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दिमाग की हैकिंग

जानेमाने वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग एक ऐसे उपकरण का परीक्षण कर रहे हंै, जो उन्हें अपनी मस्तिष्क तरंगों के जरिए संवाद करने में मदद करेगा। यह उपकरण अमेरिका की स्टेनफर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किया जा रहा है।…

दिमाग की हैकिंग
जानेमाने वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग एक ऐसे उपकरण का परीक्षण कर रहे हंै, जो उन्हें अपनी मस्तिष्क तरंगों के जरिए संवाद करने में मदद करेगा। यह उपकरण अमेरिका की स्टेनफर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किया जा रहा है। आइब्रेन नामक यह उपकरण मस्तिष्क की तरंगों को ग्रहण करके एक कंप्यूटर में भेजता है, जो उन्हें शब्दों में बदल देता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह प्रोजेक्ट हाकिंग के दिमाग की हैकिंग करने जैसा है। यह उपकरण प्रारंभिक तौर पर नींद की निगरानी के लिए बना है, लेकिन यह उन लोगों की भी मदद कर सकता है, जो बोले बिना ही सिर्फ सोचते हुए अपनी बात कहना चाहते हैं। यह उपकरण आपके मन की बात को भांप सकता है। इस उपकरण से मस्तिष्क में होने वाली विद्युत गतिविधियों नापा जाता है। आइब्रेन एक हैडबेंड जैसा है, जिसे सिर पर फिट किया जाता है। इसमें न्यूरोट्रांसमीटर लगे हुए हैं। प्रो. हॉकिंग एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (एएलएस) नामक बीमारी से पीडि़त हैं। इसे लू गेहरिग रोग भी कहा जाता है। इस बीमारी के कारण हाकिंग लगभग पूरी तरह से पंगु हो चुके हैं, करीब 30 वर्ष पूर्व वह अपनी बोलने की क्षमता खो चुके थे। उन्हें अपनी बात कहने के लिए इंफ्रारेड स्केनर और कंप्यूटर का सहारा लेना पडता है। इंफ्रारेड स्केनर उनके गालों की मांसपेशियों में होने वाली हलचल को रिकॉर्ड करता है। एक कंप्यूटर प्रोग्राम द्वारा इस हलचल का अर्थ निकला जाता है। यह बहुत ही धीमी और जटिल प्रक्रिया है। हॉकिंग 70 वर्ष के हो चुके हैं और बीमारी के बढ़ने की वजह से वे अपने गालों की मांसपेशियों के इस्तेमाल की क्षमता भी खोते जा रहे हैं। प्रोफेसर हॉकिंग इन दिनों स्टेनफर्ड के प्रोफेसर फिलिप लो के साथ मिल कर काम कर रहे हैं, जिन्होंने आइब्रेन उपकरण का विकास किया है। रिसर्चर कैम्बि्रज में होने वाले एक सम्मलेन में हॉकिंग पर प्रयुक्त टेक्नोलॉजी के नवीनतम परिणामों की जानकारी देंगे। डॉ. लो ने पिछली गर्मियों में खुद कैम्बि्रज जा कर प्रो. हॉकिंग पर इस डिवाइस का परीक्षण किया था। हॉकिंग को आइब्रेन उपकरण पहना कर विभिन्न कार्यो को पूरा करने के बारे में सोचने को कहा गया था। आइब्रेन का परीक्षण करके डॉ. लो यह देखना चाहते थे कि क्या हॉकिंग मस्तिष्क तरंगों का कोई ऐसा निश्चित पैटर्न उत्पन्न कर सकते हैं, जो कंप्यूटर द्वारा शब्दों में अनूदित किए जा सकें ताकि हम सीधे उनके मन में उठने वाले विचारों को पढ़ सकें। डॉ. लो का दावा है कि आइब्रेन का कंप्यूटर प्रोग्राम प्रो. हॉकिंग के विचारों को अलग-अलग संकेतों में बदलने में कामयाब रहा। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस टेक्नोलॉजी के और उन्नत होने के बाद ज्यादा जटिल मस्तिष्क गतिविधियों को समझना और उन्हें शब्दों में बदलना आसान हो जाएगा। यह किसी व्यक्ति की माइंड रीडिंग जैसा होगा। प्रो. लो का कहना है कि हम ऐसी टेक्नोलॉजी विकसित कर रहे हैं, जो मनुष्य को पहली बार मानव मस्तिष्क में झांकने में समर्थ बना देगी। डॉ. लो का ख्याल है कि वे अपनी रिसर्च को और आगे बढ़ा कर एक ऐसा सॉफ्टवेयर विकसित कर सकते हैं, जो मस्तिष्क तरंगो को विचारों में बदल सकता है, जिन्हें बाद में अक्षरों, शब्दों और वाक्यों में अनूदित किया जा सकता है। वह दिन दूर नहीं जब सारी बातचीत आइब्रेन और कंप्यूटर साफ्टवेयर के जरिए होगी और स्पीकरों पर सुनाई देगी। माइंड रीडिंग के अलावा आइब्रेन के कई मेडिकल उपयोग भी हो सकते है। मसलन डॉक्टर व्यक्ति की मस्तिष्क तरंगों के आधार दवा की सही मात्रा निर्धारित कर सकेंगे। इसका उपयोग नींद से जुड़ी बीमारियों और डिप्रेशन आदि के इलाज के लिए भी किया जा सकता है। इस उपकरण के इस्तेमाल से शारीरिक अंगों की हलचल को विभिन्न शब्दों से जोड़ कर पूरा वाक्य बनाना संभव हो सकेगा। इससे उन लोगों को संवाद करने में सुविधा होगी जो हाथ-पैर की मांसपेशियों के शिथिल होने की बीमारी से पीडि़त हैं और जो शरीर के बजाय मस्तिष्क पर ज्यादा निर्भर हैं।
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