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एक काला छेद, जो आकाशगंगा की धुरी है

चंद्रभूषण इवेंट होराइजन टेलीस्कोप परियोजना के तहत वैज्ञानिकों ने 12 मई 2022, दिन वृहस्पतिवार को दुनिया में छह जगहों पर एक साथ आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि आकाशगंगा के केंद्र में लगभग 40 लाख सूर्यों जितना वजनी एक…

एक काला छेद, जो आकाशगंगा की धुरी है

चंद्रभूषण

इवेंट होराइजन टेलीस्कोप परियोजना के तहत वैज्ञानिकों ने 12 मई 2022, दिन वृहस्पतिवार को दुनिया में छह जगहों पर एक साथ आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि आकाशगंगा के केंद्र में लगभग 40 लाख सूर्यों जितना वजनी एक ब्लैक होल है। इससे एक बड़ी दुविधा दूर हुई है, हालांकि इस ब्लैक होल की जो तस्वीरें उन्होंने दिखाईं वे तकरीबन वैसी ही हैं जैसी अब से तीन साल पहले, सन 2019 में पहली बार सामने आई बहुत दूर के एक ब्लैक होल की थीं। सवाल-जवाब के क्रम में वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि दोनों तस्वीरों में कुछ बुनियादी फर्क हैं और दोनों की वैज्ञानिक भूमिका भी बहुत अलग होने जा रही है।

2019 वाली तस्वीरों का हमारी अपनी आकाशगंगा से कोई संबंध नहीं था। पृथ्वी से साढ़े पांच करोड़ प्रकाशवर्ष दूर स्थित मेसियर-87 गैलेक्सी के केंद्र में मौजूद साढ़े छह अरब सूर्यों जितने वजनी उस ब्लैक होल का प्रेक्षण वैज्ञानिकों के लिए एक स्थिर चीज की तस्वीर उतारने जैसा था, जबकि हमारी आकाशगंगा में यह काम उनके लिए पल-बल बदलते परिवेश से कोई स्थायी अर्थ निकालने जितना कठिन था। दोनों ही प्रॉजेक्ट इवेंट होराइजन टेलीस्कोप परियोजना के तहत उठाए गए थे और दोनों पर बुनियादी काम 2017 में पूरा कर लिया गया था। लेकिन दूर वाला, यानी एम-87 से जुड़े आंकड़ों के विश्लेषण का काम दो साल में पूरा हो गया, जबकि हमारी अपनी आकाशगंगा के केंद्र पर किए गए काम की डेटा एनालिसिस में पांच साल लग गए।

ई एच टी प्रॉजेक्ट

पृथ्वी पर अलग-अलग जगह लगाए गए इन्फ्रारेड टेलीस्कोप इस परियोजना में कुछ इस तरह काम करते हैं कि पूरी पृथ्वी का उपयोग एक अकेले दूरदर्शी की तरह कर लिया जाता है। जो इन्फ्रारेड तकनीक नाइटविजन ग्लासेज में काम आती है, उसी के ज्यादा नफीस रूप का इस्तेमाल अंतरिक्ष की धुंधली चीजों को देखने में किया जाता है। बहरहाल, इवेंट होराइजन टेलीस्कोप परियोजना ने हमारे लिए जो कमाल किया है, अभी उसी पर बात करते हैं। जिस तरह हमारी पृथ्वी सूरज का चक्कर लगाती है, उसी तरह क्या हमारा सूरज भी किसी चीज का चक्कर लगाता है? इस सवाल का जवाब ‘हां’ में बहुत पहले दिया जा चुका है। लेकिन सूरज का घूमना पृथ्वी के घूमने से बहुत अलग है।

पृथ्वी आकाश में अकेले ही अपनी लगभग गोलाकार कक्षा में घूम रही है, मगर सूरज की कक्षा इतनी सरल नहीं है। हमारी आकाशगंगा एक स्पाइरल गैलेक्सी है और इसकी ओरियन भुजा के बीच में रहते हुए हमारा सूर्य घड़ी की सुइयों की दिशा में इसके केंद्र की परिक्रमा कर रहा है। यह परिक्रमा लगभग 24 करोड़ वर्षों में पूरी होती है। आकाशगंगा का केंद्र धनुराशि में स्थित है और इसे ‘सैजिटेरियस ए स्टार’ नाम दिया गया है। जिस विशाल रास्ते पर सूर्य इसका चक्कर लगा रहा है, उसकी ठीक-ठीक आकृति का भी पता लगाया जाना अभी बाकी है, लेकिन यह तो ब्यौरों का मामला है।

जो चीज सैकड़ों अरब तारों वाली आकाशगंगा को अपने इर्दगिर्द घुमा रही है, उसे ‘सैजिटेरियस ए स्टार’ नाम देना तो ठीक है, पर यह आखिर है क्या, यह सवाल लंबे समय से दुनिया में बना हुआ था। रेडियो तरंगें छोड़ने वाला कोई अति सघन पिंड आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद है, ऐसा प्रेक्षण 1930 के दशक में ही लिया जा चुका था। लेकिन इसके वर्गीकरण को लेकर हाल-हाल तक अटकलबाजी चलती रही। अच्छे से अच्छे टेलीस्कोप के जरिये भी इस इलाके के ब्योरों को सीधे देख पाना असंभव है, क्योंकि आकाशगंगा के बीच वाले हिस्से, सेंट्रल बल्ज में चकाचौंध बहुत ज्यादा है। धूल और गैस के बादल इसके बीचोबीच पड़ने वाले छह हजार प्रकाशवर्ष लंबाई, चौड़ाई और मोटाई वाले एक इलाके को लगभग अपारदर्शी बना देते हैं।

इमेजरी का इम्तहान

दोहरा दें कि तीन लाख किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से चलने वाला प्रकाश एक साल के अंदर जितनी दूरी चलता है, उसे प्रकाशवर्ष कहते हैं। इस छह हजार प्रकाशवर्ष वाले इलाके की सघन धुंध के भीतर जाने पर तारों की सघनता बढ़ने लगती है। इसके बिल्कुल मध्य के एक हजारवें हिस्से में एक करोड़ से ज्यादा तारे मौजूद हैं और उनकी रफ्तार भी हमारे सूरज से सौ-डेढ़ सौ गुनी तक दर्ज की गई है। धुंध और चकाचौंध के इस खेल में शामिल होकर ही इवेंट होराइजन टेलीस्कोप परियोजना को यह पता लगाना था कि आकाशगंगा की धुरी कहां है, और उसकी शक्ल कैसी है। इसके लिए उसने एक बहुत छोटे इलाके को चुना और अलग-अलग देशों में लगे कई इन्फ्रारेड टेलीस्कोपों से उसकी ढेरों तस्वीरें उतार डालीं।

ध्यान रहे, ब्लैक होल भौतिकी का एक चरम बिंदु है। अभी पचास-पचपन साल पहले तक शीर्ष वैज्ञानिकों को भी यह सिर्फ एक ख्याली चीज लगती थी। खुद आइंस्टाइन को भी इसके होने को लेकर सख्त एतराज था। भारतीय खगोलविज्ञानी चंद्रशेखर ने फिजिकल सिंगुलरिटी के रूप में ब्लैक होल का गणित पेश किया तो आइंस्टाइन ने कहा कि एक बिंदु पर पहुंचकर गुरुत्व के रूप में सिर्फ एक ही बल बचे, यह संभव ही नहीं है। किसी अवधारणात्मक गलती से ऐसा नतीजा आ रहा होगा। फिर बहुत सारे प्रेक्षणों से ब्लैक होल जैसी ही किसी चीज की मौजूदगी का अंदाजा मिलने लगा।

बड़े से बड़े तारों से भी बहुत ज्यादा भारी कोई ऐसी चीज, जो किसी भी सूरत में, धुंधली से धुंधली शक्ल में भी नजर नहीं आती। पिछले तीन वर्षों में डेटा एनालिसिस और फेक कलर्स के जरिये बनाई गई जो दो तस्वीरें हमने देखी हैं, वे भी ब्लैक होल की नहीं बल्कि उसके घटना क्षितिज (इवेंट होराइजन) की हैं। ऐसी जगह, जिसके बाहर सब कुछ दिखाई देता है, लेकिन जिसके भीतर कुछ भी दिखाई नहीं देता। जिन दो ब्लैक होलों के घटना क्षितिज की तस्वीरें अब तक उतारी जा सकी हैं, उनमें हमारी आकाशगंगा के सुपरमैसिव ब्लैक होल के मामले में यह बुध की कक्षा जितना है।

लगभग 6 करोड़ किलोमीटर की त्रिज्या वाला एक ऐसा घेरा, जिसके भीतर के इलाके के बारे में कोई सूचना किसी तक नहीं पहुंच सकती। अगर आपको लगता हो कि इस चमकीली अंगूठी के बीच वाली जगह से दूसरी तरफ का आकाश, वहां मौजूद तारे किसी अति शक्तिशाली टेलीस्कोप से अभी न सही, कभी तो देखे जाएंगे, तो यह आपकी भूल है। वह जगह खाली दिखती है, पर उसके आर-पार कुछ देखा नहीं जा सकता। और 2019 में दिखाए गए एम-87 वाले सुपरमैसिव ब्लैक होल की तो बात ही क्या करनी। उसका घटना क्षितिज पृथ्वी की कक्षा का 350 गुना है। हमारा पूरा सौरमंडल उसके भीतर से साफ गुजर जाएगा, लेकिन कहीं पहुंचेगा नहीं।

यह तिलस्मी चीज

ब्लैक होल में चले जाने के बाद कोई चीज कहां जाती है, यह नहीं जाना जा सकता, अलबत्ता वहां पहुंचने के क्रम में समय लंबा होते-होते अंतहीन हो जाता है, ऐसा हिसाब जरूर लगाया गया है। ब्रह्मांड के कई अद्भुत प्रेक्षणों का कारण खोजते हुए वैज्ञानिक प्रायः ब्लैक होल तक ही पहुंचते रहे हैं। यही वजह है कि लोगबाग इन रहस्यमय पिंडों को इतनी घरेलू चीज मान बैठे हैं कि ये हॉलिवुड का प्रिय विषय बन गए हैं। लेकिन यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हमारी आकाशगंगा के केंद्र में कोई ब्लैक होल ही है, यह पक्के तौर पर बोल पाने की स्थिति में हाल-हाल तक कोई नहीं था।

इससे जुड़ी खोजबीन को लेकर 2020 में जर्मन और अमेरिकी खगोलशास्त्रियों राइनहार्ड गेंजेल और एंड्रिया गेज को भौतिकी का नोबेल मिला तो इसके साइटेशन में भी ब्लैक होल नहीं, ‘आकाशगंगा के केंद्र में मौजूद सुपरमैसिव ऑब्जेक्ट’ ही दर्ज किया गया था। इस जगह के दावेदार कुछ दूसरे पिंड भी थे। एक प्रस्थापना थी कि अज्ञात डार्क मैटर का कोई बहुत बड़ा लोंदा हमारी आकाशगंगा के केंद्र में पड़ा हुआ है, क्योंकि अन्य आकाशगंगाओं के केंद्र में मौजूद सुपरमैसिव ब्लैक होल जिस तरह एक्स-रे जेट छोड़ते हैं, वैसा कुछ हमारे यहां देखने में नहीं आता। दूसरी दावेदारी बहुत तेजी से घूमने वाले पल्सरों (पल्सेटिंग स्टार्स) की थी।

गनीमत है कि इवेंट होराइजन टेलीस्कोप परियोजना द्वारा जारी इन तस्वीरों से यह साफ हो गया कि केंद्र में मौजूद सुपरमैसिव ब्लैक होल के मामले में हमारी अपनी आकाशगंगा का हाल भी लाखों-करोड़ों अन्य गैलेक्सियों जैसा ही है। दूर की गैलेक्सियों के केंद्र में मौजूद ब्लैक होलों को लेकर यहां से आगे जो भी नई बातें हमें पता चलेंगी, उन्हें हम अपनी आकाशगंगा के केंद्र पर लागू करेंगे। और जो बारीक ब्यौरे हमें नजदीक से पता चलेंगे, उनका इस्तेमाल दूर के सुपरमैसिव ब्लैक होलों के अध्ययन में हो सकेगा। ब्रह्मांड की इकाई गैलेक्सी है और हर गैलेक्सी के केंद्र में एक बहुत बड़ा ब्लैक होल है। इसमें जुड़ने वाली हर जानकारी का इस्तेमाल ब्रह्मांड की समझ बढ़ाने में किया जाएगा।

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