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अनूठे चंद्र मिशन की तैयारी में चीन

शशांक द्विवेदी डिप्टी डायरेक्टर , मेवाड़ यूनिवर्सिटी, राजस्थान चंद्रमा की दूसरी ओर यान उतारने वाला पहला देश होगा चीन हाल में ही चीन ने अपने महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष कार्यक्रम के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि वह वर्ष 2018…

अनूठे चंद्र मिशन की तैयारी में चीन
शशांक द्विवेदी डिप्टी डायरेक्टर, मेवाड़ यूनिवर्सिटी, राजस्थान चंद्रमा की दूसरी ओर यान उतारने वाला पहला देश होगा चीन हाल में ही चीन ने अपने महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष कार्यक्रम के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि वह वर्ष 2018 में चंद्रमा की दूसरी ओर की थाह लेने के लिए यान भेजेगा और वहां यान को सुगमता से उतारने वाला वह दुनिया का पहला देश बन जाएगा। 'चीन स्पेस एक्टिविटीज इन 2016' शीर्षक से जारी किए गए श्वेत पत्र में कहा गया है कि अगले पांच वर्षों में चीन अपनी चंद्र अन्वेषण परियोजना को जारी रखेगा। इससे पहले चीन चंद्रमा पर रोवर उतार चुका है लेकिन अब चंद्रमा की दूसरी ओर की थाह लेना चाहता है, जहां अभी तक कोई भी अन्य देश नहीं पहुंच सका है। श्वेत पत्र के मुताबिक इस अन्वेषण योजना में तीन रणनीतिक कदम उठाने हैं, वह हैं 'कक्षा में स्थापित करना, सतह पर उतारना और लौटना।' चेंज-5 चंद्र अन्वेषण वर्ष 2017 के अंत तक शुरू होगी। आखिर क्या है चांद की दूसरी तरफ? यह अभी तक एक अनसुलझा रहस्य है कि चाँद के दुसरी तरफ क्या है ? कुछ हॉलीवुड फिल्मों में दिखाया गया है कि चांद के अंधेरे हिस्से में परग्रही रहते हैं। कुछ का मानना है कि यहां नाजियों का सीक्रेट आर्मी बेस है। लेकिन सच तो यह है कि पृथ्वी से चंद्रमा की दूसरी तरफ का महज 18 प्रतिशत हिस्सा दिखाई देता है। वहां क्या है, कैसा वातावरण है, यह अभी तक रहस्य है, इसके बारे में वैज्ञानिक ज्यादा नहीं जानते। इसलिए इसे चंद्रमा का अंधेरा हिस्सा भी कहते हैं। चांद का एक ही हिस्सा क्यों दिखता है? इसे समझने के लिए हम एक ऐसे बच्चे का उदाहरण लेते हैं, जिसने एक रस्सी से पत्थर बांध रखा है और वह गोल घूम रहा है। उसके साथ पत्थर भी घूमता है, लेकिन पत्थर का वही हिस्सा उसके सामने रहता है जो रस्सी से बंधा है। धरती के ग्रैविटेशन फोर्स के कारण चंद्रमा की बंधे रहने जैसी स्थिति होती है ठीक रस्सी से बंधे पत्थर जैसी। लिहाजा, धरती से चंद्रमा का एक ही हिस्सा दिखाई देता है।
चंद्रमा पर अभियान
चंद्रमा पर सबसे पहले 13 सितंबर, 1959 को सोवियत संघ का अंतरिक्ष यान लूना 2 उतरा। उसके बाद अमेरिका के अपोलो 11 के यात्री 20 जुलाई 1969 को सबसे पहले चंद्रमा पर उतरे। 1969 से 1972 तक अमेरिका ने छह बार मानव को चंद्रमा पर उतारा। अभी तक अमेरिका अकेला देश है जिसने चंद्रमा पर मनुष्य को उतारा। दिसंबर 1972 में उसने ये अभियान बंद कर दिया। भारत का चंद्रयान
भारत की स्पेस एजेंसी इसरो ने 14 नवंबर 2008 को मून इम्पैक्ट प्रोब को चंद्रमा पर उतारा। यह चंद्रयान-1 से चंद्रमा पर छोड़ा गया था। चीन ने चांग ई-1 को एक मार्च 2009 को चंद्रमा पर उतारा। चांग ई-3 एक दिसंबर 2013 को भेजा गया और 14 दिसंबर 2013 को चंद्रमा पर उतरा। अंतरिक्ष में चीन की बढ़त चीन 2030 तक अंतरिक्ष में सबसे शक्तिशाली देश बनना चाहता है। बीजिंग ने अगले चार साल में मंगल ग्रह को छूने का भी एलान किया है। चीन अगले एक दशक में अंतरिक्ष रिसर्च के क्षेत्र में सबसे आगे निकलना चाहता है। पिछले दिनों चीन के नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन के उपप्रमुख वु यानहुआ ने बीजिंग में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी जानकारी दी थी । वु के मुताबिक 2020 में मंगल पर पहली खोजी मशीन भेजी जाएगी। यह मशीन मंगल का चक्कर काटेगी और आंकड़े जुटाएगी। इसके बाद मंगल की सतह के नमूने लेने के लिए एक और मशीन लाल ग्रह पर भेजी जाएगी। मंगल के अलावा गुरु और उसके चंद्रमा के लिए भी खोजी मिशन भेजा जाएगा। वु ने कहा, "कुल मिलाकर हमारा लक्ष्य है कि 2030 तक चीन दुनिया की बहुत बड़ी अंतरिक्ष शक्ति बन जाए।" चीन ने अंतरिक्ष अभियान देर से शुरू किये थे ,1970 के दशक तक उसने कोई सैटेलाइट नहीं भेजी. जबकि इसी दौरान अमेरिका, रूस और भारत भी अतंरिक्ष अभियान में आगे बढ़ते गए लेकिन बीते तीन दशकों में चीन ने अंतरिक्ष अभियान में अरबों डॉलर झोंके हैं। बीजिंग ने रिसर्च और ट्रेनिंग पर भी खासा ध्यान दिया है यही वजह है कि 2003 में चीन ने चंद्रमा पर अपना रोवर भेज दिया और वहां अपनी लैब बना दी। चीन अब 20 टन भारी अंतरिक्ष स्टेशन भी बनाना चाह रहा है। अमेरिका और रूस के बाद चीन तीसरा ऐसा देश बन चुका है जिसने पांच लोगों को अंतरिक्ष में भेजा है।
सच्चाई यह है कि चीन अंतरिक्ष में अपनी ताकत बढ़ाना चाहता है। वह 2017 में पहला अंतरिक्ष कार्गो शिप थियानचोऊ अंतरिक्ष प्रयोगशाला के पास भेजना चाहता है। इससे प्रयोगशाला को ईंधन और अन्य सामान आपूर्ति की जा सकेगी। अंतरिक्ष कार्यक्रमों के मामले में चीन, भारत से आगे है,उसका बजट भी हमसे बड़ा है। चीन का अंतरिक्ष कार्यक्रम एक ओर युद्ध-तकनीक से जुड़ा है, वहीं वह असैनिक तकनीक का विकास भी कर रहा है। भारत के मुकाबले चीन के पास ज्यादा भार ले जानेवाले रॉकेट हैं और उसका अपना स्पेस स्टेशन तैयार हो रहा है। वह अंतरिक्ष में मानव-युक्त उड़ान संचालित कर चुका है और जल्दी ही चंद्रमा की सतह पर भी अपना यात्री उतार देगा। अंतरिक्ष में उपग्रहों को नष्ट करने की तकनीक का परीक्षण कर उसने सैनिक इस्तेमाल में महारत भी हासिल कर ली है।
चीन का अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर भारी खर्च चीन अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर अरबों डॉलर खर्च कर रहा है ,साथ ही चीन दूसरे देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों के साथ मिलकर काम करने की इच्छा भी बार बार जता चुका है लेकिन अमेरिकी संसद ने 2011 से अपनी अंतरिक्ष एजेंसी नासा को चीन के साथ काम करने से रोक रखा है। अमेरिका इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानता है। लेकिन बीते सालों में नासा को भी बड़े पैमाने पर बजट कटौती का सामना करना पड़ा है। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अंतरिक्ष अभियानों में तेजी लाने के संकेत दिये हैं अंतरिक्ष विशेषज्ञ रॉबर्ट वॉकर और पीटर नैवारो के मुताबिक, "कम निवेश से अमेरिकी सरकार के अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर असर पड़ा है, वहीं चीन और रूस सैन्य रणनीति को ध्यान में रखते हुए बहुत तेजी से आगे निकलते जा रहे हैं" दोनों अंतरिक्ष में अमेरिका के दबदबे को खत्म करना चाह रहे हैं। पिछले दिनों चीनी राष्ट्रपति ने कहा कि अंतरिक्ष कार्यक्रम को देश की राष्ट्रीय सुरक्षा में मददगार होना चाहिए। देश को अंतरिक्ष शक्ति बनाने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि चीन नागरिक इरादों के लिए एंटी सैटेलाइट मिसाइलों का परीक्षण कर चुका है। वहीं चीनी अंतरिक्ष एजेंसी के उपप्रमुख वु यानहुआ ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को शांतिपूर्ण बता रहें है लेकिन माना जा रहा है कि ट्रंप के सत्ता में आने के बाद चीन और अमेरिका तीखी होड़ छिड़ेगी और इसका असर अंतरिक्ष से लेकर समंदर तक हर जगह नजर आएगा।
कुलमिलाकर अमेरिका चांद पर इंसान को उतारने वाला अकेला देश भले ही हो, चीन ने भी इस मामले में अमेरिका को टक्कर देने की तैयारी में कमर कस ली है। चीन की अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा है कि वे चांद पर 2018 तक अपने देश का झंडा लगाने की तैयारी कर चुका है। यही नहीं चीन ने इस परियोजना में अमेरिका को भी पीछे छोड़ने की तैयारी कर ली है।
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