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एलपीजी का सशक्त विकल्प है बायोगैस

डॉ. शशांक द्विवेदी परियोजना प्रबंधक , टीएसएससी (कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय , भारत सरकार) भारत आज ऊर्जा परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। एक ओर प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी योजनाओं ने करोड़ों घरों तक…

एलपीजी का सशक्त विकल्प है बायोगैस

डॉ. शशांक द्विवेदी

परियोजना प्रबंधक,टीएसएससी

(कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय,भारत सरकार)

भारत आज ऊर्जा परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। एक ओर प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी योजनाओं ने करोड़ों घरों तक एलपीजी पहुंचाकर स्वच्छ ईंधन की क्रांति लाई है, वहीं दूसरी ओर बढ़ती आयात निर्भरता, कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक भू-राजनीतिक संकटों ने देश की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। हाल के समय में पश्चिम एशिया के तनाव के कारण एलपीजी आपूर्ति प्रभावित होने की घटनाओं ने इस चिंता को और गहरा किया है . अमेरिका–इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। यह स्थिति भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देश के लिए एक चेतावनी है कि अब ऊर्जा सुरक्षा के प्रश्न को टालना संभव नहीं है।अंतरराष्ट्रीय संकटों का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ता है—पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ते हैं, महंगाई बढ़ती है और घरेलू रसोई तक प्रभावित होती है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि हम पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों के विकल्प तलाशें। इसी संदर्भ में बायोगैस एक मजबूत और टिकाऊ समाधान के रूप में उभरती है।

बायोगैस जैविक कचरे—जैसे गोबर, कृषि अवशेष, रसोई कचरा आदि—से उत्पन्न गैस है, जिसमें मुख्य रूप से मीथेन होती है। यह गैस खाना पकाने, बिजली उत्पादन और वाहन ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल की जा सकती है।भारत जैसे कृषि प्रधान देश में बायोगैस की अपार संभावनाएं हैं। गांवों में पशुधन और जैविक कचरे की उपलब्धता इसे एक व्यवहारिक विकल्प बनाती है।

एलपीजी का विकल्प कैसे बन सकती है बायोगैस?

गांवों में छोटे और मध्यम आकार के बायोगैस प्लांट स्थापित कर स्थानीय स्तर पर गैस का उत्पादन किया जा सकता है। इससे एलपीजी सिलेंडर पर निर्भरता कम होगी। आधुनिक तकनीक के माध्यम से बायोगैस को शुद्ध कर कंप्रेस्ड बायोगैस (CBG) बनाया जा सकता है, जो एलपीजी और सीएनजी का प्रभावी विकल्प है। ‘गोबर-धन योजना’ और ‘SATAT’ (Sustainable Alternative Towards Affordable Transportation) जैसी योजनाएं बायोगैस उत्पादन को बढ़ावा दे रही हैं। इनके माध्यम से किसानों और उद्यमियों को आर्थिक सहायता और बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है। शहरों में निकलने वाले जैविक कचरे को बायोगैस में बदलकर न केवल ऊर्जा पैदा की जा सकती है, बल्कि कचरा प्रबंधन की समस्या का भी समाधान किया जा सकता है।

भारत में एलपीजी (रसोई गैस) की स्थिति

भारत में एलपीजी की सालाना खपत लगभग 28–31 मिलियन टन (MMT) के आसपास है भारत में एलपीजी का घरेलू उत्पादन लगभग 10–12 MMT प्रति वर्ष है। यानी कुल मांग का केवल 35–40% ही देश में बनता है .भारत को हर साल लगभग 18–22 MMT LPG आयात करनी पड़ती है . यानी 60–65% LPG आयात पर निर्भरता .भारत आधा से ज्यादा एलपीजी बाहर से खरीदता है ।आयात का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट (खाड़ी देशों) से आता है।इसलिए हॉर्मुज स्ट्रेट जैसे संकट भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए सीधा खतरा हैं ।

भारत में अभी लगभग 132 CBG (Compressed Biogas) प्लांट चल रहे हैं . इनकी कुल उत्पादन क्षमता लगभग 920 टन प्रति दिन है . 920 टन/दिन ≈ 3.3 लाख टन/वर्ष (0.33 MMT) . अभी बायोगैस का योगदान 1% से भी कम है । भारत 20 MMT CBG बना सकता है . कुल संभावित क्षमता (कचरा + गोबर + कृषि). कुल क्षमता लगभग 60 MMT तक मानी जाती है । इसका मतलब भारत अपनी पूरी LPG जरूरत (30 MMT) बायोगैस से पूरा कर सकता है । फिलहाल अभी लगभग 300+ नए प्लांट निर्माणाधीन हैं। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार भारत 2030 तक बायोगैस उत्पादन 7 गुना तक बढ़ सकता है।

बायोगैस न केवल सस्ती है बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी है। इससे कार्बन उत्सर्जन कम होता है, जैविक खाद (स्लरी) मिलती है और किसानों की आय बढ़ती है। साथ ही, यह स्थानीय रोजगार के अवसर भी पैदा करती है। हालांकि बायोगैस के क्षेत्र में कुछ चुनौतियां भी हैं—जैसे शुरुआती निवेश, तकनीकी जानकारी की कमी और जागरूकता का अभाव। भारत में बायोगैस को लेकर अभी भी कई भ्रांतियाँ हैं। कई लोग इसे “गांव की तकनीक” मानते हैं या इसके उपयोग में असुविधा महसूस करते हैं।दूसरी ओर, एलपीजी को आधुनिक, सुरक्षित और सुविधाजनक ईंधन के रूप में देखा जाता है। यही कारण है कि शहरी और यहां तक कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग एलपीजी को प्राथमिकता देते हैं।इसके लिए जरूरी है कि सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और तकनीकी समर्थन उपलब्ध कराएं।

वर्तमान वैश्विक संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता है। बायोगैस जैसे स्वदेशी और टिकाऊ विकल्पों को अपनाकर भारत न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकता है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम बढ़ा सकता है।

आज जरूरत है एक समन्वित प्रयास की—नीतियों, तकनीक और जनभागीदारी के जरिए—ताकि बायोगैस को एलपीजी का वास्तविक विकल्प बनाया जा सके और भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सके।

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