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एक घातक पहल

रिटेल में एफडीआइ के फैसले पर शशांक द्विवेदी के विचार दैनिक जागरण में १ /१० /२०१२ को प्रकाशित पिछले दिनों सरकार ने खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) के लिए मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसद तक और सिंगल ब्रांड…

एक घातक पहल
रिटेल में एफडीआइ के फैसले पर शशांक द्विवेदी के विचार दैनिक जागरण में १ /१० /२०१२ को प्रकाशित पिछले दिनों सरकार ने खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) के लिए मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसद तक और सिंगल ब्रांड रिटेल में 100 प्रतिशत तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी, लेकिन इस निर्णय का देश के दीर्घकालिक विकास में नकारात्मक असर पड़ेगा। इससे एक तरफ टेस्को और वालमार्ट जैसी रिटेल चेन भारत में आएंगी, वहीं एडिडास, गुस्सी, हर्मेस, कोस्टा कॉफी जैसे ब्रांड अपने कारोबार के पूरे मालिक होंगे। रिटेल सेक्टर में निवेश की दृष्टि से भारत दुनिया का सबसे आकर्षक बाजार है। भारतीय खुदरा बाजार देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 10 फीसद है। रोजगार देने के मामले में कृषि के बाद यह दूसरे नंबर पर है। सकल रोजगार का करीब आठ फीसद खुदरा कारोबार क्षेत्र से आता है। मल्टी ब्रांड खुदरा कारोबार में एफडीआइ को मंजूरी देने का फैसला घरेलू खुदरा कारोबार को पूंजीवाद के शिंकजे में लेने का एक जरिया है। यह देसी खुदरा कारोबारियों के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा कर देगा और किसानों के लिए भी घातक साबित होगा। वैश्विक रिटेलरों के एक बार बाजार पर काबिज हो जाने पर वे मनमाने तरीके से बाजार चलाएंगे। नतीजा लोगों को हर चीज की ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी। खुदरा कारोबार के मौजूदा ढांचे में बिचौलियों का दबदबा है। ग्राहक उत्पाद के लिए जो कीमत अदा करता है, उसका सिर्फ एक तिहाई ही किसान को मिलता है और बाकी फायदा बिचौलिये कमाते हैं। वैश्विक दिग्गज कंपनियों के लिए ब्रांड बेसडर बिचौलियों का काम करते हैं, जो कंपनियों से करोड़ों रुपये लेते हैं। इसके अलावा बिजली खपत, गोदाम और ट्रांसपोर्ट के उनके खर्चे भी बहुत ज्यादा होते हैं। देसी बिचौलिये न सिर्फ अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं, बल्कि सामाजिक ढांचे को भी दुरुस्त रखने में मदद करते हैं। छोटे कारोबारियों पर जो दो-तिहाई मुनाफा बनाने का आरोप लगाया जा रहा है वह बेबुनियाद है। 2005 से देश में बड़े कारोबारी घराने भी खुदरा कारोबार में शामिल हो गए हैं। उनके उत्पादों के भाव बाजार भाव के बराबर ही हैं या कहीं-कहींउनसे ज्यादा भी हैं। इस लिहाज से दो-तिहाई मुनाफे वाली बात उन पर ज्यादा लागू होती है। सरकार का कहना है कि आने वाले दो-तीन सालों में देश में एक करोड़ नई नौकरियां आएंगी। किसानों की आमदनी बढ़ेगी। लोगों को सस्ता सामान मिलेगा, लेकिन सवाल यह है कि जब सरकार के पास इतनी समस्याओं का हल रिटेल में एफडीआइ ही था तो इसका इतना विरोध क्यों हो रहा है? सोचने वाली बात है कि वालमार्ट का न्यूयॉर्क में अभी तक एक भी स्टोर नहींहै और उसका वहां भी विरोध हो रहा है। हमें यह देखना होगा कि इस क्षेत्र से करोड़ों लोगों की आजीविका भी जुड़ी है। अरबों डॉलर का कारोबार करने वाली वॉलमार्ट जैसी कंपनियां बड़े बैकअप प्लान के साथ भारत आएंगी। वे शुरू में सस्ता माल बेच सकती हैं, लेकिन अपनी अग्रेसिव मार्केटिंग से बाजार पर कब्जा करने के बाद उनकी मनमानी ही चलेगी। ऐसा नहीं है कि इन स्टोरों से आसपास की दुकानों पर असर न पड़ा हो। मुंबई का एक अध्ययन बताता है कि शॉपिंग मॉल खुलने से आसपास की दुकानें बंद हो गई। दुकानदारों के अलावा अभी करोड़ों लोग रिटेल कारोबार में बिचौलिये का काम करते हैं। ऐसे लोगों का रोजगार छिन जाएगा, क्योंकि बड़े स्टोर सीधे किसानों से ही खरीददारी करेंगे। मतलब छह-सात बिचौलियों की जगह एक बड़ा बिचौलिया आ जाएगा, जो कहीं ज्यादा मुनाफा लेगा। सस्ते सामान के चक्कर में ऐसे मल्टी स्टोर चीनी सामानों को प्राथमिकता देंगे। इससे भारत का घरेलू और हस्तशिल्प उद्योग खत्म हो सकता है। हालांकि 30 फीसद सामान देश के स्थानीय छोटे उत्पादकों से खरीदना होगा, लेकिन बड़ी कंपनियों के लिए ऐसे प्रावधानों से किनारा करना ज्यादा मुश्किल नहींहोगा। जहां तक उपभोक्ताओं को सस्ते उत्पाद मिलने की बात है, वे सस्ता सामान कब तक खरीद पाएंगे। इसे लेकर आशंकाएं कम नहीं हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं) रिटेल में एफडीआइ के फैसले पर शशांक द्विवेदी के विचार एक घातक पहल article link http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-10-01&pageno=8#id=111751351972664856_49_2012-10-01
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