एक प्राचीन वायरस रूस और फ्रांस के वैज्ञानिकों ने साइबेरिया की बर्फीली जमीन से एक विशाल वायरस खोजा है। यह वायरस संक्रामक है और करीब 30,000 वर्ष पुराना है। इतना पुराना वायरस मिलना एक असामान्य सी बात है। वैज्ञानिकों ने चेता…
13 MARCH 20143 min readBy the Author
एक प्राचीन वायरस
रूस और फ्रांस के
वैज्ञानिकों ने साइबेरिया की बर्फीली जमीन से एक विशाल वायरस खोजा है। यह वायरस
संक्रामक है और करीब 30,000 वर्ष पुराना है। इतना पुराना वायरस
मिलना एक असामान्य सी बात है। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि ग्लोबल वार्मिग के
प्रभावों से बर्फीली जमीन से दूसरे वायरस और जीवाणु भी बाहर आ सकते हैं जो
बीमारियां फैला सकते हैं। प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों से पता चलता है कि
साइबेरिया से मिला वायरस एक कोशिका वाले जीव, अमीबा को संक्रमित कर सकता है, लेकिन यह बहुकोशिका जीवों और मनुष्यों को संक्रमित नहीं कर सकता।
पिथोवायरस नामक यह जीवाणु वायरस की अब तक ज्ञात किस्मों से एकदम भिन्न है। यह इतना
बड़ा है कि इसे ऑप्टिकल माइक्रोस्कोप से भी देखा जा सकता है। रूसी विज्ञान अकादमी
और फ्रांसीसी वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र के शोधकर्ताओं ने बताया कि यह वायरस सतह
से 30 मीटर नीचे दबा हुआ था। उनका अनुमान है
कि यह वायरस कम से कम 30,000 वर्षो से बर्फ में कैद था, लेकिन प्रयोगशाला में जीवित अमीबा के संपर्क में आने के बाद यह वायरस
पुनर्जीवित हो गया।
फ्रांसीसी
वैज्ञानिकों के मुताबिक इस अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि वायरस बर्फीली जमीन के
नीचे हजारों वर्ष तक सही सलामत रह सकते हैं। यह खोज सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि
से भी बहुत महत्वपूर्ण है। जलवायु परिवर्तनों के बाद विश्व में तापमान वृद्धि
निश्चित है। तापमान वृद्धि से ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ के पिघलने से इन
क्षेत्रों में खनिजों और तेल-गैस के दोहन के नए अवसर भी उत्पन्न होंगे, लेकिन बर्फ पिघलने या डिलिंग की वजह से सुप्त जीवाणु फिर से प्रकट हो
कर जनता के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकते हैं। इनमें चेचक जैसे वायरस भी हो सकते
हैं जिनका दुनिया से उन्मूलन हो चुका है। चेचक वायरस के विस्तार की प्रक्रिया
पिथोवायरस जैसी है। फ्रांसीसी वैज्ञानिक डॉ. शंटल एबरगेल का कहना है कि आर्कटिक की
बर्फीली सतहों के नीचे कई तरह के वायरस हो सकते है जो खनन कार्यो या जलवायु
परिवर्तनों से फिर सक्रिय हो सकते हैं। यह संभव है कि ये वायरस अमीबा के अलावा
दूसरे जीवों को संक्रमित करने में सक्षम हों। यहां दबे हुए जीवाणुओं का पता लगाने
के लिए वैज्ञानिकों को बर्फीली सतहों के नमूनों में मौजूद डीएनए का विस्तृत अध्ययन
करना चाहिए। अभी कोई नही जानता कि बर्फीली जमीन के नीचे क्या छुपा हुआ है? अत: ध्रुवीय क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बहुत ही
सावधानी के साथ करना पड़ेगा। इस बीच, एक अन्य अध्ययन में वैज्ञानिकों ने ग्लोबल वार्मिग के प्रभावों से
उष्ण प्रदेशों के पहाड़ी क्षेत्रों में मलेरिया के मामलों में बढ़ोतरी की चेतावनी
दी है। उन्होंने दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के पहाड़ी क्षेत्रों में पिछले दो
दशकों के दौरान हुए मलेरिया के मामलों का विस्तृत विश्लेषण किया है। उनका निष्कर्ष
है कि जब-जब तापमान बढ़ता है, पहाड़ी इलाकों में
मलेरिया के मामले भी बढ़ते हैं। वैज्ञानिकों के बीच कई वर्षो से यह बहस चल रही थी
कि क्या तापमान वृद्धि से उन ऊंचे इलाकों में भी मलेरिया पहुंच सकता है जो अभी तक
इस बीमारी से बचे हुए थे। लंदन स्कूल ऑफ हाइजिन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के रिसर्चर
मेनो बूमा का कहना है कि हमने अपनी शोध से यह सिद्ध किया है कि मलेरिया का ऊपरी
इलाकों में जाना सचमुच तापमान पर निर्भर है। इस बात को साबित करना बहुत मुश्किल
था।
हर साल करीब 30 करोड़ लोग मलेरिया की चपेट में आते है। यह बीमारी एक कोशिका वाले
जीवाणु प्लास्मोडियम की वजह से उत्पन्न होती है। मच्छर के काटने से प्लास्मोडियम
मनुष्य के शरीर में पहुंचता है। तापमान वृद्धि से ये जीव उन क्षेत्रों में भी पनप
सकते है जो पारंपरिक रूप से अभी तक मलेरिया से मुक्त रहे हैं। डॉ. बूमा के अनुसार
उष्ण प्रदेशों में लाखों लोग ऊंचे स्थलों पर रहते है। ऐतिहासिक तौर पर ये इलाके
बीमारियों से दूर रहे हैं।मुकुल व्यास