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महत्वाकांक्षी मंगल अभियान

हमारा पड़ोसी ग्रह मंगल अनेक अंतरिक्ष अभियानों के बावजूद अब भी कई रहस्यों से घिरा है। कभी यह ग्रह जीवन की संभावनाओं से भरपूर लगता था और अब भी वैज्ञानिकों को पूरा विास है कि भले ही वर्तमान में यहां जीवन न हो लेकिन कभी न कभ…

महत्वाकांक्षी मंगल अभियान

हमारा पड़ोसी ग्रह मंगल अनेक अंतरिक्ष अभियानों के बावजूद अब भी कई रहस्यों से घिरा है। कभी यह ग्रह जीवन की संभावनाओं से भरपूर लगता था और अब भी वैज्ञानिकों को पूरा विास है कि भले ही वर्तमान में यहां जीवन न हो लेकिन कभी न कभी, किसी न किसी रूप में यहां जीवन था। अब तक हुई इस ग्रह की पड़ताल में यह बात लगभग प्रमाणित भी हो चुकी है कि कभी यहां जल और वायुमंडल था। आज मंगल को लेकर तमाम महत्वपूर्ण सवालों में से एक यह है कि आखिर यहां का वायुमंडल किन स्थितियों में नष्ट हुआ होगा! ऐसे ही सवालों का जवाब खोजने लिए जहां अमेरिका ने पिछले साल क्यूरोसिटी नामक मार्स रोवर को सफलतापूर्वक मंगल की सतह पर उतारा, वहीं हमारा देश भी इस ‘लाल ग्रह’ से जुड़े अनेक रहस्यों से पर्दा हटाने के लिए इस सालनवम्बर में मंगल अभियान शुरू करने जा रहा है। इसके लिए ‘इसरो’मानवरहित मंगलयान मंगलग्रह पर भेजने की तैयारी में जोर-शोर से जुटा है। श्रीहरिकोटा से लांच किया जाने वाला देश का पहला ‘मंगलयान’ पीएसएलवी रॉकेट से छोड़ा जाएगा। इस महत्वाकांक्षी अभियान को लेकर जहां देश उत्साहित है, वहीं मंगल की जानकारी जुटाने के लिए भेजे जाने वाले प्रायोगिक उपकरणों (पेलोड) में कमी करने से इस ग्रह की खोज की व्यापकता में किंचित कमी आ सकती है। जितने खोजी उपकरण पहले भेजे जाने थे, उसमें कमी करने का मतलब है, जांच- पड़ताल के दायरे में कमी। पहले यह पेलोड 25 किलोग्राम निर्धारित था, जो अब यह 15 किलोग्राम होगा। पेलोड कम करने की वजह क्या हो सकती है, इसे तो इसरो से जुड़े वैज्ञानिक ही बता सकते हैं लेकिन इसकी एक वजह इस अभियान को जल्दी अंजाम देना भी हो सकता है। दरअसल, पहले इस साल जहां चंद्रयान 1 के बाद चंद्रयान 2 को चांद पर भेजा जाना था, वहीं इसके बदले वैज्ञानिक मंगलयान को मंगल ग्रह भेज रहे हैं। इस जल्दबाजी की वजह यह भी है कि यदि इस साल यह अभियान लांच नहीं किया गया तो वर्ष 2018 में ही इसे अंजाम दिया जा सकेगा। 470 करोड़ रुपये का यह मिशन जहां 299 दिनों की 5.5 से 40 करोड़ किलोमीटर की यात्रा करने वाले अंतरिक्षयान निर्माण की भारतीय क्षमता का परिचायक होगा, वहीं टोही यान में मौजूद पांच उपकरण मंगल के वायुमंडल, उसकी सतह पर दर्ज जल की मौजूदगी के प्रमाण और अन्य जानकारियां जुटाएंगे। इस मिशन से हमारा देश अमेरिका, रूस, यूरोप, चीन और जापान के उस विशिष्ट क्लब में शामिल हो जाएगा जो अब तक मानवरहित मंगल अभियान में कामयाब रहे हैं। फिलहाल, महत्व पेलोड कम करने का नहीं, अभियान के सफल होने का है। देश का गौरव इससे जुड़ा है।
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