Skip to content
Special Articles

ऊंची डिग्री के बाद भी मिलता नहीं रोजगार

जयंतीलाल भंडारी ॥ आर्थिक सुधारों की तरह ही सरकार को अब शैक्षणिक सुधार की डगर पर भी आगे बढ़ने की जरूरत है। बीते 24 सितंबर को दिल्ली में अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) द्वारा आय…

ऊंची डिग्री के बाद भी मिलता नहीं रोजगार

जयंतीलाल भंडारी ॥

आर्थिक सुधारों की तरह ही सरकार को अब शैक्षणिक सुधार की डगर पर भी आगे बढ़ने की जरूरत है। बीते 24 सितंबर को दिल्ली में अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) और भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) द्वारा आयोजित कार्यशाला में इस बात को लेकर चिंता जताई गई कि विश्व के 200 शीर्ष गुणवत्ता वाले शिक्षण संस्थानों की सूची में एक भी भारतीय शैक्षणिक संस्थान शामिल नहीं है।

तकनीकी शिक्षा में 22 लाख छात्रों के साथ भारत अमेरिका के बाद विश्व का दूसरे नंबर का देश बन गया है, लेकिन देश में 12 हजार तकनीकी शिक्षा संस्थान ऐसे लोग चला रहे हैं जिनका अकादमिक जगत से कोई वास्ता नहीं है। हाल में प्रकाशित एमबीए युनिवर्स डॉट कॉम-मेरी ट्रैक इंप्लॉयबिलिटी स्टडी के सर्वे के नतीजों से पता चला है कि एमबीए कर रहे छात्रों में से महज 21 फीसदी ही नौकरी पाने लायक हैं। 29 प्रमुख शहरों के 100 बिजनेस स्कूलों पर आधारित इस सर्वे में शामिल छात्रों का स्तर लगभग सारी ही कसौटियों पर असंतोषजनक पाया गया है।मेट्रोमैन ई. श्रीधरन द्वारा इंजीनियरिंग छात्रों पर किए गए सर्वे के मुताबिक महज 12 फीसदी इंजीनियरिंग छात्रों को ही कोई काम सौंपा जा सकता है। देश के विभिन्न आईआईएम, आईआईटी और ट्रिपल आईटी कॉलेजों के कुछ छात्रों को तो करोड़ रुपए से भी ऊंचे वेतन वाले पैकेज मिल रहे हैं लेकिन अधिकांश कॉलेजों की पहचान प्लेसमेंट संबंधी निराशा से ही बन रही है। ख्यातिप्राप्त स्टाफिंग फर्म मैनपॉवर गु्रप ने हाल की अपनी एक स्टडी रिपोर्ट में कहा है कि पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष टैलेंटेड प्रफेशनल्स ज्यादा नहीं मिल रहे हैं। सिर्फ एक साल में उनमें करीब 19 फीसदी की कमी आई है। इन दिनों भारतीय प्रफेशनल्स की आवश्यकता बताने वाली जो भी महत्वपूर्ण रिपोर्टें जारी हो रही हैं, उनमें बताया जा रहा है कि भारत के मैनेजमेंट, इंजीनियरिंग, मेडिकल, लॉ, अकाउंटिंग आदि में प्रशिक्षित युवाओं की मांग बढ़ रही है। लेकिन इस मांग के अनुरूप पेशेवर छात्र भारत के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से निकल नहीं रहे हैं।

युवा संपदा
ऐसे में यदि भारत की नई पीढ़ी नई वैश्विक जरूरतों के मुताबिक पेशेवर बनकर तैयार हो जाए तो वह भविष्य में देश की बहुत बड़ी संपदा साबित होगी। चाहे मंदी का मुकाबला करना हो या विकास को गति देना हो, हर अभियान के लिए पेशेवर महत्वपूर्ण हैं। माना जा रहा है कि दुनिया में आबादी का स्वरूप इस तरह बदल रहा है कि भारत की बढ़ी हुई युवा आबादी मानव संसाधन के परिप्रेक्ष्य में आर्थिक वरदान सिद्ध हो सकती है। सर्वविदित है कि भारत अभी दुनिया की सबसे अधिक युवा आबादी वाला देश है। दुनिया भारत को प्रतिभाओं का गढ़़ मान रही हैै। ये प्रतिभाएं अपने सस्ते और गुणवत्तापूर्ण काम से एक ओर आउटसोर्सिंग के जरिये नई कमाई का ढेर लगा सकती हैं, दूसरी ओर विदेशों में जाकर डॉलर, यूरो और येन की कमाई देश को भेज सकती हैं। ऐसे में अब हमें देश की नई आबादी को मानव संसाधन (ह्यूूमन रिसोर्स) बनाने और उसकी मुट्ठियों में रोजगार देने के लिए ठोस प्रयास करने होंगे। हमें उन कमियों की तरफ ध्यान देना होगा जिनके कारण अधिकांश युवा पेशेवर के रूप में अपनी पहचान नहीं बना पा रहे हैं।

कुकुरमुत्तों की तरह खुल रहे प्रफेशनल कॉलेजों में गुणवत्ता की भारी कमी है। ऐसे अधिकांश कॉलेजों में छात्रों को बिना पर्याप्त प्रैक्टिकल कराए और बिना पर्याप्त तकनीकी ज्ञान के ही ग्रेजुएट बना दिया जा रहा है। देश के अधिकांश विश्वविद्यालयों और कॉलेजों का ध्यान ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट बनाने पर ही केंद्रित है। वे छात्रों के ओवरऑल डेवलपमेंट के लिए कुछ खास नहीं कर रहे हैं। तकनीकी जरूरतों के लिए देश में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थाओं (आईटीआई) से प्रशिक्षित बहुत अधिक युवाओं की जरूरत है लेकिन उनकी पूर्ति कम हो रही है। उनकी तुलना में ऐसे इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स जरूरत से ज्यादा तैयार हो रहे हैं जो तकनीकी कार्यों के लिए सर्वथा अक्षम हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि सरकार, सक्षम प्राधिकरण और संबंधित संगठन इस बात को लेकर संजीदा नहीं हैं।

देश के उद्योग-व्यवसाय में तकनीकी कौशल वाले प्रशिक्षित युवाओं की भारी कमी बनी हुई है। भारत की कुल युवा आबादी में 17 फीसदी तकनीकी कौशल वाले किसी पाठ्यक्रम में शिक्षित-प्रशिक्षित हैं, जबकि चीन में उनका हिस्सा 91 प्रतिशत है। सरकार ने अगले दस साल में 50 करोड़ लोगों के कौशल विकास (स्किल डेवलपमेंट) का जो बड़ा लक्ष्य रखा है, उसके लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी बेहद अहम है। ऊंची डिग्रियों की पढ़ाई कराने वाले कॉलेजों की गुणवत्ता पर सरकार को पूरा ध्यान देना होगा। सरकार को यह हमेशा याद रखना चाहिए कि गुणवत्तापूर्ण उच्च डिग्रियों की चाह में प्रतिवर्ष करीब छह लाख भारतीय विद्यार्थी विदेश पढ़ने जाते हैं और इन पर हर साल एक लाख करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा खर्च हो रही है। ऐसे में यदि उद्योग जगत के लोग आगे आकर तकनीकी और प्रबंधकीय संस्थान प्रारंभ करें तो देश में तकनीकी एवं प्रबंधकीय शिक्षा का स्तर बढ़ सकता है। उद्योग जगत के द्वारा गुणवत्तापूर्ण संस्थान विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा आईआईटी या भारतीय विज्ञान संस्थान जैसी शैक्षणिक संस्थाओं के साथ मिलकर भी प्रारंभ किए जा सकते हैं।
कॉर्पोरेट गुरुकुल
ऐसे प्रयासों के अलावा देश के कॉलेजों में डिग्री बांटने के साथ-साथ कम्युनिकेशन स्किल्स, वर्बल एबिलिटी, एनालिटिकल स्किल्स, जनरल अवेयरनेस और अच्छी अंग्रेजी जैसी पेशेवर कुशलताएं भी विकसित करने के अधिकतम प्रयास किए जाने जरूरी हैं। छात्रों को भी चाहिए कि वे कॉलेज को कॉरपोरेट गुरुकुल मानते हुए उन स्किल डिवेलपमेंट फॉर्म्युलों को सीखें, जिनसे उनका करियर चमकीला बने। वस्तुत: अब देश की नई पीढ़ी को नए आर्थिक दौर में अधिक उत्पादक तथा अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए कौशल प्रशिक्षण और पेशेवर कुशलताओं के मंत्रों से पल्लवित-पुष्पित किया जाना चाहिए।

Continue reading

Special Articles

All in topic
एलपीजी का सशक्त विकल्प है बायोगैस
Special Articles

एलपीजी का सशक्त विकल्प है बायोगैस

डॉ. शशांक द्विवेदी परियोजना प्रबंधक , टीएसएससी (कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय , भारत सरकार) भारत आज ऊर्जा परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रहा है। एक ओर प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी योजनाओं ने करोड़ों घरों तक…

एआई के युग में इंसान को आगे रखने वाली क्षमताएँ
Special Articles

एआई के युग में इंसान को आगे रखने वाली क्षमताएँ

आज हम ऐसे युग में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) हमारे जीवन, कामकाज और सोचने के तरीके को बदल रही है। एआई आज हर क्षेत्र—शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, बैंकिंग, उद्योग, मीडिया—में अपनी…

इतनी बिजली क्यों खाती है एआई
Special Articles

इतनी बिजली क्यों खाती है एआई

चंद्रभूषण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और क्लाउड कंप्यूटिंग की चर्चा अभी दुनिया में सबसे ज्यादा बिजली खाने वाली तकनीकों की तरह हो रही है। सन 2022 में लगाए गए हिसाब के मुताबिक ये दोनों उस समय दुनिया की दो फीसदी बिजली हजम कर रही…