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गूगल की खास विशेषता

याददाश्त के मामले में हर इंसान एक-दूसरे से अलग होता है। कुछ लोगों को ऐतिहासिक तारीखें सारे ब्यौरों के साथ याद रहती हैं, पर कई ऐसे भी होते हैं जिनके लिए रोजमर्रा की चीजें याद रखना ही एक बड़ी चुनौती है। अक्सर ऐसा होता है क…

गूगल की खास विशेषता

याददाश्त के मामले में हर इंसान एक-दूसरे से अलग होता है। कुछ लोगों को ऐतिहासिक तारीखें सारे ब्यौरों के साथ याद रहती हैं, पर कई ऐसे भी होते हैं जिनके लिए रोजमर्रा की चीजें याद रखना ही एक बड़ी चुनौती है। अक्सर ऐसा होता है कि वे कोई चीज कहीं रखकर ऐसे भूल जाते हैं कि उसे खोजना लगभग नामुमकिन हो जाता है। कई दफा ऐसा भी होता है कि जिस चश्मे की खोज में सारा घर उलट-पुलट दिया हो, वह हमारी नाक पर ही मौजूद हो। जरूरी नहीं कि याददाश्त की यह कमजोरी किसी बीमारी का संकेत हो। ऐसा हमारी अत्यधिक व्यस्तता की वजह से भी हो सकता है। ऐसे में हम कई बार उन चीजों को भी ढूंढने में आसपास मौजूद लोगों की मदद लेते हैं, जिन्हें हमने काफी सहेज कर रखा होता है।
ऐसे लोगों को यह जानकार तसल्ली होगी कि साइंटिस्टों ने उनकी समस्या का एक समाधान खोज लिया है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ वर्जिनिया के दो साइंटिस्टों ने एक ऐसा सिस्टम तैयार किया है जो घरेलू सामानों का हिसाब रख कर बता सकता है कि कौन सा सामान कहां रखा गया है। यह असल में गूगल जैसा एक घरेलू सर्च इंजन है जिसमें कई सेंसरों को कंप्यूटर के एक खास सॉफ्टवेयर से जोड़ा गया है। कैमरे के जरिए चीजों की मौजूदगी दर्ज करने वाला काइनेट नामक यह सिस्टम इस सिद्धांत पर काम करता है कि चीजें तभी अपनी जगह बदलती हैं जब कोई उन्हें वहां से हटाता है। इस सिस्टम को चलाने वाले सॉफ्टवेयर में वे बेसिक बातें पहले से दर्ज हैं जिनसे चीजों को ढूंढने में आसानी होती है। जैसे चाय-कॉफी का प्याला डायनिंग टेबल, पढ़ाई की मेज या किचन के सिंक में खोजना होगा, न कि बाथरूम में।

जब सिस्टम यह तय नहीं कर पा रहा हो कि कोई चीज कहां हो सकती है, तो यह बेसिक समझ उसे उन चीजों के मिलने की संभावित जगहों के बारे में अलर्ट करेगी। यह सचमुच खुशी की बात है कि अटॉमिक एनर्जी और स्पेस रिसर्च जैसे बड़े-बड़े मोर्चे लेने के साथ साइंटिस्टों की नजर जिंदगी आसान बनाने वाले उन नुस्खों पर भी है जिन्हें घर का वैद्य जैसी कटिगरी में रखा जा सकता है। लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि यह उपाय याददाश्त के मामले में भी कहीं हमें उसी तरह कमजोर न बना दे, जैसे बच्चे मैथ्स के बेसिक सवालों को हल करने के लिए कैलकुलेटर पर निर्भर हो गए हैं।
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