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असर’ से उपजती चिंताएं

स्वयंसेवी संस्था ‘प्रथम’ हर साल एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट(असर) जारी करती है. पिछले कुछ वर्षों से इस रिपोर्ट ने योजना आयोग का भी ध्यान खींचा है और शिक्षाविदों का भी. ‘असर’ की रिपोर्ट देश की प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्…

असर’ से उपजती चिंताएं
स्वयंसेवी संस्था ‘प्रथम’ हर साल एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट(असर) जारी करती है. पिछले कुछ वर्षों से इस रिपोर्ट ने योजना आयोग का भी ध्यान खींचा है और शिक्षाविदों का भी. ‘असर’ की रिपोर्ट देश की प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता के विषय में सजग करती है. रिपोर्ट न सिर्फ हमें यह बताती है कि देश में कितने बच्चे स्कूल से बाहर हैं, या फिर लड.कियों का नामांकन लड.कों की तुलना में कितना बढ.ा-घटा है, बल्कि यह भी बताती है कि सरकारी स्कूलों में पढ.नेवाले बच्चे पढ.ाई-लिखाई की बुनियादी चीजों, मसलन भाषा पढ.ने और गणित की योग्यता में प्रगति कर रहे हैं या नहीं. ‘असर’ के मुताबिक शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद से स्कूली सुविधाओं में इजाफा तो हुआ है, लेकिन इनसे बच्चों की योग्यता बढ.ी हो, ऐसा नहीं लगता. स्कूलों में नामांकन प्रतिशत बढ. गया है, पेयजल और शौचालय की सुविधाएं हो गयी हैं, लेकिन पढ.ाई की हालत यह है कि पांचवीं में पढ.नेवाले आधे से ज्यादा बच्चे भाषा सीखने या गणित की योग्यता के मामले में वहां भी नहीं पहुंच पाये हैं, जहां दूसरी क्लास के बच्चे को पहुंचना होता है. इसी तरह तीसरी में पढ. रहे तीस फीसदी बच्चे ही ऐसे हैं, जो पहली कक्षा की किताबें पढ.-समझ सकते हैं, जबकि 2008 में ऐसे बच्चों की तादाद 50 फीसदी से ज्यादा थी. अगर शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की योग्यता बढ.ने के बजाय घटी है, तो दोष किसे दिया जाये? क्या इस बात को कि इस कानून ने बच्चों को पास-फेल करने की पद्धति को नकार कर सालाना परीक्षाओं को गैर-जरूरी बना दिया? नहीं, शिक्षा का अधिकार कानून क्रांतिकारी कहा जायेगा, क्योंकि उसमें पहली बार स्वीकार किया गया कि पास-फेल, यानी दंड और पुरस्कार देने की पद्धति पर टिकी शिक्षा व्यवस्था बच्चों के मानस में हीनता की ग्रंथियां तैयार करती हैं. कानून का जोर पढ.ाई की तोतारटंत पद्धति को बदल कर उसे ऐसा बनाने पर था, जिसमें बच्चे के भीतर सर्जनात्मक और जिज्ञासु व्यक्तित्व का विकास हो. अगर ऐसा नहीं हो रहा, तो दोष कानून में देखने की जगह उसके अमल में खोजना चाहिए. स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी, शिक्षकों से लिये जा रहे शिक्षणेत्तर काम, उनका पर्याप्त प्रशिक्षित न होना और उन्हें औने-पौने मानदेय पर रखना जैसी कई बातें देश में प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट के लिए जिम्मेवार हैं. शिक्षकों की अवमानना पर टिकी शिक्षा-व्यवस्था से अच्छे परिणाम की उम्मीद करना बालू से तेल निकालने जैसा है- ‘असर’ की रिपोर्ट के बाद इस दिशा में भी सोचा जाना चाहिए.
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