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पानी को जहरीला बनाता यूरेनियम

सुभाष गाताडे पंजाब, हरियाणा के हिसार और बगल के हिमाचल प्रदेश के जिलों में क्या समानता ढूंढी जा सकती है? खबरों के मुताबिक अगर भाभा एटोमिक रिसर्च सेन्टर के विशेषज्ञों की राय पर गौर करें तो यह वही इलाके हैं जहां के पानी में…

पानी को जहरीला बनाता यूरेनियम


सुभाष गाताडे
पंजाब, हरियाणा के हिसार और बगल के हिमाचल प्रदेश के जिलों में क्या समानता ढूंढी जा सकती है? खबरों के मुताबिक अगर भाभा एटोमिक रिसर्च सेन्टर के विशेषज्ञों की राय पर गौर करें तो यह वही इलाके हैं जहां के पानी में यूरेनियम की मात्रा मिली है। इनमें सबसे प्रभावित भटिंडा एवं मोगा जिले कहे जा सकते हैं, जहां यूरेनियम की मात्रा सर्वाधिक पायी गयी है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि पंजाब में अलग-अलग इलाकों से एकत्रित पानी के सैम्पल में से 35 फीसद ऐसे रहे हैं जिसमें यूरेनियम की मात्रा सीमा से अधिक पायी गयी है। आखिर कितनी है पानी में यूरेनियम सहन करने योग्य मात्रा? भाभा सेंटर के वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर पानी में यूरेनियम की सहन करने योग्य मात्रा 60 पार्ट्स प्रति बिलियन कही जा सकती है तो उन्हें अपने अनुसंधान में यह मात्रा यहां 6 पार्टस प्रति बिलियन से लेकर 600 पार्टस प्रति बिलियन तक मिली है। गौरतलब है कि मामले की तह तक जाने के लिए डिपार्टमेंट ऑफ एटोमिक एनर्जी ने भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर के माध्यम से अमृतसर स्थिति गुरु नानकदेव युनिवर्सिटी के साथ मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैडिंग पर भी हस्ताक्षर किए हैं। पिछले दिनों एटोमिक एनर्जी कमीशन के चेयरमैन आर के सिन्हा ने पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के सामने अपने अन्तरिम अध्ययन के नतीजे भी पेश किए। ध्यान रहे कि वर्ष 2009 के मार्च महीने में पंजाब में पानी में यूरेनियम की मात्रा का मसला पहली दफा तब चर्चा में आया था जब दक्षिण अफ्रीकी बोर्ड द्वारा प्रमाणित क्लिनिकल टॉक्सिकोलोजिस्ट कारिन स्मिथ को फरीदकोट में जन्म से विकलांग पैदा बच्चों के बाल एवं मूत्र के सैम्पल पाने और जर्मनी की माईक्रोट्रेस मिनरल लैब को उन्हें भेजने में सफलता मिली थी। फरीदकोट के बाबा फरीद सेन्टर फॉर स्पेशल चिल्ड्रेन के प्रमुख पृथपाल सिंह की पहल का यह नतीजा था कि ऐसे सैम्पल एकत्रित हो सके थे। रिसर्च के पहले अनुमान लगाया जा रहा था कि विश्लेषण में हेवी मेटल या रासायनिक विषाक्तता की बात सामने आएगी, मगर आश्चर्य था कि भेजे गए 88 फीसद नमूनों में यूरेनियम की अत्यधिक मात्रा पायी गयी थी। पंजाब के मालवा इलाके के दिमागी तौर पर विकलांग बच्चों पर किए अध्ययन में यह विचलित करनेवाली बात उजागर हुई कि 12 साल से छोटे 87 फीसद और12 साल से बड़े 82 फीसद बच्चों में यूरेनियम की मात्रा इतनी अधिक है जिससे उन्हें बीमारी हो सकती है। पिछले माह खबर आयी थी कि फरीदकोट के गोविन्द सिंह मेडिकल कालेज के 300 छात्रों एवं 220 डॉक्टरों ने होस्टल छोड़ शहर में किराये पर मकान लिए थे क्योंकि उन्होंने पाया कि जमीन के नीचे से निकाला गया पानी बिना शुद्ध किए ही सप्लाई किया जा रहा है। संसद के बजट सत्र में सरकार ने पुष्टि भी की थी कि पंजाब के पानी में यूरेनियम की अत्यधिक मात्रा पायी गयी है। दरअसल पंजाब के पानी में यूरेनियम पाए जाने की घटनाओं की पड़ताल के लिए संसदीय समिति ने प्रभावित इलाकों का दौरा किया था और उसके यही निष्कर्ष हैं। संसदीय समिति ने यह भी चेतावनी दी कि अगर इस मसले पर चर्चा नहीं होगी तो वह आम लोगों के साथ पशुओं, पर्यावरण एवं जैव सुरक्षा को न भरनेलायक नुकसान पहुंचा सकता है। खबर के मुताबिक पंजाब के मुख्यमंत्री ने विशेषज्ञों से अनुरोध किया है कि वह पानी के शुद्धिकरण की उपयुक्त टेक्नोलॉजी के बारे में बताएं ताकि राज्य में पीने के पानी की गुणवत्ता बढ़ायी जा सके। प्रश्न है कि ऐसी जगह, जहां यूरेनियम के प्राकृतिक स्रेत न हों, वहां बच्चों के खून में यह जरूरत से ज्यादा कहां से आ गया? क्या चन्द विशेषज्ञों की इस बात पर यकीन किया जा सकता है कि पानी में इस भारी धातु की अत्यधिक मात्रा की वजह मिट्टी की अंदरूनी सतह में ग्रेनाइट की मौजूदगी है? इसका एक विश्लेषण यही मुमकिन है कि इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी टैंकों द्वारा अपने बमगोलों में जिस प्रतिबंधित डिप्लेटेड यूरेनियम का प्रयोग हो रहा है, वह हवा के जरिए न केवल पंजाब बल्कि दिल्ली तक भी पहुंच रहा है। वैसे क्या बला है यह नि:शेष या डिप्लेटेड यूरेनियम? दरअसल हथियार बनाने के लिए संवर्धन की प्रक्रिया से गुजरने या परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में ईधन के तौर पर इस्तेमाल होने के बाद यूरेनियम का जो हिस्सा बचता है, उसे नि:शेष यूरेनियम कहते हैं। यह अपने ठोस रूप में सौम्य तरीके से विकिरणधर्मी/रेडियोएक्टिव होता है मगर काफी भारी होता है। सीसे की तुलना में यह 1.7 गुना अधिक सघन होता है। हथियारबन्द वाहनों जैसे टैंकों की मोटी दीवारों को भी छेद सकने की उसकी क्षमता के कारण सेना में इसकी काफी अहमियत होती है। 1 मई, 2008 को बीबीसी र्वल्ड सर्विस के ‘वन प्लेनेट प्रोग्राम’ में काबुल और कंधार के डॉक्टरों को उद्धृत करते हुए बताया गया था कि किस तरह पिछले दो सालों में बाल जन्म के विकलांगता और विद्रूपताओं के मामले लगभग दुगुने हुए हैं। जैसे कहीं शरीर के अवयव टेढे-मेढ़े मिलते हैं तो कहीं सर सामान्य से छोटा या बहुत बड़ा दिख रहा है। अलबत्ता जॉर्ज बुश हुकूमत ने इस मामले में अपने को निदरेष साबित करने की कोशिश की थी, लेकिन प्रोग्राम में ही कनाडा स्थित यूरेनियम मेडिकल रिसर्च सेन्टर के हवाले से बताया गया था कि इसका कारण नि:शेष यूरेनियम हो सकता है। वर्ष 2002 और 2003 में इस सेंटर ने अफगान नागरिकों के मूत्र की जांच की थी और कई मामलों में उसकी मात्रा इराक युद्ध में लड़े सैनिकों की तुलना में सौ गुना अधिक दिखाई दी थी।

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