कहे तो हर कोशिका जीवन देने में सक्षम है। आज कोशिका विज्ञान , स्टेम सेल की वजह से पूरे विश्व में चिकित्सा के क्षेत्र में क्रांति आ गयी है .इसकी मदत से तमाम असाध्य रोगों का इलाज होने के साथ साथ अंगों का प्रत्यारोपण भी हो रहा है ।कोशिका के विभिन्न पहलुओं पर शोध लगातार चल रहा है जिससे मानव सभ्यता में बड़े बदलाव के आसार है ।
दैनिक जागरण
स्टेम सेल के बाद कोशिकाओं के विकास, उनके बीच संवाद तथा जीवन को लेकर काफी रिसर्च हुई है। इस रिसर्च के बाद चिकित्सा जगत में काफी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। स्टेम सेल के माध्यम से कोशिकाओं के पुनर्निर्माण का कार्य प्रायोगिक तौर पर सारे विश्व में बड़े पैमाने पर हुआ। इसके सकारात्मक परिणाम भी चिकित्सकों तथा मरीजों को प्राप्त हुए हैं। इस बार इन तीनों वैज्ञानिकों ने संयुक्त रूप से कोशिकाओं के विकास तथा शरीर में उनके परिवहन को लेकर गहन अध्ययन किया इसमें वह सफल रहे, जिससे चिकित्सा जगत में एक नए युग की शुरुआत हो गई है। कुछ समय पहले ही ये साबित हो गया था कि कैसे एक मच्योर सेल यानी एक परिपक्व कोशिका महज त्वचा, मस्तिष्क या शरीर के किसी अंग विशेष के लिए ही काम नहीं करती, बल्कि इसे फिर से स्टेम सेल की तरह समर्थ बनाया जा सकता है। इससे यह शरीर के किसी दूसरे हिस्से में भी काम आ सकता है। इन तीनों वैज्ञानिकों की खोज ने पूरी दुनियाँ को बताया कि कोशिकाएं आपस में किस तरह से संवाद करती हैं और इस शानदार काम के लिए ही इन वैज्ञानिकों को फिजियोलॉजी की फील्ड में नोबेल प्राइज दिया गया है । नए स्टेम सेल के बनने का तरीका सामने लाने और मच्योर सेल को फिर उसी रूप में वापस ले आने से चिकित्सा के क्षेत्र में जबर्दस्त बदलाव आया है।लेकिन अब कोशिकाओं के परिवहन के विषय में नई जानकारी और शोध आने से चिकित्सा के क्षेत्र में पूरी दुनियाँ को बहुत फायदा होगा ।
नोबेल पाने वाले इन तीनों वैज्ञानिकों ने कोशिकाओं के अंदर संचरण के एकदम सही समय और सही स्थान पर संपन्न होने के लिए उत्तरदायी आणविक सिद्धांत का पता लगा लिया है और मानव कोशिकाओं में प्रमुख संचरण प्रणाली को विनियमित करने वाले उपकरण को विकसित करने में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है । कोशिकाओं के परिवर्तन प्रणाली तथा उनकी गतिविधियों का उपयोग अब एक सेल से दूसरे सेल को नियंत्रित करने के लिए भी किया जा सकेगा। 1970 में पहली बार इस खोज का प्रारंभिक परिणाम सामने आया था। 40 वर्षों के निरंतर शोध के बाद अब यह कहा जा सकता है कि वर्तमान शोध डॉक्टरों, वैज्ञानिकों ने अब सेल से जुड़े रहस्यों तक पहुंचने की सफलता जगत में मनचाहे सेल्स का निर्माण कर उनसे शारीरिक संरचना से जुड़ी सभी चीजों का निर्माण, आकार, प्रकार तथा बीमारियों से निपटने में हमारा चिकित्सा जगत सक्षम होगा। वास्तव में कोशिकाओं के जन्म से लेकर उनके आचार-विचार तथा परिवहन का अध्ययन कर निष्कर्षो को एक स्तर तक ले जाने वाले वैज्ञानिकों ने एक बड़ा काम किया है इससे चिकित्सा जगत में एक नए युग की शुरुआत होगी । article link http://epaper.jagran.com/epaperimages/12102013/delhi/11ned-pg8-0.pdf
http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/12-oct-2013-edition-National-page_8-1643-100696328-262.html


Filed under
#नोबेल पुरस्कार
Continue reading

Research

All in topic
नए नीले की खोज
Research

नए नीले की खोज

नए नीले की खोज चंद्रभूषण अमेरिकी केमिकल कंपनी ड्यूपॉन्ट में काम करते हुए बहुतेरे पेटेंट अपने नाम कर चुके भारतीय रसायनज्ञ मैस सुब्रह्मण्यन 2006 में कंपनी छोड़कर ओरेगॉन स्टेट यूनिवर्सिटी पहुंचे तो वहां मल्टीफेरोइक मटीरियल…

करोड़ो साल पुराने जीवाश्मों का खजाना
Research

करोड़ो साल पुराने जीवाश्मों का खजाना

52 करोड़ साल पुराने जीवाश्मों का खजाना चंद्रभूषण जीवाश्मशास्त्रियों के लिए मूसलों से ढोल बजाने का वक्त है। दक्षिण-मध्य चीन के हूपेई प्रांत में एक छोटी सी पहाड़ी नदी तानश्वी के किनारे उन्हें अतिप्राचीन जीवाश्मों का सबसे बड…

न्यूटन के तीसरे नियम के संशोधन पर इंटरव्यू
Research

न्यूटन के तीसरे नियम के संशोधन पर इंटरव्यू

*न्यूटन के तीसरे नियम के संशोधन पर अजय शर्मा जी का इंटरव्यू* *प्र.1*: न्यूटन की गति का तीसरा नियम क्या है? इसे कैसे समझा जा सकता है? *अजय शर्माः* न्यूटन ने तीसरा नियम अपनी पुस्तक प्रिसीपिया मे 1686 में दिया था इसके अनुसा…