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मानव मस्तिष्क से तुलना नहीं आप घर से बाहर निकलते हैं और अचानक आपको लगता है कुछ भूल रहे हैं. कुछ समय बाद उसे पॉकेट और इधर-उधर खोजने लगते हैं. फिर आप जो चीज खोज रहे होते हैं, बिल्कुल उसी तरह की कोई हमशक्ल चीज मिलती है और आ…

शोध और अनुसंधान से जुडी खास ख़बरें

मानव मस्तिष्क से तुलना नहीं
आप घर से बाहर निकलते हैं और अचानक आपको लगता है कुछ भूल रहे हैं. कुछ समय बाद उसे पॉकेट और इधर-उधर खोजने लगते हैं. फिर आप जो चीज खोज रहे होते हैं, बिल्कुल उसी तरह की कोई हमशक्ल चीज मिलती है और आप उसे लेकर चल देते हैं. लेकिन, क्या आप जानते हैं कि जिस काम को करने में आपको कुछ सेकेंड का वक्त लगा, वह काम कंप्यूटर दशकों तक विकास और जटिल गणनाओं को सुलझाने के बाद भी नहीं कर सकता है. दरअसल, वैज्ञानिकों का कहना है कि आज भले ही कंप्यूटर को मानव मस्तिष्क से काफी तेज बनाने की कोशिश की जा रही है. लेकिन, कंप्यूटर के साथ मानव मस्तिष्क की तुलना नहीं की जा सकती. हम दैनिक जीवन में अकसर छोटी-छोटी बातों को भूल जाते हैं और इस तरह उसकी समस्या का समाधान करते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि हमारे मस्तिष्क का बहुत बड़ा हिस्सा चीजों को देखने पर केंद्रित होता है. इसके बाद, मस्तिष्क का बाकी भाग अन्य कायरें में लगता है. दरअसल, एकस्टीन और उनकी टीम यह जानना चाहती थी कि हमारा मस्तिष्क किसी वस्तु को अपना लक्ष्य कैसे बनाता है. उन्होंने अपने शोध में जानना चाहा कि कैसे हम चीजों को खोजते हैं. हमें कैसे पता चलता है कि हमें वह चीज मिल गयी है, जिसे हम खोज रहे थे. उन्हें उनका जवाब डोरसल फ्रंटोपार्सियल नेटवर्क से मिला. यह मस्तिष्क का ऐसा क्षेत्र है जो किसी भी व्यक्ति के सिर के शीर्ष हिस्से तक सूचना पहुंचाता है. यह आंखों के हाव-भाव और ध्यान से भी संबंधित है. जब कोई चीज हम खोजने लगते हैं, तो यह क्षेत्र सक्रिय हो जाता है और उसके मिलने के बाद यह सूचना पहुंचाता है, जिससे हमें पता चलता है कि जो हम खोज रहे थे वह चीज मिल गयी है. हमारी पृथ्वी क्यों है शुष्क? पृथ्वी पर विशाल महासागर, लंबी-लंबी नदियां हैं. इसके दक्षिणी और उत्तरी ध्रुव पर ब.डे-ब.डे ग्लेशियर हैं. ऐसे में यह कभी नहीं लगता है पृथ्वी पर पानी की कोई कमी है. इसके बावजूद अंतरिक्ष वैज्ञानिक पृथ्वी पर पानी की कमी से आश्‍चर्यचकित रहे हैं. उनके मुताबिक, स्टैंडर्ड मॉडल यह बतलाता है कि किस तरह सौर मंडल का निर्माण हुआ. सौर मंडल चक्करदार पहिया की तरह गैसों और सूर्य के चारों ओर के धूलकणों से बना होगा. इससे पता चलता है कि अरबों वर्ष पहले हमारा ग्रह पानी की दुनिया थी. यह संभवत: सौर क्षेत्र में बर्फीले पदाथरें से बना होगा. उस क्षेत्र में जहां तापमान काफी सर्द रहा होगा. इस तरह, उनका आकलन है कि पृथ्वी पानीयुक्त पदाथरें से बना होगा. लेकिन, इन तथ्यों की अपेक्षा हमारी पृथ्वी शुष्क क्यों है? कॉमन अक्रीश्न-डिस्क मॉडल के नये विश्लेषण से पता चलता है कि किस तरह सारे ग्रहों के बनने में सूर्य के चारों ओर जमा मलबे ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. संभवत: इन्हीं मलबों की वजह से पृथ्वी में शुष्कता आयी होगी. रेबेका मार्टिन और मारियो लिविओ की अगुवाई वाली टीम ने अपने अध्ययन में पाया कि हमारा ग्रह चट्टानी मलबे वाले क्षेत्र (जिसे स्नो-लाइन के अंदर भी कहते हैं) में बना होगा. हमारे सौर मंडल में स्नो-लाइन फिलहाल धूमकेतु क्षेत्र में पड़ता है. यह क्षेत्र मंगल और बृहस्पति ग्रह के बीच का क्षेत्र है. इस सीमा के बाद सूर्य की रोशनी इतनी कमजोर होती है कि उससे बर्फीले मलबे नहीं पिघल सकते. इस तरह पृथ्वी इन बर्फीले मलबे वाले क्षेत्र में बनी, जिससे यह अपेक्षाकृत शुष्क है. आकाशगंगा व ब्लैक होल में संबंध ब्र ह्मांड में कई आकाशगंगाएं अपने केंद्र के काफी छोटी जगह में व्यापक मात्रा में आणविक गैसों को रखती हैं. यही, उा घनत्व वाली आणविक गैसें कई तारों की जन्म स्थली होती हैं. इससे भी अधिक, यह आकाशगंगाओं की केंद्रीय गतिविधियों से जुड़ी होती हैं. इस कारण आकाशगंगाओं के केंद्र में भौतिकीय अवस्था और रासायनिक गुणों का पता लगाना बहुत ही महत्वपूर्ण है. ऑब्र्जवेशन डाटा प्राप्त करने के लिए मिल्की-वे आकाशगंगा के केंद्र का अध्ययन करना सबसे अच्छा तरीका है. गौरतलब है कि हमारा सौर मंडल मिल्की-वे आकाशगंगा में ही पड़ता है. इस अध्ययन के दौरान शोध टीम ने 0.87 तरंग-दैध्र्य पर उत्सर्जन रेखा को देखा. इस दौरान उन्होंने पाया कि मिल्की-वे आकाशगंगा के केंद्र से कार्बन-मोनोक्साइड के अणु निकल रहे हैं. इसके बाद, शोध दल ने इस ऑब्र्जवेशन डाटा की तुलना उत्सर्जन रेखा से प्राप्त किये गये ऑब्जर्वेशन डाटा से की. इस आधार पर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि आणविक गैसें अधिक गर्म और घनी अवस्था में मिल्की-वे के केंद्र में चार गुच्छों में संकेंद्रित होती हैं. ये चार गुच्छे काफी तेज गति, लगभग 100 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से घूम रही हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि इन चारों में से एक सैजिटेरियस ए* मिल्की-वे आकाशगंगा के केंद्र में है. बाकी तीन गैस गुच्छे (गैस क्लप्स) एक पदार्थ हैं, जिन्हें पहली बार खोजा गया है. ऐसा माना जाता है कि सैजिटेरियस ए* विशालकाय ब्लैक-होल का स्थान है, जिसका द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान से लगभग 40 लाख गुना अधिक है. यह अनुमान लगाया जा सकता है कि गैस-क्लप सैजिटेरियस ए* डिस्क की आकार की तरह है. यह बहुत ही विशाल है, लेकिन इस ब्लैक-होल की खोज अभी तक नहीं की जा सकी थी. ल्यूकेमिया कोशिका में म्यूटेशन डायग्नोसिस के दौरान ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर) कोशिका में सैकड़ों म्यूटेशन यानी बदलाव होते हैं. लेकिन, इनमें से सभी बदलाव अचानक ही होते हैं. सबसे बड़ी बात यह कि इस म्यूटेशन का कैंसर से कुछ लेना-देना नहीं होता है. वाशिंगटन विश्‍वविद्यालय स्कूल ऑफ मेडिसिन के वैज्ञानिकों ने अपने नये शोध में पाया कि सामान्यत: रक्त में स्टेम कोशिकाएं नये स्वरूप में बदल जाती हैं. हालांकि, उनके शोध में बताया गया है कि एक सामान्य रक्त कोशिका बनाने के लिए दो या तीन जेनेटिक बदलाव की जरूरत होती है. शोध करने वाले वरिष्ठ वैज्ञानिक रिचर्ड के विल्सन का मानना है कि अब उनके पास इस बात की पुख्ता जानकारी है कि किस तरह एक्यूट ल्यूकेमिया विकसित होती है. कोशिकाओं में सैकड़ों का बदलाव का होना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि रोगियों में कुछ बदलाव से ही सामान्य कोशिकाएं एक कैंसर कोशिका में बदल जाती है. इन कोशिकाओं का पता लगाना सबसे महत्वपूर्ण है, ताकि कैंसर के इलाज को सफल बनाया जा सके. अब इसके लिए वैज्ञानिक यह पता लगा रहे हैं कि रक्त में स्वस्थ स्टेम सेल में किस तरह म्यूटेशन होता है. गौरतलब है कि प्रत्येक व्यक्ति के बोन मैरो (अस्थि मज्जा) में 10,000 रक्त कोशिकाएं होती हैं और शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रत्येक स्टेम कोशिकाएं एक साल में लगभग 10 बार म्यूटेट यानी स्वरूप बदलती हैं. इस तरह किसी 50 वर्षीय व्यक्ति की रक्त कोशिका में यह म्यूटेशन 500 बार होगा. इसके बावजूद उनका कहना है कि हमारे शोध में यह कहीं नहीं मिला कि इन बदलावों से किसी अन्य तरह के कैंसर हो सकते हैं.


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