Skip to content
Special Articles

विज्ञान के तीनों नोबेल

विज्ञान के तीनों नोबेल आम दायरे में मौजूद खोजों को चंद्रभूषण यों तो नोबेल पुरस्कार हैं ही व्यावहारिक खोजों के लिए, लेकिन अक्सर हम इनका सेहरा ऐसे शोधों और अविष्कारों के सिर बंधते देखते हैं जिन्हें समझना आम लोगों के बूते क…

विज्ञान के तीनों नोबेल
विज्ञान के तीनों नोबेल आम दायरे में मौजूद खोजों को
चंद्रभूषण

यों तो नोबेल पुरस्कार हैं ही व्यावहारिक खोजों के लिए, लेकिन अक्सर हम इनका सेहरा ऐसे शोधों और अविष्कारों के सिर बंधते देखते हैं जिन्हें समझना आम लोगों के बूते की बात नहीं होती। यह विरला मौका है कि इस बार के तीनों साइंस नोबेल आम इस्तेमाल वाली या जन सामान्य के विमर्श में शामिल आविष्कारों या खोजों के लिए दिए गए हैं। चिकित्साशास्त्र का नोबेल फिजियॉलजी (शरीर क्रिया विज्ञान) के एक बुनियादी काम के लिए, भौतिकी का नोबेल एस्ट्रोफिजिक्स (तारा भौतिकी) के दो सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए, और रसायनशास्त्र का नोबेल वैसे तो मटीरियल साइंस के लिए, लेकिन सीधे तौर पर कहें तो हर हाथ में थमे मोबाइल फोन की लीथियम आयन बैट्री के लिए।

चिकित्साशास्त्र का नोबेल एपॉक्सिया और एपॉक्सीमिया पर काम करने वाले वैज्ञानिकों को मिला है। एपॉक्सीमिया यानी खून में ऑक्सिजन कम होना और एपॉक्सिया यानी ऑक्सिजन की कमी से शरीर की किसी खास पेशी या कई पेशियों का दम घुट जाना। किसी चोटिल व्यक्ति का कोई अंग अगर आपको गहरा लाल और फिर काला पड़ता दिखे तो इसका सीधा मतलब है कि ऑक्सिजन की कमी से वहां की कोशिकाएं मरने की शुरुआत हो चुकी है। ऐसा अगर दिल या दिमाग जैसे किसी जीवन-मरण से जुड़े अंग के साथ हो जाए तो स्ट्रोक से तत्काल मौत हो सकती है।

नोबेल प्राप्त शोधार्थियों ने इस बात का पता लगाया कि कोशिकाओं द्वारा जरूरत पड़ने पर अधिक ऑक्सिजन ग्रहण करने और जरूरत खत्म हो जाने पर ऑक्सिजन इनटेक के पुराने संतुलन में लौट जाने का मेकेनिज्म क्या है। कैंसर का ट्यूमर अपने लिए नई रक्त वाहिकाएं कैसे बना लेता है, यह सवाल भी इस शास्त्र को छूते हुए गुजरता है। एक बड़ी बात यह कि इसी शास्त्र के आधार पर काम करने वाली और मानव शरीर के लिए कई जानलेवा स्थितियों में कारगर एक दवा पिछले साल से चीन में बिकने भी लगी है, हालांकि अमेरिका में इसके परीक्षण अभी पूरे नहीं हुए हैं। इस क्रम में कोशिकाओं के सांस लेने की प्रणाली की डीएनए स्तर पर मौजूद एक गहरी पेचीदगी जीवविज्ञान की पकड़ में आ गई तो उसे बोनस समझा जाना चाहिए।

भौतिकी के नोबेल का संबंध तारा भौतिकी से है, जो रोजमर्रा जीवन का शास्त्र नहीं है। लेकिन जो वैज्ञानिक इससे पुरस्कृत हुए हैं उनमें दो का संबंध सौरमंडल से इतर अन्य तारों के ग्रहों की खोज से है, जिस पर संसार की हर भाषा में लगभग हर हफ्ते कोई न कोई लेख लोगों को पढ़ने को मिल जाता है। पिछले तीस वर्षों में उभरे इस नए शास्त्र की मूल उत्सुकता- ‘क्या ब्रह्मांड में पृथ्वी के अलावा कहीं और जीवन है’, या ‘क्या सृष्टि में कहीं मनुष्य से अधिक बुद्धिमान कोई प्राणी भी है’- जैसे सवालों से ही उपजी है। लेकिन धीरे-धीरे इसका स्वरूप जमीनी हो रहा है और इसके तहत तमाम तरह के संभावित ग्रहों का अध्ययन किया जा रहा है। इसके लिए फिलहाल 4000 से ज्यादा ऑब्जर्व्ड कैंडिडेट मौजूद हैं, जिनके ब्यौरों के लिए जेम्स वेब टेलिस्कोप छोड़े जाने का इंतजार है। अलबत्ता इस पुरस्कार का आधा हिस्सा ब्रह्मांड के उद्भव और विकास से जुड़ी स्थापित थीसिस के लिए दिया गया है, जिस तक पहुंच अपेक्षाकृत कम पाठकों की है।

सबसे ज्यादा दिलचस्प रहा रसायनशास्त्र का नोबेल, जिसमें फोन, कैमरा और कैमकॉर्डर जैसी चीजों में काम आने वाली छोटी, पावरफुल लीथियम आयन बैट्री के विविध पहलुओं पर काम करने वाले वैज्ञानिकों को पुरस्कृत किया गया। अभी कुछ साल पहले तक इतनी ताकतवर चीज की कल्पना करना भी कठिन था लेकिन इन बैटरियों का इस्तेमाल अब फोन जैसी छोटी चीजें ही नहीं, भारी ट्रक चलाने में भी होने लगा है। अलबत्ता इसके साथ एक ही तकनीकी समस्या है कि इस्तेमाल होने के दौरान यह गरम होती है और इस क्रम में बड़ी तेजी से फूलती है। फोन को एक छोटा-मोटा बम बना देने वाली इस बीमारी का हल खोजे बिना लीथियम आयन बैट्री को फूलप्रूफ आविष्कार नहीं कहा जा सकता। इसकी दूसरी समस्या लीथियम की महंगाई से जुड़ी है, जिसकी कीमत 2016 से 2018 के बीच ही दोगुनी हो गई और अगले दशक में दस गुनी हो सकती है!
Continue reading

Special Articles

All in topic
एलपीजी का सशक्त विकल्प है बायोगैस
Special Articles

एलपीजी का सशक्त विकल्प है बायोगैस

डॉ. शशांक द्विवेदी परियोजना प्रबंधक , टीएसएससी (कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय , भारत सरकार) भारत आज ऊर्जा परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। एक ओर प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी योजनाओं ने करोड़ों घरों तक…

एआई के युग में इंसान को आगे रखने वाली क्षमताएँ
Special Articles

एआई के युग में इंसान को आगे रखने वाली क्षमताएँ

आज हम ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) हमारे जीवन, कामकाज और सोचने के तरीके को बदल रही है। एआई आज हर क्षेत्र—शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, बैंकिंग, उद्योग, मीडिया—में अपनी…

इतनी बिजली क्यों खाती है एआई
Special Articles

इतनी बिजली क्यों खाती है एआई

चंद्रभूषण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्लाउड कंप्यूटिंग की चर्चा अभी दुनिया में सबसे ज्यादा बिजली खाने वाली तकनीकों की तरह हो रही है। सन 2022 में लगाए गए हिसाब के मुताबिक ये दोनों उस समय दुनिया की दो फीसदी बिजली हजम कर रही…