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भारत के मंगल अभियान पर विशेष प्रस्तुति :चार भागों में

मंगल अभियान पर शशांक द्विवेदी की इस विशेष प्रस्तुति में लेख को चार भागों में बाटा गया है पहला भाग :भारत का मंगल अभियान दूसरा भाग : मंगल गृह एक झलक तीसरा भाग : नासा का मार्स रोवर क्यूरियोसिटी अभियान चौथा भाग : मंगल के लिए…

भारत के मंगल अभियान पर विशेष प्रस्तुति :चार भागों में

मंगल अभियान पर शशांक द्विवेदी की इस विशेष प्रस्तुति में लेख को चार भागों में बाटा गया है पहला भाग :भारत का मंगल अभियान दूसरा भाग : मंगल गृह एक झलक तीसरा भाग : नासा का मार्स रोवर क्यूरियोसिटी अभियान चौथा भाग : मंगल के लिए पूर्व में भेजे गये अभियान

पहला भाग :भारत का मंगल अभियान
इसरों की ऊँची उड़ान नासा के मिशन मंगल के बाद अब भारत ने भी मंगल पर पहुंचने की कवायद शुरू कर दी है। पिछले दिनों केंद्रीय कैबिनेट ने भारत के मिशन मार्स के तहत नवंबर 2013 में मंगल ग्रह पर उपग्रह भेजने को मंजूरी दे दी है। अंतरिक्ष में उपग्रह प्रक्षेपण का सौवां मिशन पूरा करने के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने इस वर्ष नवंबर में मंगल मिशन, मंगलयान छोड़ने की तैयारी शुरू कर दी है। यह मिशन पूरी तरह से स्वदेशी होगा। इस परियोजना पर करीब 450 करोड़ रुपए खर्च होंगे। कई शोधों से यह साबित हो चुका है कि मंगल ग्रह ने धरती पर जीवन के क्रमिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है इसलिए यह अभियान देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण है । यान के साथ 15 किलो का पेलोड भेजा जाएगा। इनमें कैमरे और सेंसर जैसे उपकरण शामिल हैं, जो मंगल के वायुमंडल और उसकी दूसरी विशिष्टताओं का अध्ययन करेंगे। मंगलयान को लाल ग्रह के निकट पहुंचने में आठ महीने लगेंगे। मंगल की कक्षा में स्थापित होने के बाद यान मंगल के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां हमें भेजेगा। मंगलयान का मुख्य फोकस संभावित जीवन, ग्रह की उत्पत्ति, भौगोलिक संरचनाओं और जलवायु आदि पर रहेगा। यान यह पता लगाने की भी कोशिश करेगा कि क्या लाल ग्रह के मौजूदा वातावरण में जीवन पनप सकता है। मंगल की परिक्रमा करते हुए ग्रह से उसकी न्यूनतम दूरी 500 किलोमीटर और अधिकतम दूरी 8000 किलोमीटर रहेगी। यदि किसी कारणवश इस यान को इस साल नवंबर में रवाना नहीं किया जा सका तो हमें मंगलयान की यात्रा के लिए अनुकूल दूरी का इंतजार करना पड़ेगा। दूसरा अवसर 2016 में ही मिल पाएगा। इसरो के पूर्व अध्यक्ष प्रो. यू. आर. राव के नेतृत्व में गठित समिति ने मंगलयान द्वारा किए जाने वाले प्रयोगों का चयन किया है। प्रो. राव के अनुसार उनकी टीम ने मंगल के लिए कुछ नायाब किस्म के प्रयोग चुने हैं। एक प्रयोग के जरिए मंगलयान लाल ग्रह के मीथेन रहस्य को सुलझाने की कोशिश करेगा। क्योंकि मंगल के वायुमंडल में मीथेन गैस की मौजूदगी के संकेत मिले हैं। मंगलयान पता लगाने की कोशिश करेगा कि मंगल पर मीथेन उत्सर्जन का स्रोत क्या है। मंगल आज भले ही एक निष्प्राण लाल रेगिस्तान जैसा नजर आता हो, लेकिन उसके बारे में कई सवाल आज भी अनुत्तरित हैं। हमारे सौरमंडल में अभी सिर्फ पृथ्वी पर जीवन है। शुक्र ग्रह पृथ्वी के बहुत नजदीक हैं, लेकिन वहां की परिस्थितियां जीवन के लिए एकदम प्रतिकूल हैं। मंगल भी पृथ्वी के बेहद करीब है, लेकिन उसका वायुमंडल बहुत पतला है, जिसमें ऑक्सीजन की मात्रा बहुत कम है। वहां कुछ चुंबकीय पदार्थ भी मौजूद हैं, लेकिन ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र नहीं है। सब कुछ योजनानुसार चलता है तो मंगल तक अपने बूते पर यान भेजने वाला भारत रूस व अमेरिका के बाद विश्व का तीसरा राष्ट्र हो जाएगा। केवल एक अन्तरिक्ष यान भेज कर चन्द्रमा पर जल खोजकर भारत ने जो करिश्मा किया उसे देखते हुए भारत के मंगल अभियान को लेकर देश के भीतर व बाहर दोनों जगह उत्साह का मौहाल है।मंगलयान भारत की पूर्ण स्वेदेशी योजना है। मंगलयान की उड़ान यह सिद्ध करेगी कि भारत 5 करोड़ से 40 करोड़ किलोमीटर लम्बी तथा 300दिन तक चलने वाली अन्तरिक्ष यात्राओं को कुशलता से नियंत्रित कर सकता है। यान कैसे काम करेगा भारत का मंगलयान मंगल पर उतरेगा नहीं अपितु उसकी की सतह से 500 से 80000 किलोमीटर दूर रहते हुए परिक्रमा करेगा। भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संस्थान का विश्वस्त राकेट पीएसएलवी एक्स एल मंगलयान को लेकर श्री हरिकोटा से उड़ान भरेगा। पीएसएलवी मंगलयान को अन्तरिक्ष में पृथ्वी की कक्षा में स्थापित कर देगा। इसके बाद मंगलयान के छः इंजिन चालू होकर इसे पृथ्वी की उत्केन्द्री कक्षा में ऊपर उठा देंगे। तब मंगलयान 600 से 215000किलोमीटर दूर रहते हुए पृथ्वी की परिक्रमा करने लगेगा। इसके बाद एक बार यान के इंजिन फिर चालू किए जाएगें जो मंगलयान को पृथ्वी के कक्ष से निकाल कर उसे सूर्य लक्ष्यी पथ पर मंगल की ओर अन्तरग्रही यात्रा पर भेज देगें। यदि सब कुछ योजनानुरूप चला तो मंगलयान सितम्बर 2014 में मंगल की परिक्रमा में पहुँच जाएगा। मंगलयान मंगलग्रह परिक्रमा करते हुए ग्रह की जलवायु ,आन्तरिक बनावट, वहां जीवन की उपस्थिति, ग्रह की उत्पति, विकास आदि के विषय में बहुत सी जानकारी जुटा कर पृथ्वी पर भेजेगा। वैज्ञानिक जानकारी को जुटाने हेतु मंगलयान पर कैमरा, मिथेन संवेदक, उष्मा संवेदी अवरक्त वर्ण विश्लेषक, परमाणुविक हाइड्रोजन संवेदक, वायु विश्लेषक आदि पांच प्रकार के उपकरण लगाए जा रहे हैं। इन उपकरणों का वजन लगभग 15 किलोग्राम के लगभग होगा। मेथेन की उत्पत्ति जैविक है या रसायनिक यह सूचना मंगल पर जीवन की उपस्थिति का पता लगाने में सहायक होगी। मंगलयान में ऊर्जा की आपूर्ती हेतु 760 वॉट विद्युत उत्पादन करने वाले सौर पेनेल लगे होगें। इस अभियान में 15 किलो के पांच एक्सपेरिमेंटल पेलोड्स भेजे जाएंगे। मंगल के लिए जो मिथेन सेंसर भेजा जाएगा उसका वजन 3.59 किलो होगा। यह सेंसर मंगल के पूरे डिस्क को छह मिनट के अंदर स्कैन करने में सक्षम है। दूसरा उपकरण थर्मल इंफ्रारेड स्पेक्टोमीटर है। इसका वजन चार किलो होगा। यह मंगल की सतह को मैप करेगा। एक और उपकरण मार्स कलर कैमरा है जिसका वजन 1.4 किलो है। इसके अलावा लेमैन-अल्फा फोटोमीटर का वजन 1.5 किलो है। यह मंगल के वातावरण में अटॉमिक हाइड्रोजन का पता लगाएगा। इससे पहले के मंगल अभियानों में भी इस ग्रह के वायुमंडल में मिथेन का पता चला था, लेकिन इस खोज की पुष्टि की जानी अभी बाकी है। ऐसा माना जाता है कि कुछ तरह के जीवाणु अपनी पाचन प्रक्रिया के तहत मिथेन गैस मुक्त करते हैं। अगर भारत का मंगल अभियान समय पर शुरू हो जाता है तो इससे वह उन खास पांच देशों की लिस्ट अमेरिका, रूस, यूरोप, चीन और जापान में आ जाएगा जो इस तरह के मिशन को अंजाम दे चुके हैं। मंगल पर उत्सुकता लाल ग्रह यानी मंगल पर जीवन की संभावनाओं को लेकर वैज्ञानिकों ही नहीं, आम आदमी की भी उत्सुकता लंबे अरसे से रही है । इस जिज्ञासा के जवाब को तलाशने के लिए कई अभियान मंगल ग्रह पर भेजे भी गये । इसका मुख्य काम यह पता करना है कि क्या कभी मंगल ग्रह पर जीवन था । मंगलयान ग्रह की मिट्टी के नमूनों को इकट्ठा कर यह पता लगायेगा कि क्या कभी मंगल पर जीवन था या नहीं? इस अभियान का उद्देश्य यह पता लगाना है कि वहां सूक्ष्म जीवों के जीवन के लिए स्थितियां हैं या नहीं और अतीत में क्या कभी यहां जीवन रहा है। आधे प्रयास ही सफल मंगल पर भेजे गए 43 मिशन में से लगभग आधे ही सफल हुए हैं। ये मिशन अमरीका, रूस, फ्रांस, चीन और कुछ दूसरे यूरोपीय देशों ने भेजे थे। पिछले साल चीन का पहला मंगल मिशन, जिसे यिंगह्यो-1 का नाम दिया गया था, नाकाम हो गया था। चीन ने युंगहुओ यान के द्वारा अपना मंगल अभियान प्रारम्भ किया था। रूस की मदद से अन्तरिक्ष में भेजा गया चीन का यह यान पृथ्वी के वायु मण्डल में पुनः प्रवेश कर जल कर नष्ट हो गया था। जापान का प्रयास भी असफल रहा था। जापानी अन्तरिक्ष यान नोजामी के विद्युत परिपथ में खराबी उत्पन्न होजाने के कारण यह खतरा उत्पन्न हो गया था कि वह मंगल की सतह पर गिर कर उसे प्रदूषित कर सकता था। अतः नोजोमी को मंगल की कक्षा में स्थापित करने का प्रयास छोड़ कर उसे मंगल से परे धकेल दिया गया था। यूरोपीय संघ का यान मार्स एक्सप्रेस रूस के राकेट से भेजा गया था। पृथ्वी से बाहर ग्रहों के बीच किसी यान को भेजने का भारत का यह पहला अवसर होगा। यदि भारत अपने मंगलयान को सुरक्षित मंगल की कक्षा में पहुँचा कर उसे ठीक से नियंत्रित रख लेता है तो भी यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। ऐसा करने वाला भारत एशिया का पहला व विश्व का पाँचवाँ राष्ट्र होगा।
दूसरा भाग : मंगल गृह एक झलक पृथ्वी से लाल रंग के दिखाई देने वाले ग्रह पर अब सभी की निगाहें टिकी हैं। आखिर मंगल की सच्चाई क्या है? ऐसे कई सारे सवाल हैं, जिनके जवाब तलाशने के लिए भारत इसी साल नवंबर में अपना मंगल अभियान शुरू कर रहा है । हमारे अपने जीवन में भी मंगल ग्रह को लेकर अनगिनत कहानियां जुड़ी हैं। लेकिन कुछ खास तथ्य इस गुलाबी ग्रह का कौतूहल बढ़ा देते हैं। आइए डालते हैं मंगल की कुछ विशेषताओं पर एक नजर मंगल के दो चंद्रमा मंगल सौरमंडल में सूर्य से चैथा ग्रह है। पृथ्वी से लाल दिखाई देने की वजह से ही इसको लाल ग्रह का नाम दिया गया। मंगल के दो चंद्रमा, फोबोस और डिमोज हैं। माना जाता है कि यह यह 5261 यूरेका के समान एक क्षुद्रग्रह हैं जो मंगल के गुरुत्व के कारण यहां फंस गए हैं। मंगल को पृथ्वी से नंगी आंखों से देखा जा सकता है। पृथ्वी से मंगल की तुलना मंगल पृथ्वी के व्यास का लगभग आधा है। यह पृथ्वी से कम घना है, इसके पास पृथ्वी का 15 फीसद आयतन और 11 फीसद द्रव्यमान है। इसका सतही क्षेत्रफल, पृथ्वी की कुल शुष्क भूमि से केवल थोड़ा ही कम है। हालाकि मंगल, बुध से बड़ा और अधिक भारी है पर बुध की सघनता भी ज्यादा है। फलस्वरूप दोनों ग्रहों का सतही गुरुत्वीय खिंचाव लगभग एक समान है। मंगल ग्रह की सतह का लाल-नारंगी रंग लोहे के आक्साइड के कारण है जिसे हैमेटाईट या जंग के रूप में पहचाना जाता है। मंगल पर पानी की उम्मीद मंगल पर 1965 में भेजे गए मेरिनर 4 यान की उड़ान से पहले तक यह माना जाता था कि ग्रह की सतह पर तरल अवस्था मे जल हो सकता है। यह हल्के और गहरे रंग के धब्बों की आवर्तिक सूचनाओं पर आधारित था। दूर से देखने में यहां पर विशालकाय नदियां और नाले दिखाई देते हैं। सौर मंडल के सभी ग्रहों में हमारी पृथ्वी के अलावा, मंगल ग्रह पर जीवन और पानी होने की संभावना सबसे अधिक है। पूर्ववर्ती अभियानों द्वारा जुटाए गए भूवैज्ञानिक सबूत इस ओर इशारा करते हैं कि मंगल ग्रह पर कभी बडे पैमाने में पानी मौजूद था। ऐसे भी संकेत हैं कि हाल के वर्षो में यहां छोटे गर्म पानी के फव्वारे भी निकले हैं। मंगल पर मौजूद सौरमंडल का सबसे बड़ा पर्वत सौरमंडल के ग्रह दो तरह के होते हैं स्थलीय ग्रह जिनमें जमीन होती है और गैसीय ग्रह जिनमें अधिकतर गैस ही गैस है। पृथ्वी की तरह, मंगल भी एक स्थलीय धरातल वाला ग्रह है। इसकी सतह देखने पर ऐसा लगता है मानो यहां पर भी चंद्रमा और पृथ्वी की ही तरह ज्वालामुखियों, घाटियों, रेगिस्तान और धु्रवीय बर्फीली चोटियां हों। हमारे सौरमंडल का सबसे अधिक ऊंचा पर्वत, ओलंपस मोंस मंगल पर ही स्थित है। साथ ही विशालतम कैन्यन वैलेस मैरीनेरिस भी यहीं पर स्थित है। अपनी भौगोलिक विशेषताओं के अलावा, मंगल का घूर्णन काल और मौसमी चक्र पृथ्वी के ही समान है। थोलेईटिक बेसाल्ट से बनी सतह मंगल एक स्थलीय ग्रह है जो सिलिकॉन और ऑक्सीजन युक्त खनिज, धातु और अन्य तत्वों से बना है जो आम तौर पर उपरी चट्टान बनाते हैं। मंगल ग्रह की सतह मुख्यत थोलेईटिक बेसाल्ट की बनी है। हालाकि यह हिस्से प्रारूपिक बेसाल्ट से अधिक सिलिका-संपन्न हैं और पृथ्वी पर मौजूद एंडेसिटीक चट्टानों या सिलिका ग्लास के समान हैं। मंगल की अधिकतर सतह लौह आक्साइड धूल के बारीक कणों से गहराई तक ढकी हुई है। मंगल की मिट्टी में मैग्नीशियम, सोडियम, पोटेशियम और क्लोराइड जैसे तत्व शामिल हैं। यह तत्व पृथ्वी पर भी मिट्टी में पाए जाते हैं जो पौधों के विकास के लिए आवश्यक हैं। मंगल पर मौजूद लोहा-मैग्नेशियम सिलिकान और आक्सीजन के अलावा, मंगल की सतह में बहुतायत में पाए जाने वाले तत्व लोहा, मैग्नेशियम, एल्युमिनियम, कैल्सियम और पोटेशियम है। 125 कि.मी. की अधिकतम मोटाई के साथ, ग्रह की सतह की औसत मोटाई लगभग 50 किमी. है। सौर प्रणाली में अपनी स्थिति की वजह से मंगल की कई विशेष रासायनिक विशेषताएं हैं। क्लोरीन, फास्फोरस और सल्फर, मंगल ग्रह पर पृथ्वी की तुलना में अधिक आम पाए जाते हैं। मंगल की संघात घाटी मंगल के उत्तरी गोलार्द्ध में एक भारी संघात घाटी है, जो 10600किमी. गुणा 8500 किमी. में फैली है। यह चंद्रमा की दक्षिण ध्रुव-ऐटकेन घाटी से चार गुना बड़ी है जो अब तक की खोजी गई सबसे बड़ी संघात घाटी है। लगभग चार अरब वर्ष पहले मंगल ग्रह पर प्लूटो आकार का एक पिंड भी टकराया था। यह घटना, मंगल का अर्धगोलार्द्ध विरोधाभास, का कारण मानी जाती है, जिसने सपाट बोरेलिस घाटी रची जो कि ग्रह का 40 फीसद हिस्सा समाविष्ट करती है।
मंगल का इतिहास मंगल ग्रह के भूवैज्ञानिक इतिहास को कई अवधियों में विभाजित किया जा सकता है। इनमें प्रमुख है नोएचियन काल। यह आज से 4.5 अरब वर्ष पूर्व से लेकर 3.5 अरब वर्ष पूर्व तक की एक अवधि है। इस दौरान मंगल ग्रह के सबसे पुरानी सतहों का गठन हुआ था। हेस्पेरियन काल 3.5 अरब वर्ष पूर्व से लेकर 2.9 - 3.3 अरब वर्ष पूर्व तक की अवधि है। इस काल में व्यापक लावा मैदानों का गठन हुआ। अमेजोनियन काल, 2.9 - 3.3 अरब वर्ष पूर्व से वर्तमान तक की अवधि है। अमेजोनियन क्षेत्रों के कुछ उल्का संघात क्रेटर है। सौरमंडल का सबसे बड़ा पर्वत ओलंपस मोन्स इसी अवधि के दौरान बना था।
तीसरा भाग : नासा का मार्स रोवर क्यूरियोसिटी अभियान पिछले दिनों मंगल पर जीवन की तलाश में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का सबसे हाई टेक मार्स रोवर क्यूरियोसिटी लाल ग्रह की सतह पर सफलतापूर्वक उतर गया । यह पूरी दुनियाँ के लिए एक ऐतिहासिक और गौरवशाली क्षण था ,क्योंकि 5.7 करोड़ किलोमीटर के सफर के बाद मंगल ग्रह पर इंसान के सबसे बड़े प्रयोग का पहला चरण कामयाब हुआ हुआ । अब क्यूरियोसिटी से मंगल के बारें में सटीक जानकारी मिल रही है । वैज्ञानिकों ने नौ साल की कड़ी मेहनत के बाद क्युरिऑसिटी रोवर को मंगल यात्रा पर भेजने के लिए तैयार किया था । जिस पर करीब 2.5 अरब डॉलर का खर्च आया । अंतरिक्ष यान क्यूरियोसिटी रोवर कई मायनों में बेहद खास है । ये न सिर्फ नासा की ओर से बनाया गया अबतक का सबसे भारी और बड़ा अंतरिक्ष यान है बल्कि नासा के दस सबसे विशिष्ट और तकनीक संपन्न अंतरिक्ष उपकरणों को लेकर गया है । पहली बार वैज्ञानिकों की मदद के बिना किसी अंतरिक्ष यान की स्वाचालित ‘लैंडिंग’ हुई । अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ । . क्यूरियोसिटी अपने साथ ऐसे उपकरणों को ले गया है, जिससे वह चट्टानों और मिट्टी के नमूनों की जांच वहीं कर सकता है । पहले के मिशन पर भेजे गये यानों में इस तरह की कोई सुविधा नहीं थी । इसमें दो रोबोटिक हाथ लगे हैं, जो विभित्र उपकरणों को संचालित करने के काम आते हैं । इसी से यह मंगल ग्रह की सतह की खुदाई करेगा और मिट्टी को विश्लेषण के लिए यान के दूसरे उपकरण के पास भेज देगा । इसमें प्लूटोनियम बैट्री है, जिससे इसे दस साल से भी ज्यादा समय तक लगातार ऊर्जा मिलती रहेगी । वैज्ञानिक को अब इस बात का पता लगाना है कि मार्स का उत्तरी गोलार्ध सतही और नीचे क्यों है? कहा जाता है कि कभी इस सतह पर पानी बहने के कारण ऐसा हुआ होगा। जबकि दक्षिणी गोलार्ध काफी उबड़-खाबड़ और पथरीला क्यों है? मार्स का दक्षिणी गोलार्ध उत्तरी गोलार्ध से करीब 4.8 किलोमीटर ऊंचा है । मार्स पर मिथेन की खोज‘मार्स एक्सपे्रस स्पेसक्रॉफ्ट’ ने 2003 में की थी। दरअसल, मिथेन सिंपल ऑर्गेनिक मोलेक्यूल है, जो सड़े हुए पदार्थ से पैदा होती है। मार्स के वातावरण में मिथेन गैस पिछले 300 सालों से ही है। अब सवाल यह है कि मार्स के वातावरण में मिथेन कहां से आया? ‘ क्यूरियोसिटी के सामने गेल कार्टर पर चढ़ने की चुनौती है । गेल कार्टर मध्य मंगल की एक चट्टान है । इसकी जांच करने के लिए क्यूरियोसिटी को पांच किलोमीटर की चढ़ाई करनी होगी. अब तक की रिसर्च से लगता है कि मंगल की चट्टानों में पानी का अंश मौजूद है । क्यूरियोसिटी के भीतर ही एक प्रयोगशाला है । रोवर पता लगा सकेगा कि क्या मंगल पर एककोशिकीय जीवन फूटा था या इसकी संभावनाएं हैं । क्यूरियोसिटी रोवर की इस सफलता से दुनिया को बहुत उम्मीदें है । इसके जिनके जरिए ग्रह की चट्टानों, मिट्टी और वायुमंडल का विश्लेषण किया जा सकता है। जिससे दुनियाँ को मंगल के अतीत के बारे महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती हैं साथ में यह पता चल सकता है कि अतीत में मंगल पर कितना पानी था, क्यां वहां की परिस्थितियां जीवन के अनुकूल थीं और ऐसे क्या कारण थे, जिनकी वजह से यह ग्रह आज एक बंजर लाल रेगिस्तान में तब्दील हो गया। मंगल की नई विज्ञान प्रयोगशाला ग्रह पर भेजे गए पिछले मिशनों से प्राप्त अनुभवों पर आधारित है। नए मिशन में उन तकनीकों को शामिल किया गया है, जो आगे चल कर मंगल से नमूने लाने में मदद करेगी और अंतत वहां मनुष्य के मिशन को सुगम बनाएगी।
चौथा भाग : मंगल के लिए पूर्व में भेजे गये अभियान मंगल के लिए पूर्व में दर्जनों अंतरिक्ष यान, जिसमें ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर शामिल है, ग्रह के सतह, जलवायु और भूविज्ञान के अध्ययन के लिए सोवियत संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप और जापान द्वारा भेजे गए है । नासा के मार्स ओडिसी यान ने 2001 में मंगल की कक्षा में प्रवेश किया । ओडिसी के गामा रे स्पेक्ट्रोमीटर ने मंगल के उपरी मीटर में महत्वपूर्ण मात्रा की हाइड्रोजन का पता लगाया । ऐसा लगता है कि यह हाइड्रोजन, जल बर्फ के विशाल भंडार में निहित है । यूरोपीय अंतरिक्ष अभिकरण का अभियान, मार्स एक्सप्रेस, 2003 में मंगल पर पहुंचा । इसने बीगल 2 लैंडर को ढोया, जो अवतरण के दौरान विफल रहा और फरवरी 2004 में इसे लापता घोषित किया गया। 2004 की शुरुआत में प्लेनेटरी फूरियर स्पेक्ट्रोमीटर टीम ने घोषणा की कि इस यान ने मंगल के वायुमंडल में मीथेन का पता लगाया था । जनवरी 2004 में, नासा के जुड़वा मंगल अन्वेषण रोवर, स्पिरिट ( एम.इ.आर.-ए ) और ओपोर्च्युनिटी ( एम.इ.आर.-बी ) मंगल की धरती पर उतरे । दोनों को अपने सभी लक्ष्यों से अधिक मिला । अनेकों अति महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्यों के बीच यह एक निर्णायक सबूत रहे है कि दोनों अवतरण स्थलों पर पूर्व में कुछ समय के लिए तरल पानी मौजूद था । मंगल के धूल बवंडर और हवाई तूफानों ने कई अवसरों पर दोनों रोवरों के सौर पैनलों को साफ किया है, और इस प्रकार उनके जीवन काल में वृद्धि हुई है । स्पिरिट रोवर ( एम.इ.आर.-ए ) 2010 तक सक्रिय रहा था, जब तक कि इसने आंकड़े भेजना बंद नहीं कर दिया । 10 मार्च, 2006 को नासा का मंगल टोही परिक्रमा यान (एमआरओ), एक दो-वर्षीय विज्ञान सर्वेक्षण चलाने के लिए कक्षा में पहुंचा । इस यान ने आगामी लैंडर अभियान के लिए उपयुक्त अवतरण स्थलों को खोजने के लिए मंगल के इलाकों और मौसम का मानचित्रण शुरू किया । 3 मार्च, 2008 को वैज्ञानिकों ने बताया, एमआरओ ने ग्रह के उत्तरी ध्रुव के पास एक सक्रिय हिमस्खलन श्रृंखला की पहली छवि बिगाड़ दी । मंगल की ओर रवाना सभी अंतरिक्ष यानों में लगभग आधे ही सफल हुए है । कुछ अभियान पूरा होने या यहाँ तक कि अपने अभियान के शुरुआत के पहले ही किसी ना किसी तरीके से विफल हो गए । अभियान विफलता के लिए आमतौर पर तकनीकी समस्याओं को जिम्मेदार माना जाता है, और योजनाकार प्रौद्योगिकी और अभियान लक्ष्यों का संतुलन करते है । 1995 के बाद से विफलताओं में शामिल है मार्स 96 ( 1996 ), मार्स क्लाइमेट ऑर्बिटर ( 1999 ),मार्स पोलार लैंडर ( 199 ), डीप स्पेस 2 ( 1999), नोजोमी ( 2003 ), और फोबोस-ग्रंट ( 2011 ) ।
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