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मंगल ग्रह पर रोवर को उतारने की चुनौती

क्युरिऑसिटी रोवर को मंगल यात्रा पर भेजने के लिए वैज्ञानिकों को नौ साल तक मेहनत करनी पड़ी है और इस पर करीब 2.5 अरब डॉलर का खर्च आया है, लेकिन अंतरिक्ष में भेजी गई अब तक की सबसे उन्नत प्रयोगशाला के भाग्य का फैसला सिर्फ सात…

मंगल ग्रह पर रोवर को उतारने की चुनौती
क्युरिऑसिटी रोवर को मंगल यात्रा पर भेजने के लिए वैज्ञानिकों को नौ साल तक मेहनत करनी पड़ी है और इस पर करीब 2.5 अरब डॉलर का खर्च आया है, लेकिन अंतरिक्ष में भेजी गई अब तक की सबसे उन्नत प्रयोगशाला के भाग्य का फैसला सिर्फ सात मिनट के अंदर हो जाएगा। इंजीनियरों और वैज्ञानिकों के लिए ये सात मिनट बहुत महत्वपूर्ण होंगे। इन्हीं सात मिनटों के दौरान 6 अगस्त को मंगल की सतह पर रोवर को उतारा जाएगा। रोवर 21,243 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से नीचे उतरेगी। इस रफ्तार को धीरे-धीरे कम किया जाएगा। यह मंगल यात्रा का सबसे नाजुक समय होगा। शायद इसी वजह से नासा के वैज्ञानिक हलकों में इन लम्हों को सेवन मिनट्स ऑफ टेरर कहा जा रहा है। नासा ने एक वैन जितनी रोवर को उतारने के लिए पूरी तरह से एक नया लैंडिंग सिस्टम विकसित किया है। यदि यह लैंडिंग नाकाम रही तो मंगल के अतीत में जीवन होने के सुराग खोजने की सारी योजनाएं पांच साल के लिए टल जाएंगी और मौजूदा वित्तीय स्थिति को देखते हुए मंगल पर मानव भेजने की नासा की महत्वाकांक्षा को भी तगड़ा झटका लगेगा। दुनिया के हजारों वैज्ञानिकों के कैरियर क्युरिऑसिटी के साथ जुड़े हुए हैं। रोवर की सफल लैंडिंग के बाद वे कम से कम दो साल तक मंगल से मिले नए डाटा का विश्लेषण करते रहेंगे। मंगल का वायुमंडल पृथ्वी की तुलना में 200 गुना पतला है। उसका गुरुत्वाकर्षण एक-तिहाई है। ऐसे में एक टन वजनी रोवर को उतारना बहुत ही चुनौतीपूर्ण होगा। रोवर से पृथ्वी तक संदेश भेजने में 14 मिनट लगेंगे। इतना ही समय पृथ्वी से रोवर को कोई निर्देश भेजने में लगेगा। इसका मतलब यह हुआ कि रोवर को कंप्यूटरों के जरिए अपनी लैंडिंग को खुद नियंत्रित करना पड़ेगा। जब नासा को यह खबर मिलेगी कि रोवर मंगल के वायुमंडल में प्रवेश कर चुका है, तब तक रोवर सतह पर पहुंच चुकी होगी। मंगल सौरमंडल में सबसे आकर्षक लक्ष्य है, लेकिन वहां पहुंचना आसान नहीं है। 1971 से अब तक मंगल पर 17 मिशन भेजे जा चुके हैं, जिनका लक्ष्य सतह पर लैंडिंग करना था। इनमें से दस मिशनों को विफलता का सामना करना पड़ा। रोवर को उतारने के लिए स्काई क्रेन सिस्टम का प्रयोग किया जाएगा। यह पहला मौका है, जब नासा किसी ग्रह पर रोवर उतरने के लिए इस नए सिस्टम को आजमा रहा है। यदि रोवर अपने सात मिनट के इम्तिहान में पास हो जाती है तो दुनिया आने वाले समय में मंगल से कुछ अच्छी खबरों की उम्मीद कर सकती है। इस चलते-फिरते रोबोट के पास विविध किस्म के वैज्ञानिक उपकरण हैं, जिनके जरिए ग्रह की चट्टानों, मिट्टी और वायुमंडल का विश्लेषण किया जा सकता है। इस विश्लेषण से हमें मंगल के अतीत के बारे महत्वपूर्ण सुराग मिल सकते हैं। हमें यह पता चल सकता है कि अतीत में मंगल पर कितना पानी था, क्यां वहां की परिस्थितियां जीवन के अनुकूल थीं और ऐसे क्या कारण थे, जिनकी वजह से यह ग्रह आज एक बंजर लाल रेगिस्तान में तब्दील हो गया। मंगल की नई विज्ञान प्रयोगशाला ग्रह पर भेजे गए पिछले मिशनों से प्राप्त अनुभवों पर आधारित है। नए मिशन में उन तकनीकों को शामिल किया गया है, जो आगे चल कर मंगल से नमूने लाने में मदद करेगी और अंतत: वहां मनुष्य के मिशन को सुगम बनाएगी। नासा के साइंस मिशन डायरेक्टोरेट के एक प्रमुख अधिकारी डॉ. जॉन ग्रंसफेल्ड रोवर की लैंडिंग को नासा का अब तक का सबसे मुश्किल रोबोटिक मिशन मानते हैं। उनके मुताबिक इस मिशन में मंगल के प्राचीन इतिहास में झांकने और जीवन का निर्माण करने वाली बुनियादी इकाइयों को खोजने की क्षमता है। रोवर की लैंडिग टीम के एक सदस्य, डॉ. स्टीफन लुईस का कहना है कि क्युरिऑसिटी जैसे मिशन जीवन में एक बार ही आते हैं। अत: यह स्वाभाविक है कि इसकी सफलता को लेकर लोगों की बेचैनी बढ़ी हुई है।
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