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जूनो ने बदली बृहस्पति की समझ

चंद्र भूषण सूर्यदेव के ज्येष्ठ पुत्र के बारे में हालिया समझ के लिए पढ़ें पिछले साल की यह पोस्ट, इस जोड़ के साथ कि कई और बुनियादी जानकारियाँ हमें सौंपकर जूनो यान पिछली जुलाई में बृहस्पति में ही विलीन हो चुका है। जूनो ने बदल…

जूनो ने बदली बृहस्पति की समझ
चंद्र भूषण
सूर्यदेव के ज्येष्ठ पुत्र के बारे में हालिया समझ के लिए पढ़ें पिछले साल की यह पोस्ट, इस जोड़ के साथ कि कई और बुनियादी जानकारियाँ हमें सौंपकर जूनो यान पिछली जुलाई में बृहस्पति में ही विलीन हो चुका है।

जूनो ने बदली बृहस्पति की समझ

करीब 20 महीने से नासा का अंतरिक्ष यान जूनो बृहस्पति ग्रह के चक्कर लगा रहा है। इसके भेजे धुआंधार आंकड़ों के विश्लेषण से निकाले गए नतीजे पिछले आठ-नौ महीनों से शोध पत्रिकाओं में छप रहे हैं। इसे सूचना क्रांति का कमाल कहना चाहिए कि इतने कम समय में इसने हमारे सौरमंडल के सबसे विशाल ग्रह के बारे में विशेषज्ञों की राय को कई पहलुओं से बदल दिया है। इतना ही नहीं, इसने गैसीय ग्रहों की हमारी समझ को भी काफी महीन बनाया है, जो अन्य तारों के इर्द-गिर्द पाए जाने वाले इस बिरादरी के और ग्रहों को समझने में भी हमारे काम आएगी।

संदर्भ के लिए बता दें कि अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था नासा ने 5 अगस्त 2011 को यह स्पेसक्राफ्ट बृहस्पति के लंबे सफर के लिए रवाना किया था। प्रेक्षण के लिए इस पर सिर्फ दो तरह के उपकरण लगे हैं। तस्वीरें लेने के लिए कैमरे और गुरुत्वाकर्षण में बारीक बदलावों का अध्ययन करने के लिए बेहद संवेदनशील गुरुत्वमापी। शोध पत्रिका ‘नेचर’ में हाल में छपी चार अध्ययन रिपोर्टों और पिछले साल बृहस्पति पर एक जमाने से जारी तूफान को लेकर आई एक रिपोर्ट पर बात करने से पहले हम थोड़ी चर्चा इस ग्रह के बारे में अब तक की कुछ जानकारियों पर भी कर लेते हैं।

सौरमंडल में सूरज से दूर जाने के क्रम में पांचवें नंबर पर पड़ने वाला बृहस्पति वैज्ञानिक दायरे में एक असफल तारा (फेल्ड स्टार) भी कहलाता है। यानी इसका वजन अगर तीन-चार गुना और होता तो शायद यह सबसे निचले स्तर का तारा (ब्राउन ड्वॉर्फ) बन गया होता। अपने ग्रह से तुलना करें तो इसका आकार 1321 पृथ्वियों के बराबर है, जबकि इसकी तोल 317.8 पृथ्वियों जितनी है। जाहिर है, बृहस्पति का घनत्व पृथ्वी से काफी कम है। और तुलना अगर अपने तारे से करनी हो तो इतना ही कहना काफी होगा कि तराजू एक पलड़े पर सूरज को रख दिया जाए तो डंडी सीधी रखने के लिए दूसरे पलड़े पर 1047 बृहस्पति रखने पड़ जाएंगे।

इस ग्रह के आकार का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि 12 पृथ्वियां एक सीध में रख दें तो बृहस्पति की चौड़ाई मिल जाएगी। लेकिन इतना बड़ा ग्रह सिर्फ 10 घंटे में अपनी धुरी पर पूरा घूम जाता है। यानी इसके घूमने की रफ्तार पृथ्वी की तकरीबन सवा सौ गुनी है। सौरमंडल के चारों ठोस भीतरी सदस्यों बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल के विपरीत बृहस्पति एक गैस जायंट है। 90 फीसद हाइड्रोजन और 10 फीसद हीलियम से बनी बेहद हल्की चीज, जिसमें थोड़ी-थोड़ी मीथेन और अमोनिया की मौजूदगी इसकी गंध को गंदी, दलदली जगहों जैसी बनाती है। लेकिन इस ग्रह की सबसे बड़ी खासियत है इस पर चलने वाले तूफान, जो सैकड़ों वर्षों से इसे रहस्यों की खान बनाए हुए हैं।

गैलीलियो ने अपनी ही बनाई दूरबीन के जरिये लंबे प्रेक्षणों के बाद सन 1610 में इस ग्रह पर लाल, पीली, सफेद पट्टियों की मौजूदगी दर्ज की थी। बाद में इस पर एक बड़ा लाल धब्बा भी दर्ज किया गया, जिसे द ग्रेट रेड स्पॉट कहते हैं। टेलिस्कोपों के ताकतवर होने के साथ पता चला कि इसकी पट्टियां पूरब से पश्चिम और पश्चिम से पूरब की ओर चलने वाली तेज हवाएं (जेट स्ट्रीम्स) हैं, जबकि ग्रेट रेड स्पॉट संभवत: 300 वर्षों से चल रहा 16,350 किमी दायरे वाला एक तूफान। पिछले साल के मध्य में जूनो के प्रेक्षणों पर ही आधारित एक रिपोर्ट में बताया गया कि इस तूफान का आकार घट रहा है। 1979 में ज्यादा लंबे सफर पर निकले दोनों वॉएजर यानों ने इसका क्षेत्रफल जितना बताया था, फिलहाल यह उसका एक तिहाई ही रह गया है।

खगोलशास्त्रियों में बृहस्पति से जुड़ी सबसे बड़ी उत्सुकता यह चली आ रही है कि इसकी कोई सतह भी है या नहीं, और अगर है तो यह बाहर से नजर आने वाली बादलनुमा संरचना से कितने नीचे है। जूनो ने इस सवाल का पुख्ता जवाब दे दिया है। इजरायल के योहाई कैस्पी की टीम ने जूनो के भेजे गुरुत्व के आंकड़ों में मौजूद विसंगतियों (एनॉमलीज) का अध्ययन किया, जबकि फ्रांस के त्रिस्तान गुइलो की टीम ने इनकी सुसंगति (कॉन्सिस्टेंसी) का। उपमा में इन दोनों अध्ययनों को एक विशाल कागज की सफेदी और उस पर मौजूद धब्बों के अध्ययन जैसा माना जा सकता है। हालांकि ये अध्ययन कागज जैसी टू-डाइमेंशनल (सिर्फ लंबाई-चौड़ाई तक सीमित) सतह के बजाय थ्री-डाइमेंशनल (लंबी-चौड़ी के साथ-साथ गहरी भी) सतह के ब्यौरे सामने लाते हैं।

दोनों ही अध्ययनों का निष्कर्ष यह है कि बादलों जैसी दिखने वाली ऊपरी सतह के तीन हजार किलोमीटर नीचे तक इस ग्रह की गैसें तेज-रफ्तार पट्टियों की शक्ल में घूमती हैं, लेकिन वहां पहुंचकर ये स्थिर हो जाती हैं। यानी बृहस्पति की सतह बाहर से दिखने वाले बादलों के तीन हजार किलोमीटर नीचे पड़ती है, हालांकि यह चट्टानी ग्रहों की तरह ठोस न होकर एक द्रव सतह है। जूनो के भेजे आंकड़ों के आधार पर की गई दो और बड़ी खोजों का संबंध इसके उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवीय इलाकों के बीच मौजूद अंतर से है।

पृथ्वी के सबसे ताकतवर टेलिस्कोप भी बृहस्पति की खास स्थिति के चलते इसके ध्रुवीय इलाकों का अध्ययन करने में अक्षम सिद्ध हुए हैं। लेकिन इटली के अल्बर्टो ऐड्रियानी की टीम ने पाया कि इसके उत्तरी ध्रुव पर जारी एक विशाल चक्रवात के इर्दगिर्द एक समबाहु अष्टभुज के आठों कोनों पर एक-एक चक्रवात स्थित हैं, जबकि दक्षिणी ध्रुव पर ऐसे ही ध्रुवीय चक्रवात के इर्दगिर्द एक समबाहु पंचभुज के पांचों कोनों पर एक-एक चक्रवात डेरा जमाए हुए हैं। दोनों ध्रुवों के बीच इस फर्क की कोई वजह अब तक नहीं खोजी जा सकी है।

हां, इटली के ही लूसियानो आएस की टीम ने बृहस्पति के दोनों ध्रुवों के गुरुत्वाकर्षण में जो फर्क दर्ज किया है (यानी आप उत्तर में खड़े हों तो तराजू आपका वजन ज्यादा और दक्षिण में खड़े हों तो कम बताएगा), उसकी वजह उन्होंने इस ग्रह पर गैसीय बहाव के पैटर्न में खोजी है। सूरज के बाद सौरमंडल के इस सबसे बड़े सदस्य के बारे में ढेरों अनसुलझे सवालों के जवाब अभी मिलने बाकी हैं। मसलन यह कि इसकी द्रव सतह के नीचे कहीं अचानक आने वाली धात्विक हाइड्रोजन की कोई ठोस कोर भी है या नहीं। उम्मीद करें कि इस साल जुलाई में बृहस्पति पर ही सद्गति पाने से पहले जूनो इनमें से कई उलझनें अंतिम तौर पर सुलझा देगा।
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