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न्यूटन का एकान्त

सुशोभित आइज़ैक न्यूटन का एकान्त लगभग दुर्भेद्य था। उसमें किसी को प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी। उसका पूरा बचपन तनहाई में बीता था (जन्म से पहले पिता की मृत्यु हो गई, तीन वर्ष की अवस्था में माँ दूसरा विवाह करके उसे त्याग गई…

 न्यूटन का एकान्त

सुशोभित

आइज़ैक न्यूटन का एकान्त लगभग दुर्भेद्य था। उसमें किसी को प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी। उसका पूरा बचपन तनहाई में बीता था (जन्म से पहले पिता की मृत्यु हो गई, तीन वर्ष की अवस्था में माँ दूसरा विवाह करके उसे त्याग गई), और अपनी पूरी किशोरावस्था और युवावस्था में वह अंतर्मुखी, संकोची, निस्संग रहा। उसका कोई संगी था ना साथी। उसने कभी किसी स्त्री से प्रेम नहीं किया। या बेहतर होगा अगर कहें किसी स्त्री ने उससे कभी प्रेम नहीं किया (इन दोनों बातों में बहुत भेद है)। इससे निजता और एकान्त में जिससे सबसे गहरी सेंध लगती है, अंतर्मन के उस कोने को न्यूटन ने बाँध की तरह अभेद बना दिया था। उसकी एकाग्रता सम्पूर्ण थी, कोई उसको अपने काम करने की मेज़ से डिगा नहीं सकता था। कालान्तर में, जब वो प्रौढ़ हुआ, तो वो अनेक सार्वजनिक भूमिकाओं में गया, जैसे- मेम्बर ऑफ़ पार्लियामेंट, रॉयल सोसायटी का प्रेसिडेंट, कैम्ब्रिज में गणित का प्राध्यापक, मिन्ट का प्रमुख- और उसने अपने समय के अनेक ख्यातनाम व्यक्तियों से ख़तो-किताबत भी की, किंतु दूसरों और अपने बीच एक बेमाप फ़ासला उसने हमेशा क़ायम रखा। सहकर्मियों से वह किंचित रूखाई से पेश आता, और अपने मातहतों के लिए वो सुदूर के किसी देवता से कम नहीं था। उसका आत्माभिमान अप्रतिहत था, जो औरों को आतंकित करता था। उसके जीवन में भावनात्मक सम्बंधों के लिए एक गहरी अरुचि थी।

एकान्त के प्रति उसके व्यक्तित्व के इस चुम्बकीय खिंचाव ने ही उससे वैसे उद्यम करवा लिए, जिन्हें अतिमानवीय कहा जाता है और ये माना जाता है कि वो किसी साधारण मनुष्य के बूते की बात नहीं थी। वर्ष 1665 में इंग्लैंड में प्लेग की महामारी फैली। तब न्यूटन कैम्ब्रिज में छात्र था। महामारी से बचाव के लिए उसे उसके गाँव वूल्सथोर्प भेज दिया गया, जहाँ वो पूरे समय अपने कमरे में सिमटा रहता। विज्ञान के इतिहास में इसे न्यूटन का मिरेकल-ईयर कहा जाता है। वैसा ही मिरेकल-ईयर फिर अल्बर्ट आइंष्टाइन के जीवन में भी आया, वर्ष 1905, जब उसने दुनिया को बदल देने वाली स्थापनाएँ सामने रखीं। वूल्सथोर्प में न्यूटन ने डिफ्रेंशियल कैलकुलस की ईजाद की। उसने प्रिज़्म की सहायता से रौशनी के रेशे-रेशे खोलकर देखे और स्पेक्ट्रम के सात रंगों को दुनिया के सामने रख दिया। उसने यूनिवर्सल ग्रैविटेशन पर अपनी थ्योरियों का सूत्रपात भी उसी कालखण्ड में किया और दृढ़ता से यह कहा कि जो चीज़ सेब को धरती पर गिराती है, वही आकाश में ग्रहों और पिण्डों को टिकाए हुए है, इस रहस्यमयी चीज़ का नाम है- ग्रैविटी- पदार्थ में एक चिरंतन महाचेतना का करस्पर्श। वर्ष 1666 तक न्यूटन दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण नेचरल फ़िलॉस्फ़र, भौतिकविद्, गणितज्ञ और वैज्ञानिक बन चुका था, अलबत्ता उसे ख़ुद ही इसकी भनक तक ना थी। भला कैसे होती, तब उसकी उम्र कुलजमा 24 साल ही तो थी!

न्यूटन जितना बड़ा वैज्ञानिक और गणितज्ञ था, उतना ही महान रहस्यदर्शी भी था। धर्म और विज्ञान के बीच स्वर्णिम मध्यमार्ग उसने तलाश लिया था और भौतिकी के अनुल्लंघ्य नियमों को वह एक दैवीय-उपक्रम की अभिव्यक्ति की तरह देखता था। पदार्थ में उसे विश्वचेतना की छाँह दिखलाई देती थी। उसने अल्केमी और थियोलॉजी के क्षेत्र में गणित और भौतिकी से कम काम नहीं किया। जॉन मेनार्ड कीन्स ने न्यूटन को 'द लास्ट ऑफ़ मैजिशियन एंड बेबीलोनियन' कहा था। वहीं न्यूटन की बायोग्रैफ़ी लिखने वाले पीटर एक्रॉयड ने महाकवि विलियम ब्लेक को उद्धृत करते हुए उसे 'द वर्जिन श्राउडेड इन स्नो' कहकर पुकारा था। इस पुकार में एक गहरी विडम्बना निहित थी, क्योंकि विलियम ब्लेक न्यूटन पर आरोप लगाता था कि उसने प्रकृति में कविता की भावना को क्षति पहुँचाकर गणित के नियमों को प्रतिष्ठित कर दिया था। लेकिन न्यूटन की ज़िंदगी में कविता के लिए कोई जगह नहीं थी। या अगर आप चाहें तो उसके काम में पोयट्री ऑफ़ मैथेमैटिक्स ज़रूर खोज सकते हैं। युवल हरारी के स्मरणीय शब्दों में- न्यूटन ने हम सबको यह दिखलाया था कि प्रकृति की किताब गणित की भाषा में लिखी गई है।

कैम्ब्रिज में छात्र से प्राध्यापक बनने में न्यूटन ने ज़्यादा समय नहीं लिया। वो कैम्ब्रिज के इतिहास के सबसे युवा प्राध्यापकों में शुमार है, क्योंकि वो उसके समय के दूसरे शिक्षकों से कहीं अधिक मेधावी था। लेकिन जिस घोर एकान्त में उसने बचपन से लेकर अब तक का अपना जीवन बिताया था, और उसकी देदीप्यमान प्रतिभा आगे चलकर उसके लिए जिस यशस्वी जीवन का दुशाला बुन रही थी, उससे पेश आने वाली दुविधाओं ने उसे चिंतित भी बहुत किया। 1670 के दशक में गणितज्ञ जॉन कोलिन्स को लिखे एक ख़त में उसने विनती की कि उसके द्वारा भेजे गए शोधपत्र को उसके नाम के बिना ही छाप दिया जाए, क्योंकि अगर यह उसके नाम से छपा तो लोगों का ध्यान उसकी तरफ़ खिंचेगा, जो वो हरगिज़ नहीं चाहता था। प्रसिद्धि से एकान्त में ख़लल पड़ सकता था, किंतु न्यूटन जैसी सूर्यदीप्त प्रतिभा के सामने छुपकर रहने का कोई विकल्प नहीं था। कालान्तर में 'प्रिंसिपिया मैथेमैटिका' के प्रकाशन के बाद उसे वैश्विक ख्याति मिली और उसने पहले से अधिक आत्मविश्वास और किंचित आत्ममुग्धता के साथ उसे अंगीकार किया, किंतु मृत्युशैया पर अपनी निजता पर संकट के पुराने भय ने उसे फिर से इतना ग्रस लिया था कि उसने मरने से पहले अपनी अनेक महत्वपूर्ण पाण्डुलिपियाँ और पत्र जला दिए थे।

चर्चित न्यूटन-आइंष्टाइन द्वैत का एक आयाम यह भी था कि जहाँ आइंष्टाइन के स्वभाव में बड़ी सहज विनोदप्रियता थी, वहीं न्यूटन की गम्भीरता कांसे की मूरत की तरह खरी और सुठोस थी। कह लीजिये कि जहाँ आइंष्टाइन भौतिकी की दुनिया का मोत्सार्ट था तो न्यूटन उसका बीथोवन था। बचपन में माँ के द्वारा अकेला छोड़ दिए जाने के दंश से वो कभी उबर नहीं पाया था। उसके व्यक्तित्व में रोष, ग्लानि, महत्वाकांक्षा और आत्माभिमान गहरे तक पैठ गए थे। पीटर एक्रॉयड ने न्यूटन की बायोग्रैफ़ी में उसके द्वारा किशोरावस्था में लिखी जाने वाली डायरियों का हवाला दिया है, जिसमें न्यूटन अपने पापों का ब्योरा लिखता था। ये पाप क्या थे? चेरी के फल चुराना, आज्ञा का उल्लंघन करना, ग़ुस्से में आकर किसी के टोप में कील रख देना, स्कूल में संगियों से लड़ बैठना- अपने इन 'पापों' को न्यूटन ने नोटबुक में दर्ज किया है और बहुत शिद्दत से उनका पछतावा किया है। कुछ और जगहों पर उसने नाच-गाने के प्रति गहरी अरुचि जताई है और अपने जीवन-प्रयोजन के बारे में गम्भीर चिंता प्रकट की है। वो ख़ुद से पूछता है कि मैं क्यों हूँ, किसलिए हूँ, दुनिया में क्या करने के लिए आया हूँ? वो एकान्त में बैठकर रोता रहता था। तब उसकी आयु उन्नीस वर्ष थी। महज़ पाँच-छह साल बाद ही उसने अपने मिरेकल-ईयर की बदौलत दुनिया के इतिहास को बदल देना था। आज सर आइज़ैक न्यूटन की गणना विश्व के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों में की जाती है। संशय और ग्लानि से भरे उस उन्नीस साल के नौजवान को दूर-दूर तक इसका अंदाज़ा नहीं था।

यह कैसे हुआ था? सम्भवतया एक महान नियति ने उसे अपने माध्यम की तरह चुन लिया था। किंतु इसकी एक शर्त थी। जैसा जीवन दूसरे बिताते हैं, वैसा जीवन उसके भाग्य में नहीं था और उसे स्वयं को एक दूसरे ही प्रयोजन में झोंक देना था। अपने एकान्त की पूरी निष्ठा से रक्षा किए बिना यह सम्भव नहीं हो सकता था। न्यूटन का जीवन कइयों के लिए आज भी एक पहेली बना हुआ है। यह पहेली कभी सुलझाई नहीं जा सकेगी, क्योंकि न्यूटन अपने पीछे वो युक्तियाँ नहीं छोड़ गया है, जिनकी मदद से उस तक पहुँचा जा सके। उसने दुनिया और अपने बीच के सारे पुल जला दिए थे। और वैसे जीवन में मैत्री, प्रेम, सुख, विश्राम और संतोष के लिए भला कोई जगह कैसे हो सकती थी?



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