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भारतीय नौसेना की उपलब्धियों के दिन

इन दिनों भारत की रक्षा तैयारियों में कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियां देखने को मिल रही हैं। इनमें तकनीकी रूप से सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण भारत की पहली और पूरी तरह देश में ही बनी परमाणु ईंधन चालित पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत के रिएक्टर…

भारतीय नौसेना की उपलब्धियों के दिन
इन दिनों भारत की रक्षा तैयारियों में कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियां देखने को मिल रही हैं। इनमें तकनीकी रूप से सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण भारत की पहली और पूरी तरह देश में ही बनी परमाणु ईंधन चालित पनडुब्बी आईएनएस अरिहंत के रिएक्टर का चालू होना है। इसके अलावा भारत में ही बने विमानवाहक जहाज आईएनएस विक्रांत को पानी में उतारा गया। पानी में इसकी क्षमताओं के परीक्षण के बाद इसमें कुछ और निर्माण कार्य किया जाएगा और संभवत: 2018 तक यह पूरी तरह उपयोगी हो जाएगा। इन दोनों ही तकनीकी उपलब्धियों से भारत उन चंद देशों में शामिल हो जाएगा, जिनके पास यह तकनीक है। परमाणु चालित पनडुब्बियां अमेरिका, रूस, ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस और चीन के पास हैं और विमानवाहक जहाज बनाने की क्षमता अमेरिका, गेट्र ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के पास है। विमानवाहक जहाज कुछ और देशों के पास हैं, लेकिन उनमें से कुछ देश भारत के साथ उन्हें बनाने की क्षमता हासिल करने में लगे हैं। अमेरिका के पास जितने विमानवाहक जहाज हैं, उतने तो बाकी देशों के पास कुल मिलाकर भी नहीं हैं। इस साल के अंत में अगर रूस में बना आईएनएस विक्रमादित्य भारतीय नौसेना में शामिल हो गया, तो भारत के पास तीन विमानवाहक जहाज हो जाएंगे। इसके अलावा परमाणु हथियार क्षमता वाली मध्यम पूरी की मिसाइल पृथ्वी-2 का भी सफल परीक्षण किया गया।आईएनएस अरिहंत के रिएक्टर का कामयाबी के साथ शुरू हो जाना इसलिए बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि इसके लिए कई तकनीकी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। सबसे बड़ी चुनौती इतना छोटा और हल्का परमाणु रिएक्टर बनाना होता है, जो पनडुब्बी में फिट हो सके। इसके अलावा पनडुब्बी की गति काफी परिवर्तित होती रहती है और उसे समुद्र में तरह-तरह के झटके बर्दाश्त करने होते हैं। अगर पनडुब्बी से मिसाइल छोड़ी गई, तो उसे काफी तेज झटका लगता है। ऐसे में, रिएक्टर इतना मजबूत भी होना चाहिए, जो ऐसे हालात में पूरी तरह सुरक्षित रह सके। पनडुब्बी की गति जब कभी तेज और जब कभी धीमी होती है, तो इसके लिए रिएक्टर से ऊर्जा उत्पादन का भी तेजी से कम ज्यादा होना जरूरी है। बिजली पैदा करने के लिए जो आम रिएक्टर लगाए जाते हैं, उनमें यह ऊर्जा उत्पादन में परिवर्तन की रफ्तार काफी धीमी होती है, लेकिन पनडुब्बी के रिएक्टर में ऐसा नहीं चल सकता। भारत में सरकारी और निजी क्षेत्र ने अपने कौशल से इन तकनीकी चुनौतियों का सामना किया और ऐसा रिएक्टर बना कर दिखा दिया।
इस रिएक्टर में जो उच्च दबाव पर सामान्य पानी इस्तेमाल करने की तकनीक है, वह हमारे परमाणु बिजलीघरों में भारी पानी पर आधारित तकनीक से अलग है और इस नई तकनीक में महारत हमारे लिए बिजली उत्पादन में भी उपयोगी साबित हो सकती है। भारत की समुद्री सीमा बहुत बड़ी है और हिंद महासागर क्षेत्र में भारत सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। हिंद महासागर में अपने सामरिक और व्यापारिक हितों की खातिर भारत को उच्च तकनीक पर आधारित नौसैनिक साजो-सामान चाहिए। चाहे परमाणु पनडुब्बी हो या विमानवाहक जहाज, ये किसी देश की नौसैनिक पहुंच हजारों किलोमीटर तक कर देते हैं। सिर्फ इनकी मौजूदगी का ही ऐसा असर होता है, जैसा छोटे और सीमित क्षमता के हथियारों के इस्तेमाल का भी नहीं होता। इसके अलावा उच्च तकनीक के क्षेत्र में जो कुछ सैनिक उपलब्धि होती है, उसका फायदा देश को कई और क्षेत्रों में भी मिलता है। इस मायने में इन दिनों की ये उपलब्धियां देश को दूरगामी फायदा पहुंचाएंगी।(ref-Hindustan)
Filed under
#भारतीय सेना#प्रतिरक्षा
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