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क्या ग्लोबलाइजेशन को बचा पाएगा डब्लूटीओ

चंद्रभूषण विश्व व्यापार के लिए इतना बुरा समय पिछले तीस वर्षों में कभी नहीं रहा। आंकड़े अभी इसमें किसी तीखी गिरावट का संकेत नहीं दे रहे लेकिन संरक्षणवाद (प्रोटेक्शनिज्म) की दीवारें हर तरफ ऊंची हो रही हैं। इधर दो-ढाई वर्षो…

क्या ग्लोबलाइजेशन को बचा पाएगा डब्लूटीओ

चंद्रभूषण

विश्व व्यापार के लिए इतना बुरा समय पिछले तीस वर्षों में कभी नहीं रहा। आंकड़े अभी इसमें किसी तीखी गिरावट का संकेत नहीं दे रहे लेकिन संरक्षणवाद (प्रोटेक्शनिज्म) की दीवारें हर तरफ ऊंची हो रही हैं। इधर दो-ढाई वर्षों की बात करें तो पहले कोविड-19 ने हर सक्षम देश को इस बीमारी से जुड़ी दवाओं, वैक्सीनों और चिकित्सा जरूरतों को अधिक से अधिक अपने पास दबा लेने की ओर धकेला। फिर जैसे ही हालात कुछ सुधरने शुरू हुए, रूस-यूक्रेन युद्ध ने हर देश को अपना अनाज भंडार और रणनीतिक महत्व की दूसरी चीजें ताला लगाकर रखने के लिए मजबूर कर दिया है।

इससे बड़ी समस्या द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौतों (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स) और बहुपक्षीय व्यापारिक गुटों की है, जो दुनिया को अधिक से अधिक खुला बाजार बनाने के सपने का सत्यानाश करने पर उतारू हैं। ‘मंत्रियों का सम्मेलन’ यानी विश्व व्यापार संगठन का दिमाग इस माहौल में ही गतिरोध तोड़ने की कोशिशों में जुटा है।रविवार 12 जून को जिनेवा में शुरू हुआ यह सम्मेलन 15 जून, बुधवार को संपन्न होगा। होना तो इसको सन 2020 में था, कजाखस्तान में। लेकिन महामारी के असर में इसे टाल दिया गया। पिछला मंत्री सम्मेलन 2017 में हुआ था, जब डॉनल्ड ट्रंप की पहल पर अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध ने आकार लेना शुरू ही किया था।

नाकारा होने का प्रतीक

विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) की नियमावली में हर दो साल पर मंत्रियों का सम्मेलन कराने की बात मौजूद है। इस बार इसमें लगे पांच साल के समय के पीछे महामारी जरूर है, लेकिन एक अर्थ में यह डब्लूटीओ के निस्तेज या नाकारा होते जाने का प्रतीक भी है। इसके पहले एक बार और इस सम्मेलन में देरी हुई थी। 2005 के बाद मंत्रियों का सम्मेलन 2009 में ही हो पाया था। वह दौर भी इस मायने में प्रतीकात्मक था कि अमेरिका दुनिया में खुले व्यापार का फायदा तो उठाना चाहता था लेकिन इससे जो थोड़े-बहुत नुकसान उसे हो सकते थे, उन्हें झेलने को बिल्कुल तैयार नहीं था। वह समय ‘माय जॉब इज बैंगलोर्ड’ वाली टी-शर्ट्स का था। ‘अमेरिकियों का काम कहीं भारत न लूट ले!’

वह सिलसिला आज भी जारी है। डब्लूटीओ की बर्बादी के पीछे सबसे बड़ा हाथ अमेरिका का ही है, उसके बाद दुनिया की नंबर दो आर्थिक शक्ति चीन का। सोवियत संघ के पतन के बाद जब दो ध्रुवों में बंटी रहने की नियति से दुनिया का पीछा छूटा, तो जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टैरिफ्स (गैट) के तहत जारी विश्व व्यापार वार्ता 1995 में एक ऐसा ग्लोबल व्यापारिक संगठन बनाने के नतीजे पर पहुंची, जहां दुनिया के सारे व्यापारिक झगड़े निपटाए जा सकें और तमाम गैर-व्यापारिक पूर्वाग्रहों तथा चुंगी-महसूल की बंदिशों को घटाकर धरती को एक ग्लोबल गांव जैसी शक्ल दी जा सके।

इसके साथ लोगों की ढेरों आशंकाएं भी जुड़ी थीं कि ऐसा गांव कहीं बनने के साथ ही ताकतवर मुल्कों की चौधराहट का शिकार न हो जाए। लेकिन विचित्र बात है कि डब्लूटीओ के तहत झगड़े सुलझाने का जो मेकेनिज्म बनाया गया था, उसे सबसे बड़े चौधरी ने ही खा लिया। अमेरिका ने विवाद निपटारे के पहले चरण ‘विशेषज्ञ समिति’ में कोई नई नियुक्ति नहीं होने दी और इस संगठन की विवाद निवारण क्षमता कभी बन ही नहीं पाई। डब्लूटीओ बनने के बाद 2001 में विश्व व्यापार वार्ता का जो दोहा राउंड शुरू हुआ, वह कदम-कदम पर आने वाली अड़चनों के चलते एक भी ठोस फैसला नहीं ले पाया और 2015 में उसे बिना कुछ किए-धरे खत्म मान लिया गया।

संगठन बनते ही वार्ता ठप

इस तरह डब्लूटीओ बनने के बाद से विश्व व्यापार वार्ता के नाम पर सन्नाटा ही खिंचा हुआ है। अलबत्ता व्यापार के भूमंडलीकरण का यह फायदा अमेरिका को जरूर मिला है कि संसार के सबसे पिछड़े देशों के सबसे पिछड़े इलाकों के लोग भी सुबह उठकर सबसे पहले इनके-उनके फेसबुक प्रोफाइल देखते हैं, फिर गूगल करके पता लगाते हैं कि तीन-चार जेनरेशन पुराना ऐपल का फोन किसी साइट पर अमेजन से भी सस्ता मिल पाएगा या नहीं। खुले विश्व बाजार में ये अमेरिकी ब्रैंड इस तरह घर-घर पहुंच गए हैं कि किसी को बाहरी नहीं लगते। इस बार के मंत्री सम्मेलन में कुछ बातें ऐसी भी होनी हैं, जिनसे इनके हितों पर सीधी चोट पड़ सकती है।

डब्लूटीओ के चमक खोने में दूसरी बड़ी भूमिका चीन की है, जिसने दुनिया की सबसे बड़ी व्यापारिक शक्ति बनकर उभरने में इस मंच का भरपूर फायदा उठाया है। मेड इन चाइना सामान वैसे तो सस्ते होने की वजह से हर जगह छाए हुए हैं, लेकिन उनका ज्यादा दखल इंटरमीडिएट गुड्स के रूप में बना है। यानी ऐसी चीजें, जो किसी और देश की मोहर लगाकर बिकती हैं लेकिन उनमें आधे से ज्यादा हिस्सा चीनी सामानों का होता है, और कई बार पूरी चीज ही चीन की होती है। सस्ते श्रम और कच्चे माल का सहज उपलब्ध होना चीन के इस व्यापारिक वर्चस्व की वजह बना है, लेकिन साथ में वह ऐसे कई नियमों का उल्लंघन भी करता है, जो व्यापार में ‘लेवल प्लेयिंग फील्ड’ के लिए जरूरी होते हैं।


इसके अलावा बहुत सारे गैर-व्यापारिक पहलू भी हैं। मसलन, लिथुआनिया का कोई सामान अब चीन में नहीं बिकता, क्योंकि कुछ साल पहले इस छोटे से यूरोपीय मुल्क ने ताइवान के साथ राजनयिक संबंध बना लिए हैं।जिनेवा में जारी सम्मेलन में सबसे पहले तो कोविड से जुड़ी दवाओं और वैक्सीनों को पेटेंट से मुक्त करने पर बात होनी है, क्योंकि इस महामारी से पीछा छुड़ाए बिना दुनिया का व्यापार पटरी पर नहीं आ सकता। दूसरा मामला यूक्रेन का गेहूं और सूरजमुखी फंस जाने के कारण दुनिया पर मंडरा रहे खाद्य संकट का है।


ग्लोबल ई-कॉमर्स पर टैक्स


बाकी देश अपना सरप्लस अनाज बाजार में लाएं, उसे दबाकर बैठ न जाएं, जैसे विकसित देश वैक्सीनें दबाकर बैठ गए। कृषि उपजों और मछली पकड़ने पर दी जा रही सब्सिडी भी इस सम्मेलन का एक बड़ा मुद्दा है, हालांकि यह डब्लूटीओ के गठन के समय से ही चला आ रहा है। विकसित देश चाहते हैं कि भारत अपने किसानों और मछुआरों को जो थोड़ी-बहुत सरकारी राहत दे रहा है, उसमें तीखी कटौती करे, ताकि उनके खाद्य पदार्थ यहां और ज्यादा यहां बिक सके।

सबसे बड़ा मामला सीमाओं के आर-पार ई-कॉमर्स पर किसी तरह के टैक्स पर पिछले 25 वर्षों से लगी रोक की समय सीमा समाप्त होने का है। यह टैक्स एक बार शुरू हो गया तो हमें पहली बार एसएमएस और संभवतः सोशल मीडिया में दिखने वाली विदेशी पोस्टों के भी पैसे देने पड़ेंगे। अभी सोशल मीडिया कंपनियां सिर्फ अपनी आय पर टैक्स देती हैं और खासकर यूरोप में विज्ञापनों से होने वाली आय में कुछ साझा करती हैं। सीमा के आरपार सेवाओं की बिक्री पर जो टैक्स लगाए जाते हैं, ई-कॉमर्स अभी उनसे पूरी तरह मुक्त है। देखें, डब्लूटीओ इसपर क्या फैसला लेता है।

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