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मानव मस्तिष्क में सेंध लगाने की तैयारी

मानव मस्तिष्क हमेशा से उलझी गुत्थी रही है. वैज्ञानिक इसे जितना सुलझाने की कोशिश करते हैं, उतना ही और उलझ जाते हैं. तभी तो वैज्ञानिक इसके कार्य करने के तरीके को पूरी तरह बताने में आज भी हिचकिचाते हैं. हां, हाल के दिनों मे…

मानव मस्तिष्क में सेंध लगाने की तैयारी

मानव मस्तिष्क हमेशा से उलझी गुत्थी रही है. वैज्ञानिक इसे जितना सुलझाने की कोशिश करते हैं, उतना ही और उलझ जाते हैं. तभी तो वैज्ञानिक इसके कार्य करने के तरीके को पूरी तरह बताने में आज भी हिचकिचाते हैं. हां, हाल के दिनों में कुछ सफल प्रयोग हुए हैं, जिसके आधार पर वैज्ञानिक इसकी कार्यप्रणाली का खाका दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का दावा कर रहे हैं. हालांकि इस सफलता के बावजूद इसके कई पहलू अब भी अनसुलझे हैं. हाल ही में खबर आयी है कि वैज्ञानिकों ने ऐसा यंत्र बनाया है, जिसकी मदद से बिना बोले इनसानों की सोच का पता लगाया जा सकता है. लेकिन मस्तिष्क की संरचना का नापजोख करना आसान काम नहीं है. उसमें करीब 100 अरब स्नायु कोशिकाएं होती हैं. इन्हें हम न्यूरॉन भी कहते हैं. प्रत्येक न्यूरॉन हजारों अन्य स्नायु कोशिकाओं के साथ जुड़ा होता है. ये कनेक्शन सिनॉप्सिस कहलाते हैं. इनकी संख्या खरबों में होती है. स्नायु सर्किट कैसे काम करता है, यह जानने के लिए सबसे पहले वैज्ञानिकों को पता होना चाहिए कि प्रत्येक न्यूरॉन का विशिष्ट कार्य क्या है और वह मस्तिष्क की किन कोशिकाओं के साथ जुड़ा है. यदि वैज्ञानिक कुछ खास काम करने वाले न्यूरॉन के बीच कनेक्शनों का नक्शा तैयार करने का कोई तरीका खोज लेते हैं, तो ही इसके आधार पर मस्तिष्क का कोई कंप्यूटर मॉडल तैयार करने में सफलता मिल सकती है. फिर तो यह भी समझना संभव हो जायेगा कि मस्तिष्क का जटिल स्नायु नेटवर्क किस तरह विचारों और अनुभूतियों को जन्म देता है. लेकिन तब तक मानव मस्तिष्क की जटिल संरचना की गुत्थी उलझी रहेगी, क्योंकि छोटी सी जगह में ही एक-दूसरे से जु.डे 50 से 100 अरब न्यूरॉन संदेशों को इलेक्ट्रोकेमिकल प्रक्रिया के जरिये एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाते हैं. अर्थात् शरीर में मौजूद रसायन, जैसे आवेशित सोडियम, पोटैशियम और क्लोराइड आयन कोशिका के बीच संपर्क सूत्र स्थापित करते हैं और ये इलेक्ट्रिकल करेंट पैदा करते हैं, जिसके आधार मस्तिष्क में सूचनाओं का संचार होता है. लेकिन मस्तिष्क द्बारा लिया गया निर्णय किसी एक न्यूरॉन की सक्रियता से संबंधित नहीं होता है. मस्तिष्क में बड़ी संख्या में मौजूद न्यूरॉन के समूहों के सक्रिय होने के बाद ही मस्तिष्क किसी निर्णय पर पहुंचता है. एक न्यूरॉन की इसमें भूमिका नहीं होती. वैज्ञानिकों के सामने सैकड़ों न्यूरॉन की गतिविधियों को रिकॉर्ड करने और उन आंकड़ों को प्रस्तुत करने कोई कारगर यंत्र नहीं था. हालांकि अब ‘आइब्रेन’ नाम का यंत्र बनाने में वैज्ञानिकों को सफलता मिली है, लेकिन यह कितना सफल होगा यह तो वक्त ही बतायेगा.

वैज्ञानिक कहते हैं कि हमारे मस्तिष्क द्बारा किये गये एक कार्य में सैकड़ों न्यूरॉन की भागीदारी होती है. उसमें से एक की भूमिका का पता लगाना बहुत ही दुष्कर कार्य है. लेकिन वैज्ञानिकों ने इसके के लिए दो तरीकों डिकोडिंग और सूचना सिद्धांत का प्रयोग किया है. डिकोडिंग मुख्य रूप से किसी निर्णय के कारणों को जानने में मदद करता है. डिकोडिंग का अध्ययन न्यूरॉन्स की गतिविधि के आधार पर होता है. वहीं सूचना सिद्घांत से पता चलता हैकि उस दौरान न्यूरॉन ने कितनी सूचनाओं को एक से दूसरे तक पहुंचाया. ये दोनों तरीके वैज्ञानिकों को मस्तिष्क के किसी क्षण में निर्णय लेने की प्रक्रिया को जानने में मदद करते हैं. डिकोडिंग के आधार पर दिमाग की गतिविधि का पता लगाया जा सकता है, मसलन, मस्तिष्क कैसे किसी घटना के बारे में सोचता है, लेकिन इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक तकनीक की जरूरत होगी. इसके बाद ही किसी इनसान के दिमाग में आने वाले विचारों को पढ.ा जा सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस यंत्र को न्यूरॉन से संबंद्ध कर उसकी गतिविधि को जाना जा सकता है.

मस्तिष्क के कामकाज को कुछ इस तरह से भी समझा जा सकता है. धरती पर जितने भी मोबाइल फोन और कनेक्शन मौजूद हैं, उन सबसे होने वाले संदेशों के आदान-प्रदान पर नजर रखना कितना कठिन होगा. लेकिन यह एक मानव मस्तिष्क की गतिविधि पर नजर रखने से ज्यादा कठिन नहीं है. हालांकि मस्तिष्क में एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक संदेशों को पहुंचाने की जिम्मेवारी कुछ रसायनों की होती है. इस प्रक्रिया में रसायन एक न्यूरान से दूसरे न्यूरॉन तक पहुंचता है और अपने साथ संदेशों को भी ले जाता है. फिर उस संदेश से जुड़ी तंत्रिका संक्रिय हो जाती है. लेकिन प्रत्येक संदेश के लिए अलग-अलग रसायन जिम्मेवार होते हैं. इन रसायनों को ट्रांसमीटर कह सकते हैं. वैसे इन्हें एपीनफरीन, नोरेपीनेफरीन या डोपमाइन कहा जाता है. एक मस्तिष्क एक कंप्यूटर से कई गुना ज्यादा सूचनाओं को स्टोर कर सकता है. जिस प्रकार से एक ऑकेस्ट्रा में कई यंत्रों के मेल से संगीत बजता है और सभी यंत्र एक-दूसरे से जु.डे होते हैं, वैसे ही मस्तिष्क में कई विभाग होते हैं और सभी अलग-अलग होते हुए भी मिल कर कार्य करते हैं और मस्तिष्क की संपूर्ण गतिविधियों का संचलन करते हैं. इस प्रकार हमारा शरीर नियंत्रित होता है.

मस्तिष्क में सभी सूचनाएं स्पाइनल कोर्ड के जरिये प्रवेश करती हैं. अर्थात् यह मस्तिष्क का मुख्य आधार है. इसमें कोई भी क्षति मस्तिष्क को प्रभावित करती है. इसके जरिये ही विभित्र सूचनाएं जैसे- गरम, ठंडा, दर्द आदि मस्तिष्क तक पहुंचती हैं. फिर हमारा मस्तिष्क न्यूरॉन के जरिये विभित्र अंगों को निर्देश भेजता है. इस तरह संदेश हमारे मस्तिष्क से बाहर निकलते हैं. यदि शरीर से स्पाइनल कोर्ड को निकाल दिया जाये, तो हम पंगु हो जाएंगे. हमें किसी चीज को छूने से गर्म, ठंड, यहां तक कि दर्द आदि का भी एहसास नहीं होगा. लेकिन देखने और सुनने की सूचनाएं स्पाइनल कोर्ड से होकर मस्तिष्क तक नहीं जातीं हैं. यही वजह है कि लकवाग्रस्त हो जाने के बाद भी लोग देखते और सुनते रहते हैं. इस प्रकार स्पाइनल कोर्डसे सूचनाएं सीधे मस्तिष्क के मध्यभाग में पहुंचा दी जाती हैं. यहां से वह अन्य हिस्से में जाती है.

कह सकते हैं कि हमारा मस्तिष्क वृक्ष की तरह है, जिसकी कई शखाएं होती हैं, लेकिन जिसकी जड़ एक होती है. हमारे मस्तिष्क का रंग ग्रे होता है. इसीलिए इसे ग्रे भाग भी कहा जाता है. सर में दायां और बांया दो मस्तिष्क होता है. दोनों अलग-अलग कार्य करते हैं. दायां भाग दृश्य संबंधी कार्य करता है और इसके कारण हम सूचनाओं को समग्रता में देखने में सक्षम होते हैं. अर्थात् यह बिखरी चीजों को समूह में जोड़ता है. वहीं बायां भाग तार्किकता से संबंधित होता है. यह सूचनाओं का वेिषण करता है. उसके बारे में सोचता-विचारता है. अर्थात् दायां भाग देखता है और बायां भाग उसके बारे में बताता है, यानी संदेश प्रसारित करता है.(साभार -प्रभातखबर )
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