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लुप्त होती भाषाओं को बचाने की ‘गूगल’ कवायद

मानवता की सबसे बड़ी खोज संभवत: भाषा है, लेकिन बड़ी परेशानी यही है कि आज वे भाषाएं नहीं बोली जाती, जो एक जमाने में बोली जाती थीं. निश्‍चित तौर पर भाषाओं का अपना ऐतिहासिक-सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है. लेकिन आज हजारों भाष…

लुप्त होती भाषाओं को बचाने की ‘गूगल’ कवायद

मानवता की सबसे बड़ी खोज संभवत: भाषा है, लेकिन बड़ी परेशानी यही है कि आज वे भाषाएं नहीं बोली जाती, जो एक जमाने में बोली जाती थीं. निश्‍चित तौर पर भाषाओं का अपना ऐतिहासिक-सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है. लेकिन आज हजारों भाषाएं अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं. इंटरनेट की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में एक गूगल ने मरती भाषाओं को बचाने की कोशिश के तहत 21 जून को इनडेंर्जडलैंग्वेजेसडॉटकॉम नाम की साइट शुरु की है. गूगल के इस प्रोजेक्ट को कई संस्थाओं ने सराहा है. लेकिन सवाल यही है कि क्या गूगल के नेतृत्व में आरंभ हुई यह परियोजना खत्म होती भाषाओं को नया जीवन दे पायेगी? इससे जु.डे विभित्र पहलुओं पर विशेष प्रस्तुति आपने ‘कोरो’ के बारे में सुना है? भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों के पहाड़ों में बोली जाने वाली इस भाषा को अब बमुश्किल एक से चार हजार लोग बोलते हैं. ‘पोइटेविन’ भाषा को फ्रांस के मध्य भाग में रहने वाले चंद ब.डे बुजुर्ग ही बोलते हैं. ‘शोर’ भाषा को बोलने वाले रूस में दस हजार से भी कम लोग बचे हैं, जबकि आस्ट्रेलिया की ‘पुतिजारा’ भाषा को बोलने वाले तो सिर्फ चार लोग ही शेष हैं. अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही ऐसी भाषाओं की संख्या हजारों में है. यूनेस्को के मुताबिक दुनिया भर में 2473 भाषाएं मरने की कगार पर हैं, लेकिन गूगल की कोशिश से आरंभ हुई वेबसाइट इनडेंर्जडलैंग्वेजेसडॉटकॉम पर 3054 भाषाओं का जिक्र है. इस साइट के मुताबिक दुनिया की करीब आधी भाषाओं का अस्तित्व संकट में है और अभी बोली जाने वाली 7000 भाषाओं में 3500 मर रही हैं.

इनडेंर्जड लैंग्वेज प्रोजेक्ट

इंटरनेट की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में एक गूगल ने मरती भाषाओं को बचाने की कोशिश के तहत 21 जून को इनडेंर्जडलैंग्वेजेसडॉटकॉम नाम की साइट शुरू की है. अस्तित्व के संकट से जूझती भाषाओं को बचाने के गूगल के अभिनव प्रोजेक्ट को 29 संस्थाओं का सर्मथन है. इस प्रोजेक्ट को आरंभ करने के बाद इसकी तमाम गतिविधियों पर गूगल नजर रखेगा. लेकिन जल्द ही पूरा प्रोजेक्ट फस्र्ट पीपुल्स कल्चरल काउंसिल, द इंस्टीट्यूट ऑफ लैंग्वेज इंफॉर्मेशन एंड टेक्नोलॉजी और इस्टर्न मिशिगन यूनिवर्सिटी की देखरेख में संचालित होगा. इनडेंर्जडलैंग्वेजेसडॉटकॉम पर उन सभी 3054 भाषाओं का संक्षिप्त उल्लेख है, जिन्हें बचाने की कवायद शुरू की गयी है.

कार्यप्रणाली

इस कार्यक्रम के तहत मृतप्राय भाषाओं को चार श्रेणियों में रखा गया है. जोखिम में, खतरे में, भयंकर खतरे में और पूरी तरह अनजान. गूगल का मानना है कि लुप्त होती भाषाओं को तकनीक की मदद से बचाया जा सकता है, लिहाजा वेबसाइट पर सुविधा दी गयी है कि लोग मर रही भाषाओं-बोलियों के बारे में जानकारी पाने के अलावा उनसे जुड़ी पांडुलिपियां, ऑडियो-वीडियो फाइल आदि शेयर कर सकते हैं अथवा जमा कर सकते हैं. लोगों से अपील की गयी है कि वे ऐसी भाषाओं से संबंधित कोई भी जानकारी यहां बांटें. इस साइट के माध्यम से लुप्त होती भाषाओं का संरक्षण, प्रचार और सिखाने की भरसक कोशिश है. हालांकि, उन भाषाओं की पूरी सूची साइट पर है, जो खतरे में हैं, लेकिन इनमें से कई भाषाओं से जुड़ा कोई ऑडियो-वीडियो और यहां तक कि पाठ्य भी उपलब्ध नहीं है. गूगल ने उपयोगकर्ताओं से आग्रह किया है कि वे इन भाषाओं के नमूने उपलब्ध कराने में मदद करें.

शुरुआत

दुनिया के कई मुल्कों में अपने यहां बोली जाने वाली भाषाओं को बचाने की कवायद चल रही है. लेकिन गूगल का यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट इन कोशिशों को नया रंग दे सकता है. पर गूगल इस प्रोजेक्ट से जुड़ा कैसे? इंटरनेट कंपनी गूगल ने एक उदाहरण इस बाबत भी दिया है. साइट के मुताबिक ‘मियामी इलिनोइस’ भाषा 1960 के आसपास खत्म हो गयी थी. अमेरिका में इलिनोइस और मियामी के बीच रहने वाले लोग इस बोली को बोलते थे. चंद साल पहले ओकलाहोमा की मियामी जनजाति से संबंध रखने वाले डेरिल बैल्डविन ने खुद यह भाषा सीखनी शुरु की. उन्होंने तमाम पुरानी पांडुलिपियों को इसका आधार बनाया.

करत करत अभ्यास बैल्डविन इस भाषा में पारंगत होते गये और आज वह ओहायो की मियामी यूनिवर्सिटी में इस भाषा को जीवित करने में जुटे हैं. इस भाषा में उनकी कई कहानियां और ऑडियो-वीडियो प्रकाशित-प्रसारित हो चुके हैं और मियामी के बच्चे एक बार फिर मियामी इलिनोइस भाषा सीख रहे हैं. इस तरह के कुछ उदाहरणों ने गूगल को इनडेंर्जडलैंग्वेजेस प्रोजेक्ट आरंभ करने की प्रेरणा दी.

सफलता

जानकारों के मुताबिक गूगल के इस प्रोजेक्ट की सफलता आम लोगों पर निर्भर है. उपयोगकर्ताओं द्वारा निर्मित सामग्री यदि लगातार मिलती है, तो मरती भाषाओं से संकट टल सकता है. वैसे, परियोजना के प्रबंधकों क्लारा रिवेरा रोड्रिगुएज और जेसन रिसमैन ने गूगल ब्लॉग पोस्ट पर लिखा है कि बहुत सारे लोगों ने वेबसाइट के माध्यम से सामग्रियों को साझा करना शुरू कर दिया है. लोगों ने 18वीं सदी की पांडुलिपि से लेकर आधुनिक तकनीकों जैसे वीडियो और ऑडियो के माध्यम से भी अपनी जानकारी साझा की है. आस्ट्रेलिया के एक युवक ने तो अपनी मृतप्राय भाषा में कई रॉक गीत पेश किये हैं. यह गाने काफी लोकप्रिय हो रहे हैं और इन गानों की वजह से उस भाषा से जु.डे रहे परिवारों के नव युवकों में भाषा सीखने की ललक पैदा हो रही है.

चुनौतियां

मानवता की सबसे बड़ी खोज संभवत: भाषा है, लेकिन बड़ी परेशानी यही है कि आज वे भाषाएं नहीं बोली जाती, जो एक जमाने में बोली जाती थीं. विद्वानों को वह भाषा सीखने में बहुत दिक्कत का सामना करना पड़ता है, जिसकी विरासत का कोई वास्तविक रखवाला ही नहीं है. इनडेंर्जडलैंग्वेजेसडॉटकॉम के मुताबिक, प्रत्येक लुप्त होती भाषा के साथ मानवता अपने विशाल सांस्कृतिक विरासत को खोने का खतरा झेल रही है. भाषा के मरने के साथ इस बात की समझ भी लुप्त हो जाती है कि उस वक्त मानव आपस में कैसे एक दूसरे से जुड़ता था, संवाद करता था और जिंदगी के रहस्यों को कैसे सुलझाता था. साइंटिफिक अमेरिकन-माइंड में भाषा वैज्ञानिक डा कौरे बिंस ने लिखा है विश्‍व में 7000 भाषाएं हैं, और प्रत्येक माह दो भाषाएं मर रही हंै, और उनके साथ अनेकानेक संततियों से प्राप्त सांस्कृतिक ज्ञान तथा मानव मस्तिष्क का रहस्यमय शब्द प्रेम भी सदा के लिये लुप्त हो रहा है. लिविंग टंग्ज इंस्टिट्यूट फॉर इनडेंर्जड लैंग्वेजेज इन सैलम, ओरेगान के भाषा वैज्ञानिक डेविड हैरिसन तथा ग्रैग एंडरसन कहते हैं कि जब लोग अपने समाज की भाषा में बात करना बंद कर देते हैं, तब हमें मस्तिष्क की विभित्र विधियों में कार्य कर सकने की अद्वितीय अंतर्दृष्टियों को भी खोना पड़ता है. वह कहते हैं कि लोगों को अपनी भाषा में बात करते हुए उन्हें वास्तव में अपने इतिहास से पुन: संपर्क करते देखने में जो संतोष होता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता.

निश्‍चित तौर पर भाषाओं का अपना ऐतिहासिक-सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है. लेकिन भाषाएं भी बाजार से प्रभावित होती हैं और यही वजह है कि दुनिया में चंद भाषाओं का अधिपत्य है. ऐसे में इनडेंर्जडलैंग्वेज प्रोजेक्ट के सामने बड़ी चुनौती उन भाषाओं को बचाने की है, जिन्हें बेहद कम लोग जानते-समझते हैं और जो रोजगार या व्यापार की भाषा नहीं है. आखिर ‘कोरो’ के मरने से भले एक सांस्कृतिक विरासत खत्म हो जाए पर बाजार को कोई फर्क नहीं प.डेगा.

सवाल यही है कि क्या गूगल के नेतृत्व में आरंभ हुई यह परियोजना खत्म होती भाषाओं को नया जीवन दे पायेगी? इस प्रोजेक्ट के लिए फिलहाल फंड का संकट नहीं है, लेकिन बिना आम लोगों के जु.डे इस प्रोजेक्ट की सफलता संदिग्ध है. सवाल यह भी है कि जिन मृतप्राय भाषाओं को बचाने की कवायद हो रही है, उन भाषाओं को जानने वाले इस प्रोजेक्ट से कैसे और कब जुड़ते हैं.

दरअसल, गूगल का यह महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट सफल हुआ तो दुनिया की अद्भुत सांस्कृतिक विरासत को बचाने में उल्लेखनीय भूमिका निभा सकता है. इसमें कोई शक नहीं कि गूगल के पास फंड की कमी नहीं है, और आधुनिक तकनीक का भी कोई संकट नहीं है. सच कहा जाये तो तकनीक के भरोसे ही गूगल इस लड़ाई को जीतना चाहता है. लेकिन, एक सवाल नीयत का भी है और दूसरा वैश्‍विक सहयोग का. फिलहाल, उम्मीद की जानी चाहिए कि गूगल के नेतृत्व में यह प्रोजेक्ट कंपनी की तमाम बड़ी परियोजनाओं की तरह सफल होगा. पीयूष पांडे (लेखक साइबर पत्रकार हैं)

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