सवाल उठता है कि आखिर फीस बढ़ाने का क्या औचित्य है? इसके पीछे सबसे बड़ा तर्क यही दिया जाता है कि संस्थानों की ब्रांड वैल्यू बनाए रखने के लिए उनके खर्चे बहुत बढ़ गए हैं, लिहाजा ये खर्चे फीस के जरिये ही उगाहे जा सकते हैं। फिर सरकार भी लगातार अपने हाथ पीछे खींच रही है। दुर्भाग्य यह है कि इन संस्थानों को निजी क्षेत्र के साथ मिलकर संसाधन जुटाने का अनुभव नहीं है। विदेशों में भी फीस कम नहीं होती। अमेरिका के ज्यादातर विश्वविद्यालयों में छात्रों को पढ़ाई के साथ किसी न किसी प्रोजेक्ट में काम मिल जाता है। स्नातकोत्तर स्तर के छात्रों को कुछ नहीं, तो टीचिंग असिस्टेंसशिप मिल जाती है, जिससे वे अपना बहुत-सा खर्च निकाल लेते हैं। भारत से जाने वाले ज्यादातर मध्यवर्गीय छात्र एक सेमेस्टर की फीस का जुगाड़ करके ही वहां जाते हैं, बाकी वे वहां खुद अर्जित कर लेते हैं। लेकिन हमारे देश के विश्वविद्यालय या संस्थान अभी इस स्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं। वे फीस लेना तो जानते हैं, लेकिन विद्यार्थी की समस्या को नहीं समझते।
ब्रांड से जुड़ा दूसरा मुद्दा है, यहां से निकलने वाले छात्रों को मिलने वाला पैकेज। चूंकि पैकेज ज्यादा होता है, इसलिए संस्थान चाहते हैं कि उन्हें भी अपना हिस्सा मिले। फिर अच्छा पैकेज दिलाने के लिए उन्हें भी कम मशक्कत नहीं करनी पड़ती। उद्योग क्षेत्र से विशेषज्ञों को बुलाना पड़ता है, नौकरी देने वालों की आवभगत करनी पड़ती है, सॉफ्ट स्किल्स सिखाने पर बहुत ध्यान दिया जाता है, औद्योगिक प्रतिष्ठानों के भ्रमण आयोजित किए जाते हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि प्रबंधन की शिक्षा में शो बिज यानी दिखावापन बहुत बढ़ गया है। यानी उनका खर्चा काफी बढ़ गया है, जिसे वे विद्यार्थी की जेब से निकालना जानते हैं। मुक्त मंडी की चकाचौंध में यह सब स्वाभाविक है। लेकिन हमारे नीति-नियंताओं को यह तो सोचना ही चाहिए कि इससे देश में एक नई वर्गीय खाई बन रही है। आईआईएम से निकले छात्रों को एक करोड़ से अधिक का पैकेज मिल रहा है, जबकि दूसरे-तीसरे दर्जे के संस्थानों से एमबीए किए हुए युवा दर-दर भटक रहे हैं। मैकिन्से की हालिया रिपोर्ट बताती है कि चार में से एक इंजीनियरिंग किया हुआ युवक और दस में से एक बीए पास युवक ही नौकरी के लायक है। बाकी कहां जाएंगे? वर्गीय खाई इतनी चौड़ी हो गई है कि एक ही प्रतिष्ठान में काम करने वाले दो कर्मचारियों के वेतन में सैकड़ों गुना का अंतर है। यह भी देखने की बात है कि ज्यादा पैकेज और फीस की वजह से समाज में इन पाठय़क्रमों का एक छद्म हौव्वा बन जाता है। एमबीए वालों का पैकेज बढ़ा, तो सब एमबीए की ही तरफ सभी भागने लगे। निजी क्षेत्र में इसकी अंधी दौड़ शुरू हो जाती है। यहां शिक्षा पर नहीं, शो बिज पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। इसलिए आज यह जरूरी हो गया है कि प्रबंध शिक्षा के कुल योगदान की समीक्षा होनी चाहिए। आखिर इतने खर्च के बाद देश और समाज को इनका योगदान क्या है? किस तरह की संस्कृति वे उद्योग जगत को दे रहे हैं? क्यों इंजीनियरिंग के छात्र, जिन पर सरकार पहले ही भारी-भरकर राशि खर्च कर चुकी होती है, वे अपने क्षेत्र में न जाकर प्रबंधन में जा रहे हैं? इसकी भरपाई कैसे होगी? उनके अनुसंधान का कितना इस्तेमाल उद्योग जगत कर रहा है? इसलिए फीस नहीं गुणवत्ता बढ़ाइए। गरीब और होनहार के लिए अपने कपाट बंद मत कीजिए।(ref-hindustan)