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आईआईटी की जड़ें खोदने की नीति

संदीपन देब, वरिष्ठ पत्रकार यह वाकई हैरत में डालने वाली बात है। देश की यह पहली ऐसी सरकार है, जिसमें आईआईटी से निकले तीन-तीन मंत्री हैं और फिर भी इस शिक्षण संस्थान में दाखिले की प्रक्रिया को लेकर इतना बड़ा बवाल मचा हुआ है।…

आईआईटी की जड़ें खोदने की नीति

संदीपन देब,वरिष्ठ पत्रकार यह वाकई हैरत में डालने वाली बात है। देश की यह पहली ऐसी सरकार है, जिसमें आईआईटी से निकले तीन-तीन मंत्री हैं और फिर भी इस शिक्षण संस्थान में दाखिले की प्रक्रिया को लेकर इतना बड़ा बवाल मचा हुआ है। जयराम रमेश, अजित सिंह और नंदन नीलेकणी (जिन्हें केंद्रीय मंत्री का दर्जा हासिल है), तीनों आईआईटी से निकले हैं। दरअसल, यह मामला भी यूपीए-दो सरकार की असाध्य-सी दिखती बीमारी का ही एक लक्षण है- इस सरकार का हर सदस्य अपनी मनमानी कर रहा है और केंद्रीय नेतृत्व इतना कमजोर है कि वह दखल दे पाने की स्थिति में नहीं है। इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ने ‘एक देश, एक प्रवेश परीक्षा’ के प्रस्ताव की घोषणा करने से पहले कैबिनेट के अपने उन साथियों को भी इस बारे में सूचित किया हो, जिनके पास आईआईटी से संबंधित निजी अनुभव हैं। (वैसे मेरी राय में एक प्रवेश परीक्षा का यह प्रस्ताव हाल के वर्षो में भारतीय शिक्षा-क्षेत्र का सबसे बड़ा फरेब है। यह सिर्फ दो प्रवेश परीक्षाओं को एक करता है, जबकि शेष सभी को यूं ही छोड़ देता है।) बहरहाल, तमाम आईआईटी से संबंधित शीर्ष निकाय आईआईटी कौंसिल और आईआईटी प्रबंधनों के बीच इंजीनियरिंग में दाखिले की कार्य-प्रणाली को लेकर सहमति बन गई है। मैंने पहले भी लिखा था कि कपिल सिब्बल के प्रस्ताव का जो सबसे खतरनाक पहलू है, वह है उसका बोर्ड संबंधी नजरिया। मैंने लिखा था कि आईआईटी में दाखिला देते वक्त बारहवीं कक्षा के अंकों को जो महत्व दिया गया है, वह तो आईआईटी की ‘निष्पक्षता’ के ब्रांड को ही ध्वस्त कर देगा। बहरहाल, अब फैसला यह हुआ है कि बोर्ड के अंकों को महत्व नहीं दिया जाएगा, मगर अलग-अलग बोर्डो के शीर्ष बीस प्रतिशत विद्यार्थी ही यानी अपने-अपने बोर्ड में शीर्ष बीस प्रतिशत के दायरे में आने वाले बच्चा ही आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में बैठने के योग्य होंगे। इस व्यवस्था ने कई सवाल खड़े किए हैं और आईआईटी कौंसिल के पास इनमें से किसी का भी ईमानदार जवाब नहीं हो सकता है। मैं यहां चंद बिंदुओं को ही रख रहा हूं। चार जुलाई के हिन्दुस्तान टाइम्स के अंक में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस से संबंधित एक रिपोर्ट छपी थी। उसमें ‘किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना’ (केवीपीवाई) के तहत होने वाली राष्ट्रीय प्रवेश परीक्षा में देश के 29 बोर्डो के विद्यार्थियों के पिछले दस वर्षो के प्रदर्शन का उल्लेख किया गया था। गौरतलब है कि यह प्रवेश परीक्षा बारहवीं कक्षा स्तर के देश भर के सर्वश्रेष्ठ विज्ञान छात्रों को चुनती है। उस रिपोर्ट के मुताबिक, सीबीएससी, आईसीएसई, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश बोर्ड के छात्रों का औसत प्राप्तांक देश के अन्य बोर्डो के परीक्षार्थियों से काफी अधिक थे। मतलब साफ है। ऐसा हो सकता है कि जो छात्र शीर्ष 20 प्रतिशत में नहीं आते, भले ही इस दायरे में आए विद्यार्थियों से वे अधिक प्रतिभाशाली क्यों न हों, वे आईआईटी में नहीं जा सकते। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी ऐंड डेवलपमेंट स्टडीज के साल 2010 के आंकड़े के अनुसार, 29,000 बच्चे आईसीएसई (विज्ञान संकाय) की परीक्षा में बैठे, जबकि उत्तर प्रदेश बोर्ड में छह लाख छात्र-छात्रएं विज्ञान की परीक्षा में शामिल हुए। ऐसे में, आईसीएसई बोर्ड के सिर्फ 5,800 बच्चे ही आईआईटी के योग्य होंगे, जबकि उत्तर प्रदेश बोर्ड के एक लाख बीस हजार! और यह स्थिति तब है, जब इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस की प्रवेश परीक्षा के परिणाम यह बता रहे हैं कि आईसीएसई के बच्चे विज्ञान विषयों में उत्तर प्रदेश बोर्ड के बच्चों से कहीं अधिक बेहतर हैं। यानी यदि आप सर्वश्रेष्ठ बोर्ड से हैं, तो आपके लिए आईआईटी में दाखिल होने का दरवाजा कहीं ज्यादा संकरा है। साफ है, यह ‘पर्सेटाइल’ कोटा हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण है।
आईआईटी, गुवाहाटी के निदेशक प्रोफेसर गौतम बरुआ ने इस कोटा प्रणाली को यह कहते हुए जायज ठहराने की कोशिश की कि सीबसीएसई (विज्ञान) को कई राज्य बोर्डो के मुकाबले कहीं बेहतर आर्थिक संसाधान मिलते हैं, इसलिए नए फार्मूले से सामाजिक समावेशीकरण को गति मिलेगी। यह शर्मनाक तर्क है। आईआईटी, कानपुर के प्रोफेसर धीरज सांघी ने इसका उचित प्रतिवाद करते हुए कहा कि ‘नई व्यवस्था लोगों को इस बात के लिए मजबूर करेगी कि वे अपने बच्चों को बारहवीं में अच्छे अंक लाने के लिए अतिरिक्त कोचिंग दिलवाएं। जाहिर-सी बात है कि इससे वे लोग और अलग-थलग पड़ जाएंगे, जो ग्रामीण इलाकों में हैं या फिर आर्थिक रूप से कमजोर हैं। उनकी पहुंच में कोचिंग सेंटर नहीं होंगे। यानी आप शहरों में बसने वाले मध्य और धनाढ्य वर्ग के लोगों के लिए रास्ता आसान कर रहे हैं कि वे न सिर्फ अपने बच्चों को अच्छी कोचिंग सुविधाएं मुहैया कराएं, बल्कि किसी राज्य बोर्ड में उन्हें दाखिला दिलाकर अपेक्षित पर्सेटाइल में पहुंचाने की कोशिश करें। साफ है, यह सामाजिक समावेशीकरण तो नहीं ही है।’ एक सवाल यह भी है कि क्या देश भर के सभी बोर्ड जून के मध्य तक अपने परिणाम घोषित कर सकेंगे, जब इंजीनियरिंग में दाखिले की प्रवेश परीक्षा होगी? फिर यह भी पूछा जाना चाहिए कि आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में ही बोर्ड के अंकों को लेकर यह सनक क्यों? मेडिकल, लॉ और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में क्यों नहीं? और फिर यूपीएससी की परीक्षाओं में भी अंकों को लेकर यह आग्रह क्यों नहीं? मेरा मानना है कि यूपीएसी की प्रवेश परीक्षाएं भी कोचिंग की कारोबारी प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही हैं। और सरकार को इसी बात से तो आपत्ति है। क्यों, क्या यही बात नहीं है? इन सबका का सबसे अनैतिक (मैं जान-बूझकर इस शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूं) पहलू यह कदम है कि अगले साल से यानी 2013 से ही ये सभी बदलाव लागू हो जाएंगे। यह जानते हुए कि इस अवधि में सभी बोर्ड या पक्ष इस बदलाव के अनुरूप खुद को बदल पाने में सक्षम नहीं हैं। लेकिन चूंकि 2014 में आम चुनाव होने वाले हैं, और चुनाव आयोग इन नाटकीय उपायों पर अपनी आपत्ति दर्ज कर सकता है, इसलिए 2013 में इन्हें लागू करना ही पड़ेगा। लेकिन क्या इस इस तरह से हम लाखों बच्चों के भविष्य को जोखिम में नहीं डाल रहे हैं?



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