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दूध पर चीनी क्यों हुए लट्टू

चंद्रभूषण किसी देश के आम लोगों का दूध पीना भी क्या दुनिया के लिए चिंता का विषय हो सकता है? क्यों नहीं, बशर्ते उसकी आबादी संसार में सबसे ज्यादा हो और दूध पीने की परंपरा वहां जड़ से शुरू हो रही हो। जाहिर है, हम पड़ोसी मुल्क…

दूध पर चीनी क्यों हुए लट्टू
चंद्रभूषण
किसी देश के आम लोगों का दूध पीना भी क्या दुनिया के लिए चिंता का विषय हो सकता है? क्यों नहीं, बशर्ते उसकी आबादी संसार में सबसे ज्यादा हो और दूध पीने की परंपरा वहां जड़ से शुरू हो रही हो। जाहिर है, हम पड़ोसी मुल्क चीन की बात कर रहे हैं। वहां की 95 फीसदी आबादी हान जाति की है, जिसका शरीर वयस्क होने के बाद दूध नहीं हजम कर पाता। आंकड़ों में कहें तो 1950 में वहां डेरी के नाम पर कुल 1 लाख 20 हजार देसी गायें दर्ज की गई थीं, जिनमें ज्यादातर इनर मंगोलिया में और कुछ तिब्बत में थीं।

यहां यह बताना जरूरी है कि संसार में सबसे पहले दूध पिये जाने के प्रमाण तुर्की में (ईसा से 7000 साल पूर्व) मिलते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा तरह के जानवर अभी मंगोलिया में ही दुहे जाते हैं। वहां सात जानवरों की बाकायदा अलग डेरियां चलती हैं। इसके विपरीत हमारे यहां सिर्फ गाय का दूध अलग मिल पाता है, वह भी अब जाकर। गाय के अलावा हमारे यहां भैंस और बकरी दुही जाती है, कहीं-कहीं भेड़ और ऊंट भी। लेकिन इन पांच के सिवा छठां दुधारू जानवर खोजना मुश्किल है।

इनर मंगोलिया चीन का अभिन्न अंग होने के साथ-साथ मंगोलियाई सभ्यता का हिस्सा भी है। स्वाभाविक है कि चीन का ज्यादातर दूध वहीं से सप्लाई होता है। पारंपरिक रूप से चीनी कुलीन वर्ग दूध को बर्बर मंगोल हमलावरों की बदबूदार खाद्य सामग्री मानता था। गाय वहां मुख्यतः बीफ के लिए ही पाली जाती थी। लेकिन 1984 में टीवी के फैलाव के बाद चीनियों ने पहली बार लॉस एंजिलिस ओलिंपिक लाइव देखा तो लंबे-चौड़े ताकतवर विदेशियों को देखकर दंग रह गए।

उन्हें यह जानकारी भी मिली कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जापान पर अमेरिकी कब्जे के दौरान वहां की डाइट में दूध और अंडे के प्रवेश से जापानियों की औसत लंबाई एक पीढ़ी के अंदर एक इंच बढ़ गई थी। फिर तो दूध के प्रति इस नए आकर्षण को भांपकर चीन की कम्यूनिस्ट सरकार ने दूध के प्रचार की झड़ी लगा दी और इसे घर-घर पहुंचाने की कोशिशें भी शुरू कर दीं। इस एहतियात के साथ कि बच्चों के मां का दूध छोड़ने के बाद उन्हें हर दिन गाय का दूध पिलाया जाए।

नतीजा यह रहा कि 2015 की गणना में वहां 1 करोड़ 30 लाख खूब दूध देने वाली जर्सी गाएं दर्ज की गईं। ये गायें पहले छिटपुट किसान पालते थे, लेकिन अभी ये बड़े-बड़े हाइली मैकेनाइज्ड फार्मों में पाली जाती हैं। डर इस बात का है कि चीनियों में दूध की मांग इसी रफ्तार से बढ़ती गई तो धरती का एक बड़ा इलाका बंजर हो जाएगा। कारण? पर्यावरणविदों के पास मोटा हिसाब है कि प्रकृति को 1 लीटर दूध बनाने के लिए 1022 लीटर पानी खर्च करना पड़ता है!
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