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पुराने कंप्यूटर को कैसे करें अपग्रेड ?

संत समीर हमारे जैसे ग़रीब-ग़ुरबों के लिए, जो अपने पुराने कम्प्यूटर की रफ़्तार से आजिज़ आ चुके हैं, पर नए कम्प्यूटर में पैसा लगाने से बचना चाहते हैं। परसों मैंने अपने क़रीब आठ साल पुराने कम्प्यूटर को अपग्रेड करते समय जो अ…

पुराने कंप्यूटर को कैसे करें अपग्रेड ?
संत समीर
हमारे जैसे ग़रीब-ग़ुरबों के लिए, जो अपने पुराने कम्प्यूटर की रफ़्तार से आजिज़ आ चुके हैं, पर नए कम्प्यूटर में पैसा लगाने से बचना चाहते हैं। परसों मैंने अपने क़रीब आठ साल पुराने कम्प्यूटर को अपग्रेड करते समय जो अनुभव किया वह आपको बताता हूँ।

कम्प्यूटर की रफ़्तार बढ़ाने का सबसे आसान तरीक़ा यह है कि आप ऑपरेटिङ्ग सिस्टम को चलाने के लिए अब तक जो हार्ड डिस्क ड्राइव (HDD) इस्तेमाल कर रहे थे, उसकी जगह पर एसएसडी (SSD) लगाइए। यह आपके कम्प्यूटर की रफ़्तार कई गुना तेज़ कर देगी। इसका मतलब यह न समझें कि आपकी पुरानी हार्ड ड्राइव बेकार हो जाएगी। ऑपरेटिङ्ग सिस्टम के अलावा यह आपके बाक़ी सारे माल-असबाब का ज़ख़ीरा (डेटा) पूर्ववत, बल्कि पहले से कुछ ज़्यादा सुरक्षित ढङ्ग से सहेजने का काम करती रहेगी।

एचडीडी और एसएसडी में अन्तर यह है कि एचडीडी ठीक-ठाक इस्तेमाल की जा रही हो तो इसकी उम्र आठ-दस साल ही मानिए, क्योंकि यह मैकेनिकल होती है। इसके ठोस दिखने वाले डिब्बे के भीतर मोटर, घिर्री, बेल्ट का समायोजन होता है। कान लगाकर इसकी तेज़ रफ़्तार की सनसनाहट आप महसूस कर सकते हैं। एसएसडी नाम से ही है, सॉलिड स्टेट ड्राइव, यानी इसके भीतर कोई ऐसी चीज़ नहीं होती, जो चलती या घूमती हो। यह पूरी तरह सॉलिड होती है, इस नाते इसकी उम्र भी बहुत ज़्यादा होती है। यह जिस तकनीक पर काम करती है, वह दिलचस्प है, पर उसका विस्तार ज़्यादातर लोगों के शायद काम का न हो। बस इतना ध्यान देना चाहिए कि आप ऐसी एसएसडी लें, जिसमें कण्ट्रोलर बढ़िया लगा हो। डेटा संयोजित करने की ज़िम्मेदारी कण्ट्रोलर ही निभाता है। सामान्य टाइपिङ्ग वग़ैरह के ही काम निकालने हों तो बिना कण्ट्रोलर वाली सस्ती एसएसडी से भी काम चला सकते हैं, पर मेरी राय में आप एक ऐसी एसएसडी लें कि पाँच-दस साल तक भी आपको तकनीकी रूप से पिछड़ जाने का मलाल न हो।

केवल एसएसडी के फ़ायदे सुनकर ही कोई भी एसएसडी ख़रीदने का फ़ैसला मत ले लीजिए, क्योंकि अभी हाल यह काफ़ी महँगी आती है और बिना सोचे-समझे कुछ भी ख़रीद लेने पर, अगर यह आपके कम्प्यूटर में न लग पाई, तो पछताना पड़ सकता है।

एसएसडी कई तरह की होती है, पर ज़्यदातर कामों के लिए तीन तरह की एसएसडी पर निगाह डाल लेना पर्याप्त है। पुराने ज़्यादातर कम्प्यूटरों में 2.5 SATA-3 एसएसडी लगाकर काम चलाया जा सकता है। जिनके कम्प्यूटरों में सिर्फ़ SATA-2 पोर्ट है, उनमें भी यह लग जाती है। यह बात ज़रूर है कि कम्प्यूटर में अगर SATA-3 पोर्ट हो तो रफ़्तार ज़्यादा अच्छी मिलेगी। एक एसएसडी है M.2 SATA ..पर कम्प्यूटर में ठीक से ताक-झाँक करके देख लें कि उसमें M.2 पोर्ट हो तभी इसे ख़रीदने का फ़ैसला लें। लैपटॉप में यह पोर्ट होता ही है, इसलिए यह लैपटॉप के लिए बेहतर है। वैसे इन दोनों तरह की एसएसडी की रफ़्तार में ज़्यादा अन्तर नहीं है। M.2 में आप केबल लगाने की झण्झट से बच जाते हैं बस। सबसे बढ़िया रफ़्तार वाली एसएसडी है M.2 NVMe…। SATA केबल वाली एसएसडी की तुलना में इसकी रफ़्तार सात-आठ या दस गुना तक तेज़ हो सकती है। इसके लिए देखना पड़ेगा कि कम्प्यूटर के मदरबोर्ड में ZEN 3x4 पोर्ट है या नहीं। बॉयस में भी NVMe सपोर्ट होना चाहिए, अन्यथा भूलकर भी इसे न ख़रीदें। बॉयस की अनुकूलता देखने के लिए थोड़ी ज़्यादा तकनीकी जानकारी चाहिए, पर SATA और M.2 पोर्ट आपको मदरबोर्ड पर साफ़-साफ़ लिखे दिख जाएँगे।

कम दाम में मेरे लिहाज से WD Blue SATA SSD और Seagate BARACUDA SATA एसएसडी बढ़िया हैं। ये तीन से चार हज़ार रुपये के आसपास मिल जाएँगी। मैंने BARACUDA SATA-3 अमेजॉन से दीवाली ऑफ़र में तीन हज़ार में ख़रीदी। लेनी हो तो 120 जीबी वाली मत लीजिए। कम-से-कम 240 या 250 जीबी वाली लीजिए, तो आपको यह मलाल न रहेगा कि यह जल्दी से भर गई। समझदारी इस बात में भी है कि एसएसडी में ऑपरेटिङ्ग सिस्टम के अलावा दूसरी सामग्री मत रखिए। अन्य चीज़ों के लिए आप अलग एसएसडी या एचडीडी इस्तेमाल में लाइए। 250 जीबी से बड़ी एसएसडी लें तो ही इसमें पार्टीशन करके अन्य सामग्री रखें, लेकिन 500 जीबी के आसपास की एसएसडी आठ-दस हज़ार रुपये से कम में नहीं मिलेगी। सस्ता तरीक़ा यही है कि ऑपरेटिङ्ग सिस्टम एसएसडी पर चलाइए और अन्य चीज़ों के लिए 1-2 टीबी या इससे भी बड़ी एचडीडी ख़रीद लीजिए।

एसएसडी इंस्टालेशन का तरीक़ा आमतौर पर किसी से पूछेंगे या इण्टरनेट वग़ैरह पर देखेंगे तो दिमाग़ घनचक्कर हो सकता है, इसलिए मैं अपना आज़माया आसान-सा तरीक़ा बताता हूँ। लोग आपको बताएँगे कि आप सबसे पहले बॉयस में जाकर SATA पोर्ट का विकल्प पहले वाले से हटाकर उस पर कीजिए, जिस पोर्ट पर आपने एसएसडी को जोड़ा है..बूट ऑप्शन को हार्डड्राइव से बदल कर यूएसबी पर कीजिए, वग़ैरह-वग़ैरह। मेरे हिसाब से बॉयस पर आपको जाने की ज़रूरत तभी पड़ सकती है, जबकि इसके पहले आपने विण्डोज़ इंस्टॉल करते समय दूसरा तरीक़ा इस्तेमाल किया हो। अगर आपके पास बूटेबल पेनड्राइव है और पहले भी आपने पेनड्राइव से ही विण्डोज़ इंस्टॉल किया हो तो बॉयस को छेड़ने की ज़रूरत नहीं है। बॉयस के साथ दिक़्कत यह है कि अगर आपको इसकी ठीक से जानकारी नहीं हो, तो ज़रा भी ग़लती आपको बड़े झमेले में डाल सकती है। यहीं पर यह भी ध्यान रखें कि बूटेबल पेनड्राइव के लिए RUFUS वग़ैरह के झमेले में भी फ़ँसने की ज़रूरत नहीं है। बूटेबल पेनड्राइव आप माइक्रोसॉफ़्ट की वेबसाइट पर जाकर बड़ी आसानी से बना सकते हैं।

आपको करना दरअसल यह है कि जिस SATA पोर्ट में ऑपरेटिङ्ग सिस्टम चलाने वाला आपका पहले वाला एचडीडी लगा हुआ है, उसके SATA केबल को छोड़ी देर के लिए मदरबोर्ड के SATA स्लाट से बाहर निकाल दीजए। पॉवर केबल भले लगा रहे, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। अब जो स्लाट आपने ख़ाली किया है, उसी में एसएसडी से SATA केबल जोड़िए। यह ऑपरेटिङ्ग सिस्टम के बॉयस में जाने से बचा लेगा और आपके सिस्टम का डिफाल्ट डिवायस अपने आप चयनित हो जाएगा। अब मज़े में पेनड्राइव लगाइए और कम्प्यूटर ऑन करके विण्डोज़ इंस्टॉल कीजिए। ध्यान रखें कि विण्डोज़ इंस्टॉलेशन के बाद कम्प्यूटर अपने आप रिस्टार्ट होना शुरू हो तो पेनड्राइव बाहर निकाल लीजिए, वरना यह बार-बार विण्डोज़ इंस्टॉल करने को कहेगा और आप क्लिक पर क्लिक मारते रहेंगे और बात आगे न बढ़ेगी। विण्डोज़ इंस्टॉल करने के बाद पहले वाली हार्ड ड्राइव का SATA केबल मदरबोर्ड के किसी भी अन्य SATA पोर्ट से जोड़ दीजिए, इसके सारे पार्टीशन आपके कम्प्यूटर पर दिखाई देने लगेंगे। ऑपरेटिङ्ग सिस्टम वाले पार्टीशन को आप रखना चाहें तो रखें अन्यथा फार्मेट करके उपयोग में लें।

इस अपग्रेड से मुझे एक बात और पता चली कि हर तरफ़ सब कुछ नक़ली ही नहीं है। जब मैं परसों की रात विण्डोज़ इंस्टॉल कर रहा था तो एक बार डरा कि कहीं मेरे विण्डोज़-10 प्रोफेशनल की ‘एक्टिवेशन-की’ ओरिजिनल न हुई तो कम्प्यूटर ब्लाक भी हो सकता है। असल में दो साल पहले जब मैंने ईबे की वेबसाइट से विण्डोज़-10 प्रोफेशनल का डिजिटल ‘की-Key’ सिर्फ़ सात सौ रुपये में ख़रीदने का फ़ैसला लिया था तो आशङ्का भी हुई थी कि दस-बारह हज़ार रुपये की एक्टिवेशन-की भला सात सौ रुपये में कैसे मिल सकती है? मैंने बेवसाइट से बात की तो उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट से ख़रीदी के तौर-तरीक़ों के बारे में कुछ बातें बताईं। बातें तो ख़ैर आधी-अधूरी ही समझ में आईं, पर आश्वस्त होकर मैंने ऑर्डर दे दिया। बाद में इण्टरनेट पर सर्च करने की कोशिश की तो यूट्यूब वग़ैरह पर लोगों ने यही बताया था कि इतनी सस्ती की-Key नक़ली हो सकती है। यह भी कि बेचने वाला बेचने के बाद पकड़ से ग़ायब हो जाता है। यह भी हो सकता है कि ऐसी ‘की-Key’ दो-चार महीने काम करे और फिर ब्लाक हो जाए। बहरहाल, मेरा विण्डोज़-10 प्रोफोशनल ओरिजिनल निकला। उस वक़्त इंस्टॉलेशन में कुछ परेशानी हुई तो फ़ोन करने पर बेवसाइट ने पूरी प्रक्रिया भी समझाई। दो साल बाद परसों जब मैंने इसे रिइंस्टॉल करते हुए माइक्रोसॉफ्ट की वेबसाइट पर लॉगिन किया तो मेरा नाम सिस्टम पर आटोमैटिक सर्च हुआ, मुझे दुबारा से की-Key डालने की ज़रूरत नहीं पड़ी और सारे अपडेट ओके हुए। यह ‘ओईएम की’ है, इसलिए इसका इस्तेमाल सिर्फ़ एक कम्प्यूटर पर ही मैं कर सकता हूँ (यह बात अलग है कि अवैध जुगाड़ मुझे मालूम है), लेकिन यह लाइफटाइम वाला है, तो अपडेट हमेशा मिलते रहेंगे। एसएसडी लगने के बाद कम्प्यूटर की रफ़्तार फर्राटेदार है।

इसे मैंने महज़ इसलिए लिखा है कि तकनीक से भी थोड़ी-सी मुहब्बत बुरी नहीं है।
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