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मेटा: मनचाही दुनिया में रहने की आजादी

बचपन में आपने भी 'एलिस इन वंडरलैंड' की कहानी पढ़ी होगी। इसमें एलिस नाम की लड़की किसी अनूठी दुनिया में पहुंच जाती है। कुछ दशक पहले जब मोबाइल इंटरनेट आया तो किसी को अंदाजा नहीं था कि इसके सहारे हम भी किसी अनूठी दुनिया में…

 मेटा: मनचाही दुनिया में रहने की आजादी

बचपन में आपने भी 'एलिस इन वंडरलैंड' की कहानी पढ़ी होगी। इसमें एलिस नाम की लड़की किसी अनूठी दुनिया में पहुंच जाती है। कुछ दशक पहले जब मोबाइल इंटरनेट आया तो किसी को अंदाजा नहीं था कि इसके सहारे हम भी किसी अनूठी दुनिया में पहुंच सकते हैं। यह दुनिया है मेटावर्स। वर्चुअल रिएलिटी हमें इससे जोड़कर रखेगी। फेसबुक ने पिछले दिनों कंपनी का नाम बदलते हुए इसका खुलासा किया। लेकिन क्या फेसबुक अकेले ही मेटावर्स तैयार कर रही है? मेटावर्स से हमारी ज़िंदगी किस तरह बदल जाएगी? इस बारे में जानकारी दे रही हैं रजनी शर्मा

हम सबको कल्पना की दुनिया अच्छी लगती है। कोई सुपर पावर मिल जाए तो पलक झपकते ही एक जगह से गायब हुए और दूसरी जगह प्रकट हो गए। साइंस-फिक्शन मूवीज़ में भी ऐसा ही दिखाया जाता है। अब कल्पना करें कि हाथ में फोन पकड़ना न पड़े, हवा में हाथ लहरा दें तो हमारे सामने स्क्रीन प्रकट हो जाए। कंप्यूटर हो लेकिन टाइप न करना पड़े, हमारे सोचते ही सब कुछ लिखा हुआ दिखने लगे। घर बैठे-बैठे ही दुनिया के किसी भी मॉल में घूमकर शॉपिंग कर लें। क्या यह सच हो सकता है? इस सवाल का जवाब जल्द ही मिलेगा। उससे पहले जान लेते हैं कुछ खास बातें:


ये मेटा-मेटा क्या है?

मेटावर्स के बारे में बात करने से पहले यह जान लेते हैं कि मेटा (Meta) क्या है और फेसबुक ने अपनी कंपनी के लिए यही नाम क्यों चुना। असल में मेटा ग्रीक शब्द है जिसका अंग्रेजी में मतलब होता है बियॉन्ड यानी आगे या उस पार। यह उपसर्ग के तौर पर इस्तेमाल होता है। आपने इससे बने शब्द मेटाबॉलिजम, मेटाडाटा, मेटाफिजिक्स जैसे शब्द सुने होंगे। अब मेटा को यूनिवर्स के साथ जोड़कर मेटावर्स बनाया गया है। इस तरह यह हमारे यूनिवर्स के साथ-साथ रची जा रही काल्पनिक दुनिया होगी। अब तक हम इंटरनेट से जो कुछ करते थे उसे अपने सामने किसी स्क्रीन पर देखते थे। लेकिन मेटावर्स में हम उसका हिस्सा होंगे यानी कि स्क्रीन के उस पार भी पहुंच जाएंगे। इसके लिए कुछ डिवाइस जैसे वर्चुअल रियलिटी हेडसेट्स, आग्युमेंटिड रियलिटी ग्लासेज़ या स्मार्ट चश्मे, स्मार्टफोन जैसी चीजों की जरूरत होगी। अब तक अगर हम साइबर स्पेस का जिक्र करते थे तो अब धीरे-धीरे यह मेटावर्स में बदल जाएगा। सवाल उठता है कि क्या मेटावर्स फेसबुक की खोज है? तो इसका जवाब है, नहीं। साल 1992 में साइंस फिक्शन लेखक नील स्टीफेंसन ने अपने नॉवेल 'स्नो क्रैश' में इसका इस्तमाल किया था। उनकी किताब में मेटावर्स एक ऐसी दुनिया है जहां लोग गेमिंग हेडफोन और वर्चुअल रियलिटी की मदद से आपस में जुड़े होते हैं। वहां लोग उस जगह मौजूद नहीं होकर भी मौजूद होते हैं।


फेसबुक: नाम बदलने की 5 वजहें

1. अपने ऐप्स एक छतरी के नीचे लाना : पिछले दिनों फेसबुक के फाउंडर मार्क जुकरबर्ग ने ऐलान किया कि जिस तरह गूगल की पैरंट कंपनी अल्फाबेट है वैसे ही फेसबुक की पैरंट कंपनी मेटा होगी। फेसबुक के अलावा इंस्टाग्राम, वट्सऐप और मैसेंजर जैसे सभी प्लैटफॉर्म मेटा के तहत आ गए हैं। अब आप वट्सऐप या इंस्टाग्राम अकाउंट खोलें तो पाएंगे कि जहां पहले एक छोटी-सी लाइन में 'बाइ फेसबुक' लिखा होता था वहां अब मेटा लिखा दिखने लगा है।


2. भविष्य की सोच : दोस्तों को साथ जोड़ने के लिए फेसबुक जैसा सोशल प्लैटफॉर्म देने वाले जुकरबर्ग चाहते हैं कि अब उन्हें सिर्फ सोशल मीडिया कंपनी न समझा जाए। जुकरबर्ग के मुताबिक, ये बदलाव मेटावर्स पर फोकस करने के लिए किया गया है। आने वाले समय में मेटावर्स दुनिया की असलियत होगी। वह मेटावर्स तकनीक की इस रेस में पीछे नहीं रहना चाहते। इसलिए अभी से तैयारी शुरू कर दी है। इस दिशा में मेटा नाम रखना ही सबसे पहला कदम है। पिछले दिनों आए कुछ आंकड़ों में बताया गया कि युवा फेसबुक से किनारा कर रहे हैं तो मेटावर्स के माध्यम से अब उन्हें लुभाया जाएगा।


3. नए यूनिवर्स से होड़ की खातिर : ऐसा नहीं होगा कि फेसबुक ने मेटावर्स पर फोकस करने की बात सोची है तो बाकी तकनीकी कंपनियां नहीं सोचेंगी। इसलिए सोशल कनेक्ट की दुनिया में पहले से अपना सिक्का जमाने वाले जुकरबर्ग ने अभी से नए ऐप्स और डिवाइस बनाने वाली कंपनियों को साथ लाना

शुरू कर दिया है।


4. ध्यान भटकाने के लिए : फेसबुक का नाम बदलने की बात पर चाहे जो भी दावे किए गए हों लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं कि यह पूरा मामला असल मुद्दे से ध्यान हटाने की कोशिश है। वैसे पहले भी मुश्किल वक्त आने पर कंपनियां अपनी इमेज बदलने के लिए नाम बदलकर ब्रांडिंग करती रही हैं। फिलहाल फेसबुक की इमेज मजबूत कंपनी की नहीं है तो उसे बनाने की कोशिश है। जहां तक मेटावर्स की बात है तो अभी सब कुछ कल्पना पर ही आधारित है।


5. गंभीर इल्जामों से बचने के लिए : फेसबुक डेटा लीक, चुनाव कैंपेन में अपनी भूमिका समेत कई मुद्दों को लेकर विवादों में रही है। साल 2018 में जब करीब 5 करोड़ यूजर्स का डेटा लीक होने की बात सामने आई तो जुकरबर्ग ने गलती मानी थी। इसलिए मेटा से माहौल बदला जा रहा है।


थोड़ी हकीकत, थोड़ा फसाना

एक्सपर्ट बता रहे हैं कि मेटावर्स सिर्फ वर्चुअल रिएलिटी नहीं है। इसे वर्चुअल और ऑग्मेंटिड रिएलिटी, दोनों ही तरह के प्लैटफॉर्म से ऑपरेट किया जा सकता है। वर्चुअल रिएलिटी में जहां हमारे आसपास पूरी तरह से काल्पनिक दुनिया क्रिएट की जाती है जो हम वीआर हेडसेट लगाकर गेमिंग करते हुए भी पाते हैं। वहीं ऑग्मेंटिड रिएलिटी में हमारी असली दुनिया में ही काल्पनिक चीजें जुड़ जाती हैं। आजकल कुछ ई-कॉमर्स साइट्स पर भी यह प्रयोग देखा जा सकता है। मान लें कि हमें कोई सोफा खरीदना है तो हम उसे सेलेक्ट कर अपने घर की उस जगह की ओर फोन का कैमरा फोकस करेंगे जहां उस सोफे को खरीदने के बाद रखना चाहते हैं। तुरंत ही सोफा वहां रखा हुआ दिखने लगेगा और सही सेटिंग लग रही है तो हम वह सोफा खरीद सकते हैं। मेटावर्स में इसी तरह से एआर और वीआर की मदद से काम होंगे। इसके लिए हमारे पास कंप्यूटर, लैपटॉप या मोबाइल फोन होने चाहिए। जैसे हम सोशल मीडिया पर हर दिन लोगों को देखते हैं वैसे ही वहां भी देख सकेंगे। लेकिन फर्क बस इतना होगा कि हम खुद उस दुनिया में मौजूद होंगे। हम अपना थ्रीडी अवतार तैयार कर सकेंगे और उसके माध्यम से वहां होना महसूस होगा। नई तकनीक वाले वीआर हेडसेट्स में साउंड, मोशन और डिस्प्ले की सेटिंग होती है। फेसबुक ने साल 2019 में होराइज़न लॉन्च किया था। यह लोगों को वर्चुअल दुनिया में ले जाने का माध्यम था। इसके बाद कोरोना का दौर आया तो होराइजन वर्करूम्स भी लॉन्च किया गया। इसके लिए वीआर हेडसेड लगाकर ऐसा महसूस किया जा सकता है कि लोग अपने ऑफिस में बैठकर ही काम कर रहे हैं। हालांकि लॉकडाउन की वजह से दफ्तर का काम घर से ही हो रहा था लेकिन माहौल बनाने की हुई। यह असली दफ्तर में बैठकर काम करने जैसा ही है। लेकिन मेटावर्स में कोई शख्स खुद को सिर्फ कार्टून की शक्ल में नहीं देखेगा बल्कि अपना स्मार्ट अवतार चुन सकेगा।


कुछ ऐसे भी होंगे काम

-जुकरबर्ग कहते हैं कि अगर मेरे पैरंट्स मेरे बच्चों से फोन पर बात कर रहे हैं तो उनके करीब न होते हुए भी वे ऐसा महसूस कर सकते हैं कि वे साथ ही हैं। सब कुछ महसूस किया जा सकता है, जैसे, हाथ मिलाना, गले लगाना।

-गेम खेलने के लिए खुद को कार्टून करैक्टर बना सकेंगे। गेमिंग जोन में दोस्तों को भी बुला सकेंगे। वैसे मेटावर्स में गेमिंग कंपनियों के लिए बहुत मौके होंगे। दुनिया के कई बड़े ऐक्टर अपने डिजिटल अवतार इस्तेमाल करने की इजाजत दे रहे हैं।

-मान लें कि हम ऑफिस में हैं और हमें किसी दोस्त के साथ पार्टी में जाना था। ऐसे में हमारा वर्चुअल अवतार पार्टी अटैंड कर सकता है इतना ही नहीं, मेटावर्स में डिजिटल करंसी खर्च करके सभी दोस्त पार्टी कर सकेंगे।

-दूसरे देश में रहनेवाले अपने रिश्तेदार के साथ बैठकर कोई भी लाइव कॉन्सर्ट या मूवी शो देख सकते हैं।

-मेटावर्स में कोई ड्रेस पसंद आए तो वर्चुअली पहनकर, छूकर देख सकते हैं। ड्रेस फिट आए तो ऑर्डर कर सकते हैं। ड्रेस घर पर डिलीवर कर दी जाएगी। इसलिए कुछ नामी फैशन कंपनियां भी मेटावर्स से जुड़ रही हैं।

-फिटनेस और गेमिंग कंपनियां भी इससे जुड़ने की तैयारी में जुट गई हैं।

-फेसबुक का दावा है कि प्राइवेसी और सेफ्टी पुख्ता होगी। किसी को भी ब्लॉक कर सकेंगे और प्राइवेट स्पेस में किसी को बुलाना है या नहीं, यह भी तय कर सकेंगे। कुछ असली चीजें खरीदने की जरूरत नहीं होगी, जैसे टीवी, कीबोर्ड आदि। लेकिन जुकरबर्ग यह नहीं बता रहे कि यह सबकुछ मुफ्त में होगा कि नहीं। जाहिर है कि कई कंपनियां और तकनीक जुड़ेंगी तो वे अपने बिजनेस हित पहले साधेंगी।


कितना वक्त लगेगा और किसका होगा मेटावर्स

मेटावर्स लगातार अपडेट हो रहा है। फेसबुक के मुताबिक मेटावर्स शुरुआती फेज में है। करीब 10-15 बरसों में यह डिवेलप होगा। यह कई तकनीकों से मिलकर बनेगा जिसके लिए अलग-अलग कंपनियां अपनी तकनीक के साथ काम कर रही हैं। वैसे फेसबुक के अलावा दुनिया की कई कंपनियां मेटावर्स बनाने में जुटी हैं। इसमें सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर, इंटरफेस क्रिएशन, प्रॉडक्ट और फाइनेंशल सर्विस देने वाली कैटिगरी हैं। गूगल, एपल, स्नैपचैट और एपिक गेम्स भी मेटावर्स पर ही काम कर रहे हैं। फेसबुक के बाद डिज्नी ने भी अपना मेटावर्स बनाने का ऐलान कर दिया है। डिज्नी के CEO बॉब चापेक ने कहा कि वे भी कंस्यूमर्स एक्सीपियंस की इस दुनिया से जुड़ेंगे। साल 2035 तक मेटावर्स अपनी शक्ल ले चुका होगा। इस पर कोई एक कंपनी अपना दावा नहीं कर सकती। लेकिन जैसे कई कंपनियां इंटरनेट दे रही हैं उसी तरह यहां भी अपने-अपने मेटावर्स हो सकते हैं। फेसबुक ने इस पर शुरुआत में करीब 75 हजार करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बनाई है। इसके अलावा यूरोपियन यूनियन में करीब 10 हजार लोगों को नौकरियां दी जाएंगी। उधर, साउथ कोरिया ने साल 2023 तक सोल को पहला मेटावर्स शहर बनाने का ऐलान कर दिया है।


सवाल और आशंकाएं भी

1. डेटा लीक : फेसबुक जैसे ऐप्स के पास यूजर का काफी डेटा जमा हो जाता है। कहा तो यही जाता है कि इसका कोई गलत इस्तेमाल नहीं होगा। लेकिन मेटावर्स में बहुत ज्यादा डेटा जमा होने के आसार हैं। हालांकि इसे लेकर भी यही दावा किया जा रहा है कि डेटा लीक नहीं हो सकेगा। फिर भी जब काफी कुछ कल्पना पर टिका है तो भरोसा नहीं जताया जा सकता कि डेटा से छेड़छाड़ नहीं होगी। इसे लेकर अभी से गंभीर चिंताएं जताई जाने लगी हैं। खुद फेसबुक की एक पूर्व सहयोगी ने भी ऐसी ही चिंता जताई है।

2. प्राइवेसी : लोगों की प्राइवेसी में किसी दूसरे का दखल रोका जा सकेगा या नहीं यह देखना होगा। वैसे तो इंटरनेट पर किसी को भी ब्लॉक करने का ऑप्शन होता है लेकिन मेटावर्स में नई तकनीक आएंगी तो क्या किसी को रोका जा सकेगा। मेटावर्स में की गई बातचीत में असल प्राइवेसी रहेगी या नहीं, इस बात पर भी शक जताया जा रहा है। अगर मेटावर्स में किसी को ट्रोल किया जाए या कोई क्राइम होगा तो कानून उससे कैसे निपटेगा?

3. डेटा का इस्तेमाल : अगर डेटा लीक न भी तो भी लोगों का जो डेटा जमा होगा उसका क्या किया जाएगा? क्या कोई एक कंपनी उसका मालिकाना हक रखेगी या यूजर के पास यह हक होगा कि अपने डेटा को लॉक कर सके। अगर किसी का अपने डेटा से हक खत्म होगा तो यह नुकसान का सौदा रहेगा।

4. मेटावर्स का कंट्रोल : उस काल्पनिक दुनिया का कंट्रोल किसके हाथ में होगा? अब तक पूरी दुनिया में डिजिटल करंसी को मान्यता नहीं मिली है जबकि मेटावर्स में डिटिजल करंसी से शॉपिंग होगी। ऐसे में धोखाधड़ी हुई तो कहां गुहार लगाई जाएगी। पूरी मेटावर्स इकॉनमी कैसे काम करेगी?

5. इमोशनल समस्याएं : हो सकता है कि दो लोग एक कमरे में बैठे हों लेकिन किसी दूसरी जगह किसी दूसरे शख्स के साथ हों। जैसे एक भारत में तो दूसरा अमेरिका में। हो सकता है कि आभासी दुनिया इतनी अच्छी लगने लगे कि लोग असल ज़िंदगी में दूरी बना लें। भविष्य की दुनिया में ऐसी इमोशनल दिक्कतें ज्यादा बढ़ सकती हैं। स्क्रीन टाइम भी ज्यादा बढ़ जाएगा। हालांकि महामारी में इंटरनेट अकेले रहनेवाले लोगों के लिए वरदान रहा।

(साभार संडे नवभारत टाइम्स )

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