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पीएचडी के मामले में भारत की स्तिथि

उच्च शिक्षा का आलम यह है कि छात्रों के पीएचडी करने के मामले में भारत चीन और अमेरिका से काफी पीछे है। शोध पत्रों और पेटेंट के मामले में भी भारत इन देशों से बहुत पीछे है। भारत की तुलना में अमेरिका में 5 गुना अधिक छात्र पीए…

पीएचडी के मामले में भारत की स्तिथि
उच्च शिक्षा का आलम यह है कि छात्रों के पीएचडी करने के मामले में भारत चीन और अमेरिका से काफी पीछे है। शोध पत्रों और पेटेंट के मामले में भी भारत इन देशों से बहुत पीछे है। भारत की तुलना में अमेरिका में 5 गुना अधिक छात्र पीएचडी करते है, जबकि चीन में सात गुना अधिक छात्र पीएचडी करते है। भारत में करीब 400 विश्वविद्यालय एवं डीम्ड विश्वविद्यालय हैं, लेकिन यहां हर साल पांच हजार छात्र ही पीएचडी करते हैं, जबकि अमेरिका में प्रतिवर्ष 25 हजार तथा चीन में प्रतिवर्ष 35 हजार छात्र पीएचडी करते हैं। संसद की प्राक्कलन समिति ने पिछले दिनों लोकसभा में प्रस्तुत अपनी 17वीं रिपोर्ट में देश में उच्च शिक्षा की हालत पर गहरी चिंता व्यक्त की है। सांसद सी गुप्पुसामी की अध्यक्षता की समिति ने विश्वविद्यालयों में वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए सरकार ने एम एम शर्मा समिति की सिफारिशों को लागू करने के लिए 250 करोड़ रुपए की राशि को अपर्याप्त बताया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि समिति विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा वित्त पोषित विश्वविद्यालयों में अनुसंधान की गुणवत्ता और मात्रा के अपर्याप्त स्तर को देखकर चिंतित है। केवल पीएचडी के मामले में ही नहीं बल्कि शोध पत्रों तथा पेटेंट के मामले में भी हम अन्य देशों की तुलना में काफी पीछे है। वर्ष 2005 में भारत के पास 648 पेटेंट थे, जबकि चीन के पास 2452 तथा अमेरिका के पास 4511 और जापान के पास 25145 पेटेंट थे। अनुसंधान पत्रों के प्रकाशन में विश्व में भारत का हिस्सा मात्र 2.5 प्रतिशत है जबकि अमेरिका विश्व अनुसंधान पत्रों को 32 प्रतिशत प्रकाशित करता है। समिति ने यह भी कहा है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के विश्वविद्यालयों में अनुसंधान कार्य को बढ़ावा देने के लिए टीचरों की गुणवत्ता बढ़ाने, अनुसंधान परियोजनाओं, अनुसंधान पुरस्कार, कनिष्ठ फेलोशिप देने आदि के कार्यक्रम शुरू होने के बाद भी अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आए। समिति ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की है कि सरकार ने वैज्ञानिक अनुसंधान में सुधार के लिए एम एम शर्मा की सिफारिशों के क्रियान्वयन वास्ते मात्र 250 करोड़ रुपए निर्धारित किए हैं जो कि अपर्याप्त हैं। समिति ने कहा है कि अगले साल से यह राशि हर साल में 600 करोड़ रुपए होनी चाहिए। समिति ने यह भी कहा है कि सिफारिशों को लागू करने में प्रशासनिक विलंब के कारण लागत में आने वाली वृद्धि का भी ध्यान रखे और आवंटन राशि में उनके अनुसार वृद्धि करे। समिति ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की है कि वर्तमान में यूजीसी सचिवालय में कुल स्वीकृत 806 पदों में 223 पद ही रिक्त हैं यानी कुल पदों का 28 प्रतिशत रिक्त है। समिति ने कहा है कि निकट भविष्य में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भारी वृद्धि होने की संभावना है, यह देखते हुए यूजीसी अपने वर्तमान संगठनात्मक ढांचे के रहते भविष्य का कार्यभार संभालने में सक्षम नहीं है। समिति ने कहा है कि यूजीसी राज्य स्तर पर अपने कार्यो के समन्वय के लिए प्रत्येक राज्य में कार्यालय खोले और कंप्यूटरीकृत प्रणाली विकसित करे। समिति ने सकल घरेलू उत्पाद का कम से कम 2 प्रतिशत उच्च शिक्षा पर खर्च करने की सिफारिश की है। फिलहाल सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.4 प्रतिशत ही उच्च शिक्षा पर खर्च किया जाता है जबकि विकसित देशों सकल घरेलू उत्पाद का 1.5 प्रतिशत उच्च शिक्षा पर खर्च किया जाता है।
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