चैटजीपीटी का बढ़ता असर
अकादमिक शोध की विश्वसनीयता पर सवाल
डॉ. शशांक द्विवेदी
परियोजना प्रबंधक,टीएसएससी
(कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय,भारत सरकार)
विज्ञान और ज्ञान की दुनिया में अकादमिक शोध पत्रिकाएँ हमेशा से विश्वसनीयता, मौलिकता और कठोर समीक्षा प्रक्रिया का प्रतीक रही हैं। लेकिन हाल के वर्षों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), विशेषकर चैटजीपीटी जैसे उपकरणों के बढ़ते उपयोग ने इस व्यवस्था के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। एक हालिया अध्ययन के अनुसार, नवंबर 2022 में चैटजीपीटी के सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने के बाद से वैज्ञानिक शोध-पत्रों के लेखन में एआई के उपयोग में 42 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह वृद्धि जितनी तेज़ है, उतनी ही चिंताजनक भी।
यह अध्ययन 2021 से 2026 के बीच हजारों शोध-पत्रों और उनकी समीक्षाओं के विश्लेषण पर आधारित है। इसमें पाया गया कि अब अधिकांश शोध सारांशों में किसी न किसी स्तर पर एआई का इस्तेमाल किया जा रहा है, और कई मामलों में 70 प्रतिशत से अधिक सामग्री एआई द्वारा तैयार की गई है। यह प्रवृत्ति न केवल शोध की प्रकृति को बदल रही है, बल्कि उसकी गुणवत्ता पर भी प्रश्नचिह्न लगा रही है।
गुणवत्ता बनाम सुविधा का संघर्ष
एआई आधारित लेखन ने शोधकर्ताओं के लिए लेखन को आसान बना दिया है। भाषा सुधार, संरचना निर्माण और तेजी से सामग्री तैयार करने में यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित हो रही है। लेकिन यही सुविधा अब गुणवत्ता में गिरावट का कारण भी बनती दिख रही है। बड़ी संख्या में ऐसे शोध-पत्र सामने आ रहे हैं, जिनमें गहराई, मौलिकता और आलोचनात्मक विश्लेषण का अभाव है।
शोध-पत्र केवल जानकारी का संकलन नहीं होते, बल्कि वे विचारों की नवीनता, तर्क की मजबूती और निष्कर्षों की विश्वसनीयता पर आधारित होते हैं। एआई, जो मूलतः पहले से उपलब्ध डेटा पर आधारित होता है, अक्सर इन मानकों को पूरा करने में असफल रहता है। परिणामस्वरूप, “औसत दर्जे” के शोध-पत्रों की संख्या बढ़ रही है।
पीयर रिव्यू प्रणाली पर दबाव
शोध पत्रिकाओं की रीढ़ मानी जाने वाली पीयर रिव्यू प्रणाली भी इस बदलाव से प्रभावित हो रही है। एआई की मदद से तैयार किए गए बड़ी संख्या में शोध-पत्र समीक्षा के लिए भेजे जा रहे हैं, जिससे समीक्षकों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। स्वयंसेवी आधार पर काम करने वाले ये विशेषज्ञ अब अधिक समय और संसाधन खर्च करने को मजबूर हैं।
चिंता की बात यह भी है कि अब समीक्षाओं में भी एआई का उपयोग बढ़ रहा है। कई बार यह समीक्षाएँ सतही, सामान्यीकृत और सीमित दृष्टिकोण वाली होती हैं, जो शोध के गहन मूल्यांकन में सक्षम नहीं होतीं।
क्या एआई समान अवसर देता है?
एआई को अक्सर एक “समान अवसर प्रदान करने वाला” उपकरण माना जाता है, विशेषकर उन शोधकर्ताओं के लिए जिनकी अंग्रेज़ी भाषा पर पकड़ कमजोर है। लेकिन अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि ऐसा नहीं है। जिन शोधकर्ताओं को उम्मीद थी कि एआई उनके लेखन को बेहतर बनाकर उन्हें प्रकाशन में मदद करेगा, उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिला।वास्तव में, प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े अनुभवी शोधकर्ता एआई का अधिक प्रभावी उपयोग कर पा रहे हैं, जबकि नए और संसाधन-विहीन शोधकर्ता इससे उतना लाभ नहीं उठा पा रहे। इस प्रकार, एआई कहीं न कहीं असमानता को और बढ़ा रहा है। शोधकर्ताओं द्वारा एआई पर बढ़ती निर्भरता को केवल तकनीकी बदलाव के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह उस प्रोत्साहन प्रणाली की भी “तर्कसंगत प्रतिक्रिया” है, जिसमें अधिक से अधिक शोध-पत्र प्रकाशित करने का दबाव होता है। “पब्लिश या पेरिश” की संस्कृति में, एआई एक तेज़ साधन बनकर उभरा है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हम संख्या के पीछे गुणवत्ता को खोते जा रहे हैं?
आगे का रास्ता: संतुलन और नियमन
एआई को पूरी तरह नकारना न तो संभव है और न ही उचित। यह एक शक्तिशाली उपकरण है, जो सही दिशा में उपयोग होने पर शोध की गुणवत्ता को बेहतर भी बना सकता है। लेकिन इसके लिए स्पष्ट दिशानिर्देश, नैतिक मानक और पारदर्शिता आवश्यक हैं।शोध पत्रिकाओं को चाहिए कि वे एआई के उपयोग को लेकर सख्त नीतियाँ बनाएं, लेखकों से इसका खुलासा करवाएं और समीक्षा प्रक्रिया को और मजबूत करें। साथ ही, शोधकर्ताओं को भी यह समझना होगा कि एआई केवल सहायक है, विकल्प नहीं।
चैटजीपीटी और अन्य एआई उपकरणों का बढ़ता उपयोग अकादमिक जगत के लिए एक दोधारी तलवार साबित हो रहा है। जहां यह लेखन को आसान बना रहा है, वहीं शोध की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को चुनौती भी दे रहा है। ऐसे में आवश्यक है कि हम तकनीक के इस नए दौर में संतुलन बनाए रखें, ताकि ज्ञान की नींव कमजोर न पड़े।
