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ख़तरनाक है बच्चों में बढ़ता मोटापा

डॉ. शशांक द्विवेदी पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने आकाशवाणी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में देश में बढ़ते मोटापे पर चिंता जताते हुए देशवासियों से खाने के तेल की खपत में 10 प्रतिशत की कटौती करने का आह्वान किया । विश्व स्वास्…

ख़तरनाक है बच्चों में बढ़ता मोटापा

डॉ. शशांक द्विवेदी

पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने आकाशवाणी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में देश में बढ़ते मोटापे पर चिंता जताते हुए देशवासियों से खाने के तेल की खपत में 10 प्रतिशत की कटौती करने का आह्वान किया । विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़ों का हवाला देते हुए पीएम ने कहा कि वर्ष 2022 में दुनिया-भर में करीब 250 करोड़ लोगों का वजन आवश्यकता से भी कहीं ज्यादा था। उन्होंने एक शोध का हवाला देते हुए कहा कि आज हर आठ में से एक व्यक्ति मोटापे की समस्या से परेशान है और बीते कुछ वर्षों में ऐसे मामले दोगुने हो गए हैं। उन्होंने कहा, इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि बच्चों में भी मोटापे की समस्या चार गुना बढ़ गई है। उन्होंने कहा, ‘‘ये आंकड़े बेहद गंभीर हैं और हम सभी को सोचने पर मजबूर करते हैं कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?'' प्रधानमंत्री ने कहा कि अधिक वजन या मोटापा कई तरह की परेशानियों को, बीमारियों को भी जन्म देता है लेकिन सब मिलकर छोटे-छोटे प्रयासों से इस चुनौती से निपट सकते हैं।

यह बात सर्वविदित है कि मोटापा हमारी सेहत के लिए बहुत ख़तरनाक है। मोटापा हमको किसी भी उम्र में अपनी चपेट में ले सकता है। लेकिन अब बड़ो के साथ साथ मोटापा बड़े पैमाने पर बच्चों को भी अपनी चपेट में ले रहा है। वर्तमान समय में बदल रही जीवलशैली के चलते पिछले कुछ वर्षों में बच्चों में मोटापे की शिकायत बढ़ी है और बच्चों में बढ़ता मोटापा एक गंभीर समस्या के रूप में सामने आ रहा है। भारत में 10 से 12 प्रतिशत बच्चे मोटापे के शिकार हैं। एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2030 तक देश के लगभग आधे बच्चे इस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं। हाल में किए गए सर्वे के अनुसार पिछले 50 सालों में भारतीय बच्चों में तेल पदार्थों का सेवन 20 प्रतिशत बढ़ा है। कैंडी, चॉकलेट, पिज़्ज़ा, फ्रेंच फ्राइज़ और स्वीट्स खानेवाले बच्चों में 11 से 20 वर्ष के बच्चों की संख्या लगभग 80 प्रतिशत बताई जा रही है। देश में लगभग 1.44 करोड़ बच्चे अधिक वजन वाले हैं। अधिक वजनी मोटे बच्चों के मामले में चीन के बाद दुनिया में भारत का दूसरा नंबर है।

इंडियनमेडिकलएसोसिएशनकाकहनाहैकिआजकलबच्चोंमेंमोटापेकीवृद्धिदरवयस्कोंकीतुलनामेंबहुतअधिकहै।बॉडी मास इंडेक्स या बीएमआई को मापकर बचपन में मोटापे की पहचान की जा सकती है। 85 प्रतिशत से 95 प्रतिशत तक बीएमआई वाले बच्चे मोटापे से ग्रस्त माने जाते हैं। ओवरवेट और मोटापे से ग्रस्त बच्चे अपेक्षाकृत कम उम्र में गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) जैसे डायबिटीज और हार्ट डिसीज की चपेट में आ सकते हैं।

कामकाज़ीमाता-पिता

आज के सामय में अगर माता-पिता दोनों ही कामकाज़ी हों तो जाहिर है कि उनके पास बच्चे के लिए समय थोड़ा कम ही रहेगा ,ऐसे में स्नैक्स तैयार करना हो या हल्के भूख का इंतजाम करना हो, अधिकांश लोग झटपट तैयार होने वाला भोजन ही चुनते हैं । ये जानते हुए भी कि 2 मिनट में तैयार होने वाली सामग्री सेहतमंद नहीं है हम बच्चों के ज़िद्द के आगे झुक ही जाते हैं । चूंकि स्कूल एवं ऐक्स्ट्रा एक्टिविटी क्लासेज के कारण अब बच्चों के पास भी वक्त नहीं होता कि वो उछल-कूद कर सकें । स्मार्ट टीवी, मोबाईल एवं विडियो गेम के ज़माने में आउटडोर गेम्स में बच्चे की भागीदारी भी कम हो रही है यही कारण है कि अब बच्चों में शिथिलता बढ़ती जा रही है जिसके कारण छोटी उम्र के बच्चों की सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है ।

विशेषज्ञों के अनुसार जंक फूड एवं पैक्ड फूड में नमक, फैट एवं कोलेस्ट्रॉल अधिक होता है। उम्र के हिसाब से अधिक मात्रा में कैलोरी शरीर में पहुंचती है, जो धमनियों में जमने लगती है। इसकी वजह से हार्ट और ब्रेन का रक्त संचार प्रभावित होता है। इससे हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। मोटापे से ग्रस्त बच्चों और किशोरों में स्लीप एप्निया जैसे रोग और सामाजिक व मनोवैज्ञानिक समस्याएं अधिक हो सकती हैं, जिससे उन्हें आत्मसम्मान की कमी जैसी समस्याओं से दो चार होना पड़ सकता है। वहीं हाइपरटेंशन, हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, कोलेस्ट्रॉल, डायबिटीज, कब्ज का खतरा बना रहता है।

भारतीयखाद्यसंरक्षाएवंमानकप्राधिकरणहुआगंभीर

पिछले दिनों बच्चों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने स्कूल हेल्थकेयर पर हुए एसोचैम के सम्मेलन में जंक फूड के विज्ञापनों पर रोक लगाने के प्रस्ताव पर विचार किया है। जंक फूड और सॉफ्ट ड्रिंक का ज्यादा इस्तेमाल बच्चों में मोटापे के अलावा भी कई गंभीर बीमारियों की वजह बन रहा है। खानपान के इस फास्ट फूड कल्चर ने ही छोटे-छोटे बच्चों में डायबिटीज और दिल से जुड़ी गंभीर बीमारियों को बढ़ाया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है यदि खानपान की आदतें ऐसी ही बनी रही तो 2030 तक हर तीन में से एक बच्चा मोटापे का शिकार होगा।

बच्चों के पूरक पोषण को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 को पारित किया गया था। जिसके अनुसार बच्चों के खान-पान पर ध्यान देना अनिवार्य है, बदलते हुए कल्चर के कारण जंक फूड जैसे पिज्जा बर्गर, चिप्स, मीठा कार्बोनेटेड और गैर-कार्बोनेटेड पेय, रेडी-टू-ईट नूडल्स बाजार से लेकर स्कूल के आसपास के क्षेत्र में भी फैलता जा रहा है। भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के अनुसार स्कूल के 50 मीटर के दायरे में गैर स्वास्थकारी खाद्य पदार्थो के विज्ञापनों और प्रचार पर तत्काल रोक लगनी चाहिए। । इस मसौदे को लाने के दौरान, एफएसएसएआई ने कहा था कि उसका उद्देश्य चिप्स, मीठा कार्बोनेटेड और गैर-कार्बोनेटेड पेय, रेडी-टू-ईट नूडल्स, पिज्जा, बर्गर जैसे अधिकांश आम जंक फूड की खपत और उपलब्धता को सीमित करना है। लेकिन बच्चों को स्वस्थ आहार लेने की प्रेरणा के लिए समाज के स्तर पर भी जागरूकता की बड़ी जरुरत है ।

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