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ऑक्सीजन को महसूस करने के लिए नोबेल !!!

स्कंद शुक्ला सन् 2015। दो अन्तरराष्ट्रीय सायक्लिस्ट एक ऐसे रसायन का सेवन करते पकड़े जाते हैं , जो मनुष्य के शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या को बढ़ा देता है। इन कोशिकाओं का लाल रंग इनमें मौजूद हीमोग्लोबिन के कारण होता…

ऑक्सीजन को महसूस करने के लिए नोबेल !!!
स्कंद शुक्ला
सन् 2015। दो अन्तरराष्ट्रीय सायक्लिस्ट एक ऐसे रसायन का सेवन करते पकड़े जाते हैं , जो मनुष्य के शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या को बढ़ा देता है। इन कोशिकाओं का लाल रंग इनमें मौजूद हीमोग्लोबिन के कारण होता है , जो ऑक्सीजन को बाँधकर उसे ढोता है। चूँकि इन कोशिकाओं का काम शरीर के तमाम अंगों तक ऑक्सीजन पहुँचाना होता है --- इसलिए अगर लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या बढ़ सकी , तो व्यक्ति सायकिल चलाते समय आसानी से बेहतर प्रदर्शन करने में क़ामयाब हो सकता है। एफजी 4592 / एएसपी 1517 नाम का यह रसायन अभी ( सन् 2015 तक ) दवा के रूप में बाज़ार में उतारा तक नहीं गया है। इसका रोगों में सदुपयोग आरम्भ नहीं हुआ है , किन्तु खेल की दुनिया में दो सायक्लिस्ट इसका दुरुपयोग कर चुके हैं।

खेल में छल करने पर पकड़े जाने पर प्रतिबन्ध के नियम हैं। किन्तु इस घटना ने एक बड़ी बात सामने लाकर रख दी थी। ख़ून की ऑक्सीजन ढोने की क्षमता को किसी भी तरह येन-केन-प्रकारेण बढ़ा सकना , डोपिंग का नया तरीक़ा बनकर सामने आने लगा था। यद्यपि आज यह रसायन रॉक्साडस्टैट के नाम से गुर्दा-रोगियों में इस्तेमाल किया जाने लगा है। किन्तु वैध दवा के रूप में इसका प्रयोग सन् 2018 में मान्य हुआ। अवैध डोपिंग-प्रयोग के तीन साल बाद।

सन् 2019 का चिकित्सा-नोबल-पुरस्कार कोशिकाओं की 'ऑक्सीजन-अनुभूति' के लिए तीन वैज्ञानिकों ग्रेग सेमेन्ज़ा , पीटर रैटक्लिफ़ और विलयम केलिन को मिला है। कोशिकाएँ आसपास ऑक्सीजन की उपस्थिति को पहचान लेती हैं कि वह सामान्य मात्रा है में अथवा कम। ऑक्सीजन की सामान्य मात्रा जिसे नॉर्मॉक्सिया कहते हैं , उसमें उनका बर्ताव एक ख़ास मेल का होता है। यह बर्ताव ऑक्सीजन की कमी --- जिसे हायपॉक्सिया कहा जाता है --- उसके दौरान बदल जाता है।

पहाड़ों पर चढ़ना हो , मैदान में दौड़ना या फिर मग्न होकर नृत्य करना --- ऑक्सीजन की कमी हमें और हमारी कोशिकाओं को न होने का बोध कराती है। हमारा शरीर उसके लिए भीतर आवश्यक बदलाव करता है। मगर यह भी ध्यान रहे कि ऑक्सीजन की मात्रा को पहचानने का यह काम केवल सामान्य कोशिकाएँ ही नहीं करतीं। कैंसर-कोशिकाओं के लिए भी यह काम बहुत ज़रूरी है। अगर जीवित रहना है , जो स्वस्थ और कैंसर दोनों प्रकार की कोशिकाओं को ऑक्सीजन की मात्रा को आसपास लगातार 'सेन्स' करते रहना है। नॉर्मॉक्सिया में एक प्रकार का बर्ताव करना है , हायपॉक्सिया में दूसरे तरह का।

ऑक्सीजन की कमी ( यानी हायपॉक्सिया ) समूचे शरीर में भी हो सकती है और किसी एक ख़ास अंग में भी। हायपॉक्सिया के दौरान एक ख़ास प्रोटीन कोशिकाओं के भीतर जमा होने लगता है। इसका नाम एचआइएफ़ यानी हायपॉक्सिया-इंड्यूसिबल-फ़ैक्टर है। सामान्य स्वस्थ कोशिकाओं में ऑक्सीजन की प्रचुर मौजूदगी के दौरान एचआइएफ़ बनता तो है , किन्तु कोशिका के भीतर नष्ट भी कर दिया जाता है। लेकिन जब ऑक्सीजन की कमी होती है , तब यह नष्ट नहीं होता । बल्कि यह कोशिका के भीतर एकत्रित रहते हुए अनेक जीनों को ऑन-ऑफ़ करने लगता है।

जीन क्या करते हैं ? प्रोटीन का निर्माण। जीन का ऑफ़ होना यानी ? कोशिका के भीतर किसी प्रोटीन का निर्माण रुकना। जीन का ऑन होना यानी ? कोशिका के भीतर किसी प्रोटीन का निर्माण चालू हो जाना। यानी एचआइएफ की वजह से ऑक्सीजन की कमी से जूझती कोशिकाओं के भीतर प्रोटीन-स्तर पर बदलाव होने लगते हैं।

एचआइएफ तभी सक्रिय होता है , जब ऑक्सीजन की कमी होती है। सामान्य स्थिति में इसे काम नहीं करने दिया जाता। शरीर की हर कोशिका , हर ऊतक , हर अंग में एचआइएफ मौजूद है। ऑक्सीजन की कमी से किसी भी कोशिका को कभी भी जूझना पड़ सकता है। कुदरत ने इसलिए हर कोशिका को एचआइएफ से नवाज़ा है।

जिस रसायन को सायक्लिस्टों ने अवैध रूप से इस्तेमाल किया , वह सामान्य कोशिकाओं में एचआइएफ को नष्ट होने से रोक देता है। उसे स्टेबिलाइज़ कर देता है। इसकी वजह से एचआइएफ कोशिकाओं के भीतर उन प्रोटीनों का निर्माण सामान्य स्थिति में ही शुरू कर देता है , जिनका निर्माण केवल ऑक्सीजन की कमी में होना चाहिए था। एचआइएफ के कारण ही अस्थि-मज्जा में हीमोग्लोबिन से भरी लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन बढ़ने लगता है। इसी वजग से इस रसायन को इस्तेमाल करने वाले सायकिल चलाते समय बेहतर प्रदर्शन में क़ामयाब हो जाते हैं। अधिक लाल रक्त कोशिकाएँ , अधिक ऑक्सीजन-संवहन। नतीजन कम थकान और बेहतर प्रदर्शन।

कैंसर-कोशिकाएँ अलग-अलग तरीक़ों से ऑक्सीजन की कमी से बचने की जुगत लगाती हैं। घावों के भराव व तरह-तरह के रोगों में ऑक्सीजन का होना-या न होना बहुत मायने रखता है। मस्तिष्क की तमाम बीमारियों जैसे अल्ज़्हायमर्स , पार्किसंस व अन्य कई में ऑक्सीजन की कमी का योगदान अनेक शोधों में पाया गया है। ऐसे में नॉर्मॉक्सिया-हायपॉक्सिया को समझकर हम दवाओं के निर्माण में इसे भुना सकते हैं। कैंसरों व तमाम डिजनरेटिव बीमारियों की रोकथाम के लिए हायपॉक्सिया , हायपॉक्सिया-इंड्यूसिबल-फ़ैक्टर व इसके कारण होने वाले प्रोटीन-परिवर्तनों की समझ लाभकारी है।

इस वर्ष का नोबल-पुरस्कार ऑक्सीजन को 'महसूस करने' के लिए है। कैसे शरीर की बिलियनों इकाइयाँ उसके होने या न होने को बोधती हैं। वह ऑक्सीजन जो हमारे शरीर के भीतर सभी को चाहिए। अच्छों को भी , बुरों को भी। कैसे वे उसके होने-न होने के कारण बदलती हैं , कैसे उससे समझौता करती हैं। जो सभी के लिए इतनी आवश्यक है , उसकी कमी के कारण होने वाले बदलाव समझना विज्ञान के लिए ज़रूरी है। वहाँ अनेक सम्भावित दवाओं के राज़ छिपे हैं , वहीं अनेक जीवन-रक्षण की सम्भावनाएँ भी।


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