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एक नई आउटसोर्सिंग क्रांति

दरवाजा खटखटा रही है एक नई आउटसोर्सिंग क्रांति

एक नई आउटसोर्सिंग क्रांति

दरवाजा खटखटा रही है एक नई आउटसोर्सिंग क्रांति

चंद्रभूषण

भारत में इक्कीसवीं सदी की शुरुआत कुछ बड़े शहरों के किनारे वाले इलाकों में आई ‘कॉल सेंटर क्रांति’ से हुई थी। इसमें कई तरह के काम शामिल थे लेकिन ज्यादा बड़ा हिस्सा विकसित देशों से की गई आईटी सेवाओं की आउटसोर्सिंग का था। उस क्रांति को धूमिल पड़े कई साल गुजर चुके हैं। ज्यादा सस्ते श्रम के चलते उसका बड़ा हिस्सा बांग्लादेश और कुछ अन्य पिछड़े एशियाई-अफ्रीकी देशों में चला गया और कोविड काल ने उसपर पर्दा ही गिरा दिया। लेकिन आने वाले समय में हमें उसका दोहराव देखने को मिल सकता है।

आउटसोर्सिंग से ही उपजी एक और तरह की क्रांति, और कुछ मायनों में आईटी सेक्टर से ही जुड़ी बड़े पैमाने की एक मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री देश का दरवाजा खटखटा रही है। जैसे लक्षण हैं, सेमीकंडक्टर उद्योग में कुछ नौकरियां 2027 तक देश में आने लगेंगी। ऐपल के गैजेट्स असेंबल करने वाली बड़ी ताइवानी इलेक्ट्रॉनिक मैन्युफैक्चरिंग कंपनी फॉक्सकॉन की कर्नाटक और तेलंगाना की राज्य सरकारों से बातचीत अपने अंतिम चरण में है। उम्मीद है कि दोनों में से किसी एक राज्य में यह साल बीतने तक उसका कारखाना खड़ा होने लगेगा।

फॉक्सकॉन की ही वेदांता ग्रुप से हुई डील का ठिकाना महाराष्ट्र से उठकर गुजरात गया तो राजनीतिक विवाद शुरू हो गया। अभी हाल में वेदांता ग्रुप का बयान आया है कि 2023 की ही आखिरी तिमाही में वे अपना सेमीकंडक्टर प्लांट लगाने की शुरुआत करेंगे और 2027 तक इसमें कंप्यूटर चिप्स का उत्पादन शुरू हो जाएगा। इस उद्योग को टैक्स छूट और अन्य रूपों में दस अरब डॉलर का इंसेंटिव देने की घोषणा भारत सरकार ने 2021 में की थी। इन हलचलों के पीछे इसकी विशेष भूमिका है।

वेदांता और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, दोनों का कहना है कि वे भारत में ओसैट (आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट) के ठिकाने भी खड़े करेंगे। इसमें तैयार हालत में मंगाए गए कंप्यूटर चिप्स को उपकरणों में लगाकर उनकी टेस्टिंग की जाती है। ताइवानी मीडिया के मुताबिक, दुनिया की सबसे बड़ी सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी टीएसएमसी या पावरचिप सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कॉरपोरेशन की ओर से भी भारत में ओसैट कारोबार खड़ा करने की पहल हो सकती है।

सस्ते तकनीकी श्रम और मनमानी कार्यशर्तों के कारण हाल तक इस खास मिजाज की आउटसोर्सिंग में चीनियों का दबदबा था। फिर लगातार दो अमेरिकी राष्ट्रपतियों की कोशिश से चीन को सेमीकंडक्टर्स से जुड़े हर क्षेत्र में अलग-थलग कर दिए जाने के बाद भारत और विएतनाम ओसैट के धंधे पर अपनी दावेदारी जताने में जुट गए हैं।

अभी इलेक्ट्रॉनिक्स के दायरे में आने वाला ऐसा एक भी सामान खोजना मुश्किल है, जिसमें सेमीकंडक्टर्स की मुख्य भूमिका न हो। यह चीज वहां इंटीग्रेटेड सर्किट या चिप के रूप में मौजूद होती है। कंप्यूटरों को तो बात ही छोड़ें, मोबाइल फोन, टीवी, फ्रिज, एसी और थर्मामीटर तक में यह दिमाग जैसी भूमिका निभाती है। इमेज प्रॉसेसिंग से लेकर डेटा प्रॉसेसिंग और टेंप्रेचर कंट्रोल से लेकर सूचनाओं के साथ तरह-तरह के खिलवाड़ तक सारे काम सेमीकंडक्टर्स के ही सहारे होते हैं।

इसके एक अकेले टुकड़े की भूमिका सिर्फ स्विच ऑन, स्विच ऑफ तक ही सीमित है। लेकिन अभी सेमीकंडक्टर्स का आकार छोटा होते-होते बाल की मोटाई के भी दस लाखवें हिस्से जितना हो गया है, लिहाजा ऐसे-ऐसे काम इनसे लिए जाने लगे हैं, जो पचीस साल पहले तक कल्पनातीत समझे जाते थे।

सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री के ब्यौरों में जाएं तो इसकी नींव सिलिकॉन वेफर पर खड़ी है, जिसके प्रॉडक्शन में चीन का दबदबा है। इससे जुड़े दिमागी काम की शुरुआत दुनिया के अलग-अलग ठिकानों पर होती है। सबसे ऊपर है, नए माइक्रो प्रॉसेसर डिजाइन करना, जो इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स के तहत आता है। अमेरिकी कंपनी इंटेल और ब्रिटिश कंपनी एआरएम इस क्षेत्र में छाई हुई हैं। दक्षिण कोरिया की सैमसंग का दबदबा डाइनेमिक रैंडम एक्सेस मेमोरी (ड्रैम) में कायम है। इंटीग्रेटेड सर्किट (आईसी) बनाने में इन दोनों चीजों की अहम भूमिका होती है।

चिप डिजाइनिंग, यानी सिलिकॉन वेफर पर सर्किट्स का खाका खींचने में अमेरिकी कंपनियों क्वालकॉम, ब्रॉडकॉम और न्विडिया का बोलबाला है। यहां से आगे, चिप्स को भौतिक रूप देने में ताइवानी कंपनी टीएसएमसी सबसे आगे है। वह सिलिकॉन वेफर्स पर सर्किट्स की छपाई करके चिप का नक्शा बनाती है, जिसकी तय जगहों पर माइक्रो प्रॉसेसर और ड्रैम चिपकाए जाते हैं। इसके लिए जिन लिथोग्राफी (छापा) मशीनों का इस्तेमाल होता है, वे लगभग सारी की सारी नीदरलैंड्स की कंपनी एएसएमएल होल्डिंग द्वारा बनाई जाती हैं। लिथोग्राफी के लिए स्याही के तौर पर काम आने वाला केमिकल आर्गन फ्लोराइड (आर्फी) सारा का सारा जापानी बनाते हैं।

चिप बनकर तैयार हो जाए, फिर भी इसे सीधे काम में नहीं लाया जा सकता। दिमाग को कुछ करने के लिए एक शरीर भी चाहिए। शरीर, यानी चिप से चलने के लिए बनाया गया इलेक्ट्रॉनिक उपकरण। इसके लिए चिप को असेंबलिंग और टेस्टिंग के जिस चरण से गुजरना पड़ता है, उस ‘ओसैट’ का जिक्र ऊपर किया जा चुका है। भारत में बड़े पैमाने पर स्किल्ड रोजगार की उम्मीद फिलहाल ओसैट से ही है, बशर्ते- 1. चीन से विकसित देशों की सेटिंग कहीं दोबारा न बन जाए, और 2. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) कहीं ओसैट का किस्सा ही न खत्म कर दे।

यह बात भी समझने की है कि दुनिया भर में फैले इन अलग-अलग तरह के कामों में एक भी ऐसा नहीं है, जो बाकी कामों को उनके हाल पर छोड़कर अकेले दम पर जिंदा रह सके। एक जगह से आने वाले ऑर्डर से ही दूसरी जगह का प्रॉडक्शन वॉल्यूम तय होता है। 1995 में ग्लोबलाइजेशन न शुरू हुआ होता तो इतने बड़े पैमाने पर, इतने परफेक्शन के साथ काम करने वाली सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री खड़ी ही न हो पाती। अभी, जब ग्लोबलाइजेशन का खात्मा भी सबसे पहले इसी क्षेत्र में हो रहा है, तब आगे इसकी सेहत कैसी रहेगी, फिलहाल अंदाजे की बात है।

भारत में 2026 तक 80 अरब डॉलर का सेमीकंडक्टर मार्केट होने का अनुमान लगाया गया है। यह बाजार पूरा का पूरा हाथ में आ जाए, तो भारत की उभरती सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री यहां के लिए बहुत बड़ा कारोबार बन जाएगी। लेकिन ज्यादा नफीस किस्म के सेमीकंडक्टर हमारे यहां अगले कई वर्षों तक बाहर से इलेक्ट्रॉनिक सामानों में लगे-लगाए ही आएंगे, लिहाजा बाहर के बाजारों में दखल बनाना शुरू से ही इस उद्योग की रणनीति होनी चाहिए।

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