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भालू और उसका भोजन

स्कंद शुक्ला सबकें देह परम प्रिय स्वामी ! ( हे स्वामी ! सबको अपनी देह परम प्रिय है। ) --- तुलसीकृत रामचरितमानस का सुन्दरकाण्ड , जहाँ हनुमान् रावण से कह रहे हैं। -----------------------------------------------------------…

भालू और उसका भोजन

स्कंद शुक्ला सबकें देह परम प्रिय स्वामी !
( हे स्वामी ! सबको अपनी देह परम प्रिय है। ) --- तुलसीकृत रामचरितमानस का सुन्दरकाण्ड , जहाँ हनुमान् रावण से कह रहे हैं।
----------------------------------------------------------------------------------- भारतीय उपमहाद्वीप में मिलने वाली तीन भालू-प्रजातियों में प्रमुख स्लॉथ-भालू है और यह कीड़े चाव से खाता है। दीमक-चींटियाँ , उनके अण्डे व लार्वे इस भालू का प्रिय भोजन हैं। कारण कि कीड़े पृथ्वी पर मौजूद उन कुछ भोज्य-पदार्थों में से हैं , जो प्रोटीन का सबसे समृद्ध स्रोत हैं। मांस-दालों से कहीं अधिक।
सो भालू के लिए आसान है अपने लम्बे नाखूनों से दीमक की बाँबियाँ खोदना , उनमें अपनी नाक के ज़ोर से हवा फूँकना कि वे छिन्न-भिन्न हो जाएँ और फिर किसी वैक्यूम-क्लीनर की तर्ज़ पर अपनी लम्बी जीभ व निचले होठ की सहायता से एक झटके में ही दीमकों को मुँह के भीतर खींच लेना। जो प्रोटीन बड़े श्रम के बाद शिकार से मिलता , वह प्रचुरता के साथ इस रीछ को कीड़े खाने से मिल गया।
अचम्भा मुझे इससे अधिक तब हुआ , जब मैंने जाना कि संसार की सात अरब आबादी में से दो अरब कीटभोजी है। हम मनुष्य हैं और हमारा आहार विज्ञान से अधिक संस्कृति तय करती है। जो जहाँ जिस परिवार-समाज-धर्म-जाति-देश में पैदा हो गया है, उसकी रीतियों-मान्यताओं को सही सिद्ध करने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देगा और दूसरे के आहार-व्यवहार में मीनमेख निकालने लगेगा।
बहरहाल। कीड़े संसार-भर के अलग-अलग देशों में शौक़ से खाये जाते हैं। अफ़्रीकी देशों में। सुदूर पूर्व में। दक्षिण-पूर्व एशिया में। और इसके कारण कई हैं , जिनमें स्वाद सबसे महत्त्वपूर्ण नहीं।
पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण कारण खाद्यान्न-संकट है। अकाल और गृहयुद्ध से जूझते तमाम देश मनमरज़ी से खेती पर ध्यान नहीं दे सकते। कृषि संरचनात्मक काम है , जो मानवीय शान्ति और प्राकृतिक सहयोग माँगती है। लेकिन जहाँ यह सम्भव नहीं , वहाँ क्या किया जाए !
जानवरों का मांस भी यों ही नहीं मिल जाता। जानवर यानी पालतू पशु। यानी बड़े चारागाह। अगर चरने के स्थान नहीं , तो पशुपालन नहीं। तो फिर ऐसे में मांस का विकल्प भी सीमित होने लगता है।
कीड़ों में तमाम विकल्प हैं। वे प्रोटीन का पृथ्वी पर समृद्धतम स्रोत हैं , बड़ी तादाद में आसानी से जन्म लेते हैं। नतीजन मानव-भोजन में उनका स्थान बन जाना अकारण नहीं सोचा गया। एफडीए-जैसे संस्थान ऐसे ही नहीं कह रहे कि भविष्य में हमें कीट-उत्पादन पर ज़ोर देना होगा और कीड़े हमारे आहार का महत्त्वपूर्ण अवयव होंगे।
लेकिन कीड़ों को भोजन के रूप में अपनाने में समस्याएँ भी कई हैं। कीटनाशकों के प्रयोग के कारण उनके भीतर भी इन रसायनों की मौजूदगी मनुष्य के लिए चिन्ता का विषय है। पर इसका दूसरा पक्ष यह है कि पालतू पशुओं के भोजन-रूप में प्रयोग से यह ख़तरा कहीं न्यून है। मवेशियों और परिन्दों को पालने से न जाने कितने ही मनुष्य हर साल फ़्लू और एनसेफेलाइटिस की भेंट चढ़ जाते हैं। ये बीमारियाँ आदमी को जानवर पालने के एवज़ में उपहार में मिली हैं।
एफडीए यह भी हमें बताता है कि हम अपने भोजन में बहुत कुछ ऐसा खा जाते हैं , जो हम जानते ही नहीं। अनाज में चूहों के ढेरों बाल मिलते हैं , जिन्हें कोई नहीं निकाल पाता। सब्ज़ियों में तमाम कीड़ों में अंग-उपांग हमारे भोजन में अपनी जगह अनजाने बना लेते हैं। अभी यह सब अनायास हो जाता है , आगे भविष्य की भयावहता को देखते हुए यह सब सायास करना पड़ सकता है।
सन् 2050 तक मनुष्य नौ बिलियन के क़रीब होंगे। पर्यावरण दिन-दिन प्रतिकूल हो रहा है। सबके लिए आहार एक चुनौती है , जो आगे और बड़ी होगी। ऐसे में कीड़ों को आहार-शृंखला में शामिल करना मनुष्य की आवश्यकता भी बन सकती है , चाहे आज हम इसपर लाख नाक-भौं सिकोड़ लें। बुभुक्षितः किम् न करोति पापम् !

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#Skand shukla
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