लाल ग्रह यानी मंगल पर जीवन की संभावनाओं को लेकर वैज्ञानिकों ही नहीं, आम आदमी की भी उत्सुकता लंबे अरसे से रही है. इस जिज्ञासा के जवाब को तलाशने के लिए कई अभियान मंगल ग्रह पर भेजे भी गये. अब अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा भेजे गये रोबोटिक रोवर क्यूरियोसिटी जल्द ही मंगल ग्रह की सतह पर कदम रखने वाला है. यह विशाल प्रोब (यान) अगस्त के पहले सप्ताह में मंगल ग्रह के वातावरण में 13,000 मील प्रति घंटे की रफ्तार से प्रवेशकरेगा. क्यूरियोसिटी मंगल पर भेजे गये पहले के रोवर से पांच गुना भारी है और इसके पास चूर हो चुके चट्टान के नमूनों की जांच करने की क्षमता भी है. इसका मुख्य काम यह पता करना है कि क्या कभी मंगल ग्रह पर जीवन था. क्या है मकसद इस अभियान का उद्देश्य यह पता लगाना है कि वहां सूक्ष्म जीवों के जीवन के लिए स्थितियां हैं या नहीं और अतीत में क्या कभी यहां जीवन रहा है. नासा के कार की आकार का क्यूरियोसिटी रोवर को लाल ग्रह पर जीवन के प्रमाण का पता लगाने के लिए अधिक गड्ढे खोदने की जरूरत नहीं प.डेगी. एक अध्ययन में कहा गया है कि इसकी सतह के महज कुछ इंच तक खुदाई से ही जटिल कार्बनिक अणुओं का पता लगाया जा सकता है. इससे यह पता लग सकता है कि मंगल पर कभी जीवन का अस्तित्व था या नहीं.
वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह जटिल कार्बनिक अणु 10 या उससे अधिक कार्बन परमाणुओं से मिलकर बने हंै और जीवन के बिल्डिंग ब्लॉक के समान माने जाते हैं. जैसे इसमें पाये जाने वाले अमीनो अम्ल से प्रोटीन का निर्माण होता है. हालांकि, इसकी सतह के दो से तीन इंच के नीचे विकिरण दस गुना कम हो जाता है. लेकिन, फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यह है कि पूर्व के यानों को किसी भी तरह का कार्बनिक पदार्थ नहीं मिला था. क्यूरियोसिटी की खासियत क्यूरियोसिटी अपने साथ ऐसे उपकरणों को ले गया है, जिससे वह चट्टानों और मिट्टी के नमूनों की जांच वहीं कर सकता है. पहले के मिशन पर भेजे गये यानों में इस तरह की कोई सुविधा नहीं थी. इसमें दो रोबोटिक हाथ लगे हैं, जो विभित्र उपकरणों को संचालित करने के काम आते हैं. इसी से यह मंगल ग्रह की सतह की खुदाई करेगा और मिट्टी को विश्लेषण के लिए यान के दूसरे उपकरण के पास भेज देगा. इसमें प्लूटोनियम बैट्री है, जिससे इसे दस साल से भी ज्यादा समय तक लगातार ऊर्जा मिलती रहेगी. अलग तरीके से होगी लैंडिंग क्यूरियोसिटी रोवर को मंगल ग्रह पर लैंड कराने के लिए 2004 में भेजे गये स्पिरिट और अपॉचरुनिटी रोवर से बिल्कुल अलग तरीका अपनाया जायेगा. चूंकि यह स्पिरिट और अपॉचरुनिटी से दो गुना लंबा और वजन में पांच गुना अधिक भारी है, इसलिए इसे लैंड कराने के लिए एयरबैग तरीका नहीं अपनाया जा सकता है. इसे एक जेट पैक और टीथर तंत्र के सहारे मंगल ग्रह पर उतारा जायेगा.
इससे रोवर की सटीक लैंडिंग भी सुनिश्चित की जा सकेगी और आगे चलकर मानव मिशन को भी इसी तरह से मंगल की सतह पर उतारा जायेगा. क्यूरियोसिटी मंगल पर गाले क्रेटर के पास उतरेगा. मंगल का यह क्रेटर चट्टानी परतों वाला है और इन परतों में खनिज हैं, जो पानी में बनते हैं. अभियान का आगाज और अंजाम मंगल ग्रह पर जीवन की खोज की शुरुआत सबसे पहले सोवियत संघ ने की थी. उसने एक नवंबर, 1962 को अंतरिक्षयान मार्स-1 को मंगल पर भेजा था. इसे कुछ इस तरह डिजाइन किया गया था कि यह मंगल की सतह की तसवीरों को ले सके. लेकिन, यह मिशन असफल रहा. सोवियत संघ की इस कोशिश के बाद अमेरिका भी पीछे नहीं रहा. उसने 1965 में मरीनर-4 को लॉन्च किया, जिसने मंगल के पास से गुजरते हुए उसके कुछ चित्र खींचे. नासा मरीनर की मंगल ग्रह के लिए भेजा गया सबसे पहला सफल अभियान था. मरीनर-4 के बाद अमेरिका ने 14 नवंबर, 1971 को मरीनर-9 को लॉन्च किया और उसे मंगल के इर्द-गिर्द एक कक्षा में स्थापित किया. अमेरिका की इस कोशिश के बाद सोवियत संघ ने मार्स-2 को 27 नवंबर और मार्स-3 को 2 दिसंबर, 1971 को मंगल ग्रह के लिए भेजा. लेकिन, ये दोनों असफल रहे. 1974 में उसने फिर मार्स-6 को लॉन्च किया. यह मिशन लैंड करने के बाद असफल रहा, लेकिन यह उसके वातावरण के कुछ आंक.डे भेजने में सफल रहा. इसके बाद अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने 1975 में वाइकिंग प्रोग्राम की शुरुआत की. अमेरिका ने वाइकिंग प्रथम के एक मॉड्यूल को मंगल पर उतारकर लाल ग्रह की धरती का विशेष अध्ययन किया. वाइकिंग ऑर्बटिर ने इस बात की जानकारी दी कि मंगल पर तरल पानी मौजूद है. वाइकिंग-1 छह वर्षों तक और वाइकिंग-2 तीन वर्षों तक काम करता रहा. वर्ष 1997 में नासा ने मार्स ग्लोबल सर्वेयर मंगल पर भेजा, जो अपने लक्ष्य में सफल रहा. लगभग दस साल तक कार्य करने के बाद 2006 के अंत में इससे संपर्क टूट गया. इसके बाद नाम आता है फोनिक्स मार्स लैंडर का. यह 25 मई, 2008 को मंगल के उत्तरी ध्रुव के पास उतरा. इसने 20 जून को उसकी सतह पर पानी की मौजूदगी की पुष्टि की. 10 नवंबर, 2008 को संपर्क खत्म होने के साथ ही यह अभियान खत्म हो गया. एक आकलन के मुताबिक, मंगल के लिए भेजे गये अभियानों में दो-तिहाई यान अपने मिशन तक पहुंचने से पहले ही असफल हो गये.
हालिया असफलताओं का इतिहास
जीवन की तलाशमें इन अभियानों से कई कड़वी यादें भी जुड़ी हैं.
बिगल-2 : वर्ष 2003 में ब्रिटेन ने अपना हाइ-प्रोफाइल यान बिगल-2 को लॉन्च किया, लेकिन लैंडिंग के दौरान यह गायब हो गया.
फोबोस ग्रंट : पिछले साल नवंबर में रूस ने मंगल ग्रह के लिए फोबोस ग्रंट मिशन को भेजा. लेकिन, लॉन्चिंग के बाद यह पृथ्वी की कक्षा से बाहर जाने में असफल रहा.
मार्स लैंड रोवर मिशन यह रोबोट के समान एक मशीन है. यह बड़ी गाड़ी के आकार का घूमने वाला वाहन है. छह चक्कों वाले इस मोबाइल लेबोरेटरी रोबोटिक रोवर का नाम क्यूरियोसिटी रखा गया है. इसका वजन करीब एक टन है. इसे मार्स साइंस लेबोरेटरी (एमएसएल) के नाम से भी जाना जाता है.यह मंगल ग्रह से मिट्टी के सैंपल इकट्ठा करेगा और कैमरे से इस ग्रह के सतह को स्कैन भी करेगा. इसमें प्लूटोनियम बैट्री है, जिससे इसे दस साल से भी ज्यादा समय तक लगातार ऊर्जा मिलती रहेगी.
| 2030 तक अमेरिका की योजना मंगल ग्रह पर मानवयुक्त अंतरिक्षयान भेजने की है. |
| 2.50 अरब डॉलर से भी अधिक की लागत आयी है मंगल ग्रह पर जीवन की खोज से संबंधित इस मिशन में. |
| 44 अंतरिक्ष मिशन मंगल ग्रह के लिए अभी तक भेजे गये, जिनमें 21 अभियान ही सफल हो पाये. |
भविष्य के अभियान
नासा ने 2008 में घोषणा की थी कि वह 2013 में मंगल के लिए मावेन नामक रोबोटिक मिशन भेजेगा. इसे मंगल के पर्यावरण की पूरी जानकारी लाने के लिए भेजा जायेगा. रूस और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की योजना 2016 में रोवर और स्टैटिक लैंडर भेजने की है.
पहली बार मानव होगा मंगल पर!
यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी को उम्मीद है कि वह 2030 और 2035 के बीच मानवयुक्त मिशन मंगल ग्रह पर भेजने में सफल हो जायेगा. वहीं, नासा के प्रशासक माइकल डी ग्रिफिन ने 2007 में कहा था कि हमारी योजना 2037 तक मंगल पर मानव को भेजने की है.