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फिजिक्स, फिलॉस्फी और पेनरोज का नोबेल

चंद्रभूषण भौतिकशास्त्रियों के बीच आम धारणा यही रही है कि रॉजर पेनरोज को नोबेल प्राइज कभी नहीं मिलेगा। उनके मित्र स्टीफन हॉकिंग अपने लिए घोषित कर चुके थे कि उन्हें यह पुरस्कार तभी मिल सकता है जब किसी ब्लैक होल से रेडिएशन…

फिजिक्स, फिलॉस्फी और पेनरोज का नोबेल

चंद्रभूषण

भौतिकशास्त्रियों के बीच आम धारणा यही रही है कि रॉजर पेनरोज को नोबेल प्राइज कभी नहीं मिलेगा। उनके मित्र स्टीफन हॉकिंग अपने लिए घोषित कर चुके थे कि उन्हें यह पुरस्कार तभी मिल सकता है जब किसी ब्लैक होल से रेडिएशन का होना दर्ज कर लिया जाए। इसकी संभावना अगले हजारों साल में भी नहीं दिख रही, लिहाजा नोबेल मुद्दे पर उन्हें सब्र ही करना पड़ेगा। कमोबेश ऐसी ही स्थिति पेनरोज की भी रही है। गणितज्ञों में भौतिकशास्त्री और भौतिकशास्त्रियों में गणितज्ञ! संयोग कहें कि पिछले तीन-चार वर्षों में नीयर-इन्फ्रारेड टेलिस्कोपों की ताकत बढ़ने और एडैप्टिव ऑप्टिक्स की तकनीक सुधरने से ब्लैक होलों पर सीधे नजर रखना संभव हो गया है। गुरुत्व तरंगों (ग्रैविटेशनल वेव्ज) की मेहरबानी से न्यूट्रॉन स्टार और ब्लैक होल के टकराने जैसी असंभव समझी जाने वाली घटनाएं निरंतर खबरों में रहने लगी हैं। नतीजा यह कि 87 की उम्र में नोबेल का सेहरा पेनरोज के सिर पर सज गया।

इस साल भौतिकी का नोबेल पुरस्कार उनके अलावा राइनहार्ड गेंजेल और एंड्रिया गेज को मिला है। पुरस्कार की आधी राशि रॉजर पेनरोज को 1965 में यह सिद्ध करने के लिए कि थिअरी ऑफ रिलेटिविटी अनिवार्य रूप से ब्लैक होल के सृजन की ओर ले जाती है। कसरत का महत्व इस बात में था कि थिअरी ऑफ रिलेटिविटी के खोजी अल्बर्ट आइंस्टाइन को दिवंगत हुए तब तक दस साल हो चुके थे, और वह अपनी अंतिम सांस तक यही मानते रहे कि ब्लैक होल की धारणा में निश्चय ही कोई झोल है। किसी बिंदु पर हर तरफ से सिर्फ एक ही बल (गुरुत्व) कार्य करे, उसे संतुलित करने वाले सभी बल समाप्त हो जाएं, यह बात तर्क और बुद्धि से परे है। खैर, भौतिकी में सुंदर सिद्धांत लगातार आते रहते हैं लेकिन वजन उन्हें तभी मिलता है, जब वे प्रेक्षणों की कसौटी पर बाकी सिद्धांतों से ज्यादा खरे उतरें।


पेनरोज को इस कसौटी पर कसने का काम अपनी टीमों और टेलिस्कोपों के साथ हवाई और चिली में सालोंसाल बैठे गेंजेल और गेज ने किया- हमारी आकाशगंगा के केंद्र में अनुमानित ब्लैक होल ‘सैजिटेरियस ए स्टार’ की टोह लेकर। बहरहाल, रॉजर पेनरोज पर बात करना केवल इसलिए जरूरी नहीं है कि उन्हें भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिल गया। यह तो हर साल ही मिलता है और इसके अधिकारी हर बार प्रायः दो या तीन लोग पाए जाते हैं। रॉजर पेनरोज द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उभरे प्राकृतिक दर्शन के गिने-चुने नामों में एक हैं। उनके काम का दायरा गणित, खगोल विज्ञान, फंडामेंटल फिजिक्स, गणितीय कला और कंप्यूटर साइंस से लेकर मनोविज्ञान को छूता हुआ पदार्थ और चेतना की संधि तक फैला है। और इनमें से किसी भी क्षेत्र में उनकी भूमिका सिर्फ पाला छूकर निकल जाने वाली नहीं है। हर जगह उनकी कोई ऐसी छाप मौजूद है कि उधर से गुजरते हुए आपको उनके द्वारा किए गए बदलावों को नोटिस लेना पड़ता है।


एक मायने में यह ब्रिटिश गणितज्ञ यूरोप के महान उद्बोधन काल की याद दिलाता है, जिसमें हर कद्दावर चिंतक की एक से अधिक शास्त्रों और भाषाओं में गहरी गति हुआ करती थी। दो साल पहले गुजरे स्टीफन हॉकिंग की रॉजर पेनरोज के साथ अक्सर तुलना की जाती थी, लेकिन काम पर गौर करें तो दोनों का फर्क जगजाहिर है। निजी तौर पर मैंने पेनरोज का नाम सबसे पहले 1989 में पटना में सुना था, जब पॉप्युलर दायरे में उनकी पहली किताब ‘द एंपरर्स न्यू माइंड’ अभी आई ही आई थी। वैज्ञानिक दर्शन में दिलचस्पी रखने वाले नौजवानों का रुझान उस समय स्टीफन हॉकिंग की लोकप्रिय किताब ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ की तरफ था जो 1988 में आते-आते ही पूरी दुनिया पर छा गई थी। इसकी एक वजह यह भी थी कि सीधे पेपरबैक में आई यह किताब ज्यादा महंगी नहीं थी और साल भर में इसका पाइरेटेड संस्करण भी दिल्ली में दरियागंज से लेकर पटना में गांधी मैदान तक किताबी चोर बाजारों में सहज उपलब्ध होने लगा था।


लेकिन कानपुर आईआईटी से तुरंत लौटा मेरा मित्र झटपटिया पढ़ाई में बिला शक मुझसे बहुत आगे था और मेरी हॉकिंग चर्चा को उसने तत्काल अपनी पेनरोज चर्चा के नीचे दबोच लिया। बचकानी बातों से आगे चलें तो ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ भी कोई बहुत आसान किताब नहीं है लेकिन ‘द एंपरर्स न्यू माइंड’ उच्च गणित से गुजर चुके लोगों के लिए भी एक कठिन किताब है। आपको पुरानी धारणाएं बदलने और कोशिश करके नई धारणाओं को समझने, उनको अंगीकार करने के लिए खुद को तैयार रखना होता है। हां, पेनरोज की किताब भी गणित या कंप्यूटर साइंस के छात्रों के लिए नहीं, आम पाठकों के लिए ही है। बस, स्टीफन हॉकिंग की तरह पाठकों पर रहम करने के लिए फॉर्म्यूलों से बचने का कोई आग्रह उनके यहां नहीं है।


किताब का सार-संक्षेप जैसा कुछ है ही नहीं तो उसे यहां प्रस्तुत करने का सवाल कहां पैदा होता है लेकिन मोटे तौर पर कहें तो यह किताब कंप्यूटर आधारित ज्ञान मीमांसा को खारिज करती है, कि अगर सभी शास्त्रों और गतिविधियों के उचित अल्गॉरिथ्म पर्याप्त शक्ति वाले कंप्यूटरों में फीड किए जा सकें तो सारी समस्याओं का कहीं ज्यादा तेज और सटीक समाधान सहजता से मानव जाति को उपलब्ध होने लगेगा। पेनरोज इस किताब में बाकायदा दो धन दो बराबर चार की तरह सिद्ध करते हैं कि ऐसे सभी समाधान अलग-अलग और मिलकर भी यथार्थ के आसपास नहीं ले जा सकेंगे। यह प्रक्रिया उन्हें चेतना-चिंतन की ओर ले जाती है- दर्शन की प्राचीनतम समस्या के गणितीय आयाम की ओर। पेनरोज से मेरी दूसरी किताबी मुलाकात इसी सिलसिले में अनेस्थीसियोलॉजिस्ट (बेहोशी विज्ञानी) स्टुअर्ट हैमरॉफ के साथ मिलकर लिखी गई उनकी किताब ‘द लार्ज, द स्माल ऐंड द ह्यूमन माइंड’ के कुछ अंशों के अनुवाद के दौरान हुई, जिसमें चेतना को क्वांटम मेकेनिक्स के जरिये समझने की उनकी कोशिश ने हैरान किया था।


इसकी प्रस्थापनाओं को कई जीव विज्ञानियों ने काटा, लेकिन फिर दोनों पक्षों के बीच कुछ समझदारी भी बनी। आने वाले दशकों में भौतिकी और जीव विज्ञान के संधि स्थल पर होने वाले काम की दिशा शायद यही रहे। लेकिन वैज्ञानिक दायरों में सबसे ज्यादा बात 2016 में आई पेनरोज की किताब ‘फैशन, फेथ ऐंड फैंटसी इन द न्यू फिजिक्स ऑफ द यूनिवर्स’ पर हुई है, जिसमें उन्होंने भौतिकी की बहुचर्चित ‘स्ट्रिंग थिअरी’ को एक निराधार फैशन, ‘क्वांटम मेकेनिक्स’ को उथले स्तर पर गटक ली गई आस्था, और खगोलशास्त्र का एक अनिवार्य घटक समझे जाने वाले ‘कॉस्मिक इन्फ्लेशन’ को एक फैंटसी, कपोल कल्पना करार दिया है। उम्मीद करें कि नए दौर के भौतिकशास्त्री उनकी इन आपत्तियों को गंभीरता से लेंगे।

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