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पर्यावरण की औद्योगिक संभावनाओं की तलाश

अनिल पी जोशी, पर्यावरणविद दुनिया के विकास की बढ़ती गति का पीछा बिगड़ता पर्यावरण भी कर रहा है। यह भी नहीं भूलना चाहिये कि फिलहाल दुनिया का ऐसा कोई भी देश नही है जो आपदा और बिगड़ते पर्यावरण की मार न झेल रहा हो। पिछले दो वर…

पर्यावरण की औद्योगिक संभावनाओं की तलाश
अनिल पी जोशी, पर्यावरणविद दुनिया के विकास की बढ़ती गति का पीछा बिगड़ता पर्यावरण भी कर रहा है। यह भी नहीं भूलना चाहिये कि फिलहाल दुनिया का ऐसा कोई भी देश नही है जो आपदा और बिगड़ते पर्यावरण की मार न झेल रहा हो। पिछले दो वर्षों की ही जानकारी उठा ली जाए तो चाहे वे चीन हो या अमेरिका या फिर जापान सब ही ने किसी न किसी रूप में आपदाओं को झेला है। हाल ही में भारत के उत्तराखंड व अमेरिका के कोलरोडो ने अत्यधिकरूप में बाढ़ के प्रकोप को झेला है। इस सबके बावजूद हम अभी भी यह मानने को तैयार नहीं कि तमाम आपदाएं हमारी ही करतूतों का परिणाम हैं। यही वजह है कि विकास की वर्तमान शैली कभी बदलने वाली नहीं है।
इस समय हमारी सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरण के उन विभिन्न घटको की वापसी है जिन्हें हम खो चुके हैं। इसका एक ही रास्ता दिखता है कि पारिस्थितिकी विकास को भी रोजगार का दर्जा दिया जाए। मसलन जगंल, पानी, मिट्टी, हवा को भी औद्योगिक उत्पाद की तरह ही देखें। जब मिनरल वाटर व रसायनिक खाद औद्योगिक उत्पाद हो सकते है तो प्राकृतिक घटकों के संरक्षण व उत्पादों को भी उद्योग समझने में ही हमारा भला होगा। मसलन जहां खेती नहीं होती वहां हम वन लगाकर, वनों को बनाए रखते हुए उसके उत्पादों के कारोबार को प्रोत्साहित किया जा सकता है। मनरेगा जैसी योजना पर्यावरण के हित में मील का पत्थर साबित हो सकती है।

वैसे भी मनरेगा गावों की सड़क, वन, पानी आदि की व्यवस्था में वर्तमान में भागीदारी कर रही है। इसी योजना के अंर्तगत वनीकरण जल, मिट्टी के संरक्षण आदि को लंबी अवधि के लिये जोड़ दिया जाए तो बेहतरी के आसार निश्चित रूप से बढ़ जाएंगे। इसी तरह मानसून का वो पानी जो हर साल बहकर चला जाता है उसे मनरेगा के जरिये जल खेती कर सरंक्षित किया जा सकता है। साथ ही इस जल के कारोबार का एक मॉडल भी तैयार हो सकता है। इसी तरह मिट्टी के सरक्षण आदि से भी यही किया जा सकता है और इससे रोजगार के नए तरह के अवसर भी पैदा होंगे। इसका महत्व इस तरह से भी समझा जा सकता है कि जब हम किसी वृक्ष का, जल का या मिट्टी का संरक्षण करते हैं तो एक तरह से राष्ट्र की संपत्ति का संरक्षण भी करते हैं, बल्कि उसमें वृद्धि ही करते हैं।

पर्यावरण के प्रति हमारी पिछली निष्ठुरताओं का बस अब यही एक रास्ता है। हम जब तक अपने पर्यावरण को रोजगार परक नहीं बनाएगें तब तक हमें सफलता नही मिलने वाली और कम से कम अब जब संसाधनो की कमी का आभास होने लगा है और बढ़ती बेरोजगारी भी हमें दुविधा में डाल रही है तो इन दोनो को जोड़कर हम रोजगार की नई जमीन तो बनाएंगे ही साथ ही देश के लिए नई संपदा का निर्माण भी करेंगे। आपदाओं से मुक्ति का रास्ता भी इसी से निकलेगा।
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