जहाँ तक उच्च शिक्षा के निजीकरण का संबंध है, तो इस बारे में 1990 के दशक में लिये गये नीतिगत परिवर्तन के फैसलों के पीछे सबसे बड़ा कारण विश्व व्यापार संगठन के सदस्य देशों द्वारा सेवा क्षेत्र में व्यापार के लिए आम सहमति पत्र (गैट्स) पर हस्ताक्षर करना था। शिक्षा एक विशाल सेवा-उद्योग है, जिस पर विश्व में 47 लाख करोड़ की राशि व्यय की जाती है, तथा यह उन बारह प्रमुख सेवा क्षेत्रों में से एक है, जिन्हें गैट्स के अंतर्गत सदस्य देशों ने स्वीकार किया है। उच्च शिक्षा के निजीकरण के संदर्भ में शिक्षकों के लिए गठित पांचवे वेतन आयोग ने भी बड़ी भूमिका अदा की है। इनके माधयम से शिक्षकों के वेतनमान और अब छठवें वेतनमान में इतनी वृध्दि कर दी गई है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय और विश्व विद्यालय अनुदान आयोग के लिए उस आर्थिक बोझ को उठाना असंभव हो गया। राज्य सरकारों की स्थिति पहले से ही खराब चल रही है। ऐसे में शिक्षकों के वेतन तथा अन्य कई व्ययों का भार कमर तोड़ देने वाला सिध्द हो रहा है। दूसरी ओर उच्च शिक्षा संस्थानों में एकीकृत छात्रों की संख्या में 24 प्रतिशत की दर से वृध्दि हो रही थी। इसी को देखते हुए शिक्षा के क्षेत्र में निजी पूंजी निवेश के दरवाजे खोले गए। निजी क्षेत्र के सहयोग से ही इन छात्रों की ज़रूरतें पूरी हो सकती हैं। सरकार ने शिक्षा के लिए निजी क्षेत्र को आमंत्रित तो किया है, लेकिन प्रबंधन की अक्षमता और मनमानी पर अंकुश नहीं लगाया है। निजी क्षेत्र के कई मेडिकल कॉलेजों की जांच करने पर पाया गया कि वहाँ सीटी स्कैन, ऑक्सीजन, वेन्टीलेटर, कार्डियक मॉनीटर जैसे आधारभूत उपकरण तक नहीं हैं। वस्तुत: उच्च शिक्षा प्रदान करने वाले निजी विश्वविद्यालयों को स्वीकृति देते समय केंद्र और राज्य सरकारें अपने राजनीतिक स्वार्थों और दलीय हितों को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति से निजात नहीं पा सकी हैं। इस प्रकार इन संस्थाओं को संचालित करने वाले सभी निर्धारित नियमों, उपनियमों, मानदंडों और शर्तों की अनदेखी करके व्यक्तिगत हित साधन से लग जाते हैं। निजी कॉलेज छात्रों से मनमानी फीस और अवैध धन वसूलने से बाज नहीं आते। वास्तविकता यह है कि एक ओर जहाँ उच्च स्तरीय शिक्षा का दायित्व उठाना सरकार ने अपने बूते से बाहर की बात मान ली है, वहीं शिक्षा संस्थाओं की कमी को पूरा करने के नाम पर कुकरमुत्तों की तरह उग आये संस्थानों से देश की उच्च स्तरीय शिक्षा के समूचे ढांचे पर प्रश्नचिन्ह लग गए हैं। हालांकि निजी क्षेत्र के कुछ शिक्षा संस्थान, सरकारी क्षेत्र के शिक्षा संस्थानों की अपेक्षा अधिक गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान कर रहे हैं, अत: निजी क्षेत्र की भूमिका को समाप्त करने की ज़रूरत नहीं है। गुणवत्ता बनाए रखने के लिए केंद्र व राज्य सरकारों को मूकदर्शक की अपनी मुद्रा छोड़कर एक सक्रिय पर्यवेक्षक की भूमिका में आना होगा, अन्यथा निजी हाथों में उच्च शिक्षा कुछ मुट्ठी भर पूंजीपतियों की तिजोरियों को भरने और देश के युवकों के भविष्य को निराशा के अंधेरे में झोंकने का जरिया बन कर रह जाएगी। इन संस्थानों को मान्यता देते समय ख्याति प्राप्त संस्थाओं को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। इन संस्थानों में शिक्षक शिक्षार्थी अनुपात सुनिश्चित करने के लिए कड़े नियम निर्धारित किए जाने चाहिए। इन संस्थानों की गुणवत्ता और उनके उत्पाद की प्रभावशीलता की जांच के लिए भी संस्थागत प्राधिकरण का प्रावधान होना चाहिए जो नियमित जांच सुनिश्चित करे। निजीकरण की इस प्रक्रिया में सरकारी हस्तक्षेप द्वारा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि निजी संस्थाओं में निर्धन तबकों के हितों का भी पूरा धयान रखा जा रहा है। इससे यह भी सुनिश्चित किया जा सकेगा कि निजीकरण का परिणाम शिक्षा का पूर्णत: व्यवसायीकरण नहीं होता। शिक्षा विकास की अनिवार्य शर्त है और सरकार के पास इसके लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन नहीं है। ऐसी स्थिति में निजीकरण ही एक उपाय है जिसे सरकारी निगरानी के अंतर्गत विभिन्न दिशा निर्देशों के द्वारा लागू करना चाहिए। तभी यह प्रक्रिया समाजोपयोगी होने के साथ-साथ शिक्षा को मूल्य प्रभावी भी बनाएगी।
जहाँ तक उच्च शिक्षा के निजीकरण का संबंध है, तो इस बारे में 1990 के दशक में लिये गये नीतिगत परिवर्तन के फैसलों के पीछे सबसे बड़ा कारण विश्व व्यापार संगठन के सदस्य देशों द्वारा सेवा क्षेत्र में व्यापार के लिए आम सहमति पत्र (गैट्स) पर हस्ताक्षर करना था। शिक्षा एक विशाल सेवा-उद्योग है, जिस पर विश्व में 47 लाख करोड़ की राशि व्यय की जाती है, तथा यह उन बारह प्रमुख सेवा क्षेत्रों में से एक है, जिन्हें गैट्स के अंतर्गत सदस्य देशों ने स्वीकार किया है। उच्च शिक्षा के निजीकरण के संदर्भ में शिक्षकों के लिए गठित पांचवे वेतन आयोग ने भी बड़ी भूमिका अदा की है। इनके माधयम से शिक्षकों के वेतनमान और अब छठवें वेतनमान में इतनी वृध्दि कर दी गई है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय और विश्व विद्यालय अनुदान आयोग के लिए उस आर्थिक बोझ को उठाना असंभव हो गया। राज्य सरकारों की स्थिति पहले से ही खराब चल रही है। ऐसे में शिक्षकों के वेतन तथा अन्य कई व्ययों का भार कमर तोड़ देने वाला सिध्द हो रहा है। दूसरी ओर उच्च शिक्षा संस्थानों में एकीकृत छात्रों की संख्या में 24 प्रतिशत की दर से वृध्दि हो रही थी। इसी को देखते हुए शिक्षा के क्षेत्र में निजी पूंजी निवेश के दरवाजे खोले गए। निजी क्षेत्र के सहयोग से ही इन छात्रों की ज़रूरतें पूरी हो सकती हैं। सरकार ने शिक्षा के लिए निजी क्षेत्र को आमंत्रित तो किया है, लेकिन प्रबंधन की अक्षमता और मनमानी पर अंकुश नहीं लगाया है। निजी क्षेत्र के कई मेडिकल कॉलेजों की जांच करने पर पाया गया कि वहाँ सीटी स्कैन, ऑक्सीजन, वेन्टीलेटर, कार्डियक मॉनीटर जैसे आधारभूत उपकरण तक नहीं हैं। वस्तुत: उच्च शिक्षा प्रदान करने वाले निजी विश्वविद्यालयों को स्वीकृति देते समय केंद्र और राज्य सरकारें अपने राजनीतिक स्वार्थों और दलीय हितों को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति से निजात नहीं पा सकी हैं। इस प्रकार इन संस्थाओं को संचालित करने वाले सभी निर्धारित नियमों, उपनियमों, मानदंडों और शर्तों की अनदेखी करके व्यक्तिगत हित साधन से लग जाते हैं। निजी कॉलेज छात्रों से मनमानी फीस और अवैध धन वसूलने से बाज नहीं आते। वास्तविकता यह है कि एक ओर जहाँ उच्च स्तरीय शिक्षा का दायित्व उठाना सरकार ने अपने बूते से बाहर की बात मान ली है, वहीं शिक्षा संस्थाओं की कमी को पूरा करने के नाम पर कुकरमुत्तों की तरह उग आये संस्थानों से देश की उच्च स्तरीय शिक्षा के समूचे ढांचे पर प्रश्नचिन्ह लग गए हैं। हालांकि निजी क्षेत्र के कुछ शिक्षा संस्थान, सरकारी क्षेत्र के शिक्षा संस्थानों की अपेक्षा अधिक गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान कर रहे हैं, अत: निजी क्षेत्र की भूमिका को समाप्त करने की ज़रूरत नहीं है। गुणवत्ता बनाए रखने के लिए केंद्र व राज्य सरकारों को मूकदर्शक की अपनी मुद्रा छोड़कर एक सक्रिय पर्यवेक्षक की भूमिका में आना होगा, अन्यथा निजी हाथों में उच्च शिक्षा कुछ मुट्ठी भर पूंजीपतियों की तिजोरियों को भरने और देश के युवकों के भविष्य को निराशा के अंधेरे में झोंकने का जरिया बन कर रह जाएगी। इन संस्थानों को मान्यता देते समय ख्याति प्राप्त संस्थाओं को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। इन संस्थानों में शिक्षक शिक्षार्थी अनुपात सुनिश्चित करने के लिए कड़े नियम निर्धारित किए जाने चाहिए। इन संस्थानों की गुणवत्ता और उनके उत्पाद की प्रभावशीलता की जांच के लिए भी संस्थागत प्राधिकरण का प्रावधान होना चाहिए जो नियमित जांच सुनिश्चित करे। निजीकरण की इस प्रक्रिया में सरकारी हस्तक्षेप द्वारा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि निजी संस्थाओं में निर्धन तबकों के हितों का भी पूरा धयान रखा जा रहा है। इससे यह भी सुनिश्चित किया जा सकेगा कि निजीकरण का परिणाम शिक्षा का पूर्णत: व्यवसायीकरण नहीं होता। शिक्षा विकास की अनिवार्य शर्त है और सरकार के पास इसके लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन नहीं है। ऐसी स्थिति में निजीकरण ही एक उपाय है जिसे सरकारी निगरानी के अंतर्गत विभिन्न दिशा निर्देशों के द्वारा लागू करना चाहिए। तभी यह प्रक्रिया समाजोपयोगी होने के साथ-साथ शिक्षा को मूल्य प्रभावी भी बनाएगी।